Thursday, 23 July 2015

आजकल का प्यार

मैंने कहा उससे की मुझे प्यार है तुझसे/

उसने पूछा घर में अकेली कब रहती हो/

मैंने कहा क्यों क्या करना है?

उसने कहा तुमसे मिलना है/

मैंने कहा मिलना है तो सबके सामने भी मिल सकते हैं/

उसने कहा उसमे वह मज़ा नहीं आयेगा जो अकेले मिलने में है/

मैंने कहा कही बाहर मिल लेते हैं जहाँ हमें कोई परेशान ना करे/

उसने कहा वहाँ भी मज़ा नहीं आयेगा/

तो मैंने पूछा अकेले मिल कर क्या करोगे?

वो बोला प्यार करेंगे/

मैंने पूछा “प्यार” का मतलब?

उसने कहा वही जो तुमने अभी कहा की तुम्हें मुझ से प्यार है/ बस वही करेंगे/

मैं उसका मतलब समझ चुकी थी/

मैंने पूछा क्या प्यार का यही मतलब होता है?

उसने कहा आजकल तो प्यार का यही मतलब होता है/

मैंने कहा लेकिन एक दूसरे को जानने की जरुरत भी तो होती है/ पहले थोड़ी बात करते हैं/

उसने कहा बात करके वक्त जाया करने की क्या जरुरत है, फ़ौरन प्यार शुरू कर देना चाहिये/

मैंने कहा अगर मैं ऐसा ना करूँ तो?

उसने तपाक से कहा उसे प्यार करने वाले और मिल जायेंगे/ आजकल दुनिया में ऐसे प्यार करने वालों की कोई कमी नहीं है/

मैंने कहा ठीक है कोई और ढूंढ लो, तो उसने झट से फोन काट दिया/

और मैं दूसरी तरफ फोन हाथ में लिए बस यही सोच रही थी
की अगर यही प्यार है तो —

हम खाक ही दम भरते थे उनसे मोहब्बत करने का,
सच तो ये है की हमने कभी उनसे “प्यार” किया ही नहीं/

Monday, 20 July 2015

अकबरनामा

पेपर का दिन वो दिन होता है जिसका इंतज़ार हम जैसे लोग पूरे साल करते हैंl आखिर यही वो दिन होता है जिस दिन हमें अपनी प्रतिभा को दिखने का मौका मिलता हैl सारे साल गधों से भी ज्यादा मेहनत करके जो दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हमने की है उसे अब दिखने का वक्त आ गया हैl आज जो कुछ भी हो जाये कोई भी हमें रोक नहीं सकता हैl आज हम बिल्कुल तत्पर रहते हैं की किस तरह सारी दुनिया को यह बताया जाये की हम से ज्यादा ज्ञान दुनिया में किसी और के पास हो ही नहीं सकता हैl

Examination hall में पहुँचे, दिल ज़ोरों से धड़क रहा होता हैl पता नहीं क्या होगा और बार-बार यही दुआ मांगी जाती है की भनवान पेपर में बस वही सवाल डालना जिसका हमें जवाब मालूम होl पेपर हाथ में और उसे देखते ही कलेजा एकदम मुहँ को आ जाता हैl पहला ही सवाल जो की करना अनिवार्य है आता ही नहीं हैl किसी तरह हिम्मत करके दूसरे सवालों पर नज़र डाली तब कहीं जाकर दिमाग ठीक हुआl अगर पहला ही सवाल ना आता हो तो हर सवाल का जवाब लिखते हुए दिमाग में यही रहता है की इसका क्या करेंगेl इसका तो अचार भी नहीं डाल सकते हैं जो की हर माँ का नुक्सा होता हैl किसी तरह बाकि के सवाल पूरे किये जाते हैंl

और फिर पहला सवालl जब कुछ पता ही नहीं है तो उसके बारे में लिखेगें क्याl या तो उसे छोड़ दो, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि जब भी कोई आपकी तैयारी करवाता है तो सबसे पहली सलाह वह आपको यही देता है की जो भी हो अगर पास होना है तो पेपर में कोई भी सवाल छोड़कर मत आना वर्ना पास होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हैl लेकिन जब कुछ आता नहीं तो क्या करे? एक नज़र ऊपर उठा कर देखा जाता हैl दायें-बायें सभी के हाथ जेट की गति से चल रहे होते हैंl उन्हें देखकर लगता है इसको तो सब कुछ आता है, पता नहीं क्या-क्या लिख रहा होगा, मैंने तो सिर्फ दो पेज लिखकर छोड़ दिए, और ज्यादा लिखना चाहिए थाl लेकिन उन्हें देखकर शरीर में एक नहीं उर्जा जागृत होती हैl कुछ भी हो जाय आज कोई भी सवाल मेरे हाथों से नहीं बचेगाl

और फिर सच में शुरू होता है उस दिव्य ज्ञान का इस्तेमाल जिसकी हम चर्चा कर रहे थेl इस दिव्य ज्ञान का इस्तेमाल सिर्फ ऐसे सवालों को लिखने में ही हो सकता है जिसका जवाब कोई नहीं जनता हो क्योंकि तभी तो examiner को पता चलेगा की किस विद्यार्थी को इतने सालों की तैयारी के बाद सबसे ज्यादा दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई हैl कौन सबसे ज्यादा अपने दिव्य ज्ञान की रोशनी से दूसरों को Enlighten कर सकता हैl अगर आपकी Enlightenment पेपर को चेक करने वाले पर पड़ गयी तो आपकी नैया पार निकल जाएगीl आपको उतने नंबर मिल सकते है जो आपको पास कर देl लेकिन अगर उसकी सोच आपकी सोच से अलग निकली तो फिर आपका कुछ नहीं हो सकताl फिर तो आपके Enlightenment की बत्ती वह कैसे बुझाएगा इसका पता आपको रिजल्ट आने पर अपने उस पेपर के नंबर देख कर लग जायेगाl फिर आपको अफ़सोस होता है की आज-कल तो जमाना ही नहीं रहा है किसी को भी अपना दिव्य ज्ञान देने काl

पहला पेपर हो गयाl अब थी दूसरे की बारीl सामान्य ज्ञान का था यानि GK.

सामान्य ज्ञान को सामान्य समझने की भूल बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह उतना सामान्य होता नहीं है जैसा की यह नाम लगता हैl यह किसी भी सामान्य व्यक्ति को आसामान्य बनाने का पूरा सामर्थ्य रखता हैl यह किसी का मानसिक संतुलन बिगाड़ सकता हैl और मेरा मानसिक संतुलन कैसे बिगड़ा उसकी एक मिसाल दे रही हूँl

पहला सवाल- अकबरनामा किसने लिखा था?

मैं अब भी ऐसे सवाल पढ़ती हूँ तो मन में पहला ख्याल आता है- मुझे क्या पता किसने लिखा थाl और मुझे जानकार भी करना क्या हैl अकबर मर गया, अकबरनामा लिखने वाला मर गया, और छोड़ गया हमारे लिए अकबरनामाl आज तक उसकी एक लाइन तो पड़ी नहीं है लेकिन उसे किसने लिखा था यह ज़रूर पता होना चाहिएl ऐसी ही और ना जाने कितनी ही क़िताबें होगीं जिनकी शक्ल आज तक देखी नहीं लेकिन रट्टा मार-मारकर यह ज़रूर याद किया की उसे किसने लिखा थाl लेकिन फिर अंतरात्मा जाग उठती है जो धिकारती है- ये होती हो पेपर की तैयारी, सारा साल यही किया था, शर्म करो अपने आप परl

खैर, ऐसा नहीं था की मुझे सवाल का जवाब नहीं पता थाl नाम उसका था अबुल फज़ल लेकिन असली परेशानी यह थी की उसकी असली spelling क्या थीl

क्या यह Abul fazal था या Abul fazl या Abul fazala, दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा थाl अगर यह चार आप्शन वाला पेपर होता तो झट से जवाब पता चल जाता लेकिन यहाँ तो सही नाम लिखना पड़ेगा वर्ना जीरो मिलेगाl

आप्शन वाला पेपर नहीं तो क्या हुआ हम इसे आप्शन वाला बना देते हैंl तो मैंने ऐसी हिम्मत दिखाई जिसके बारे में सोचकर किसी भी विद्यार्थी की रूह कांप उठेगीl मैंने लिखा-

प्रिय Examiner,

(वैसे Examiner कभी प्रिय हो ही नहीं सकता हैl उसने आज तक ऐसा क्या किया है जो उसे किसी विद्यार्थी का प्रिय बनायेl क्या उसने पेपर आसन बनाया? नहींl क्या उसने हमें अच्छे नंबर दिए? नहींl तो फिर उसके सवाल का जवाब खुद उसे ही देने दोl)

नीचे आपको चार विकल्प दिए जा रहे हैंl कृपया करके उसमें से सही जवाब चुन लें:-

अकबरनामा लिखा था

a) Abul fazal

b) Abul fazl

c) Abul fazala

d) None of the above

वैसे बिचारे अबुल फज़ल ने सपने में भी नहीं सोचा होगा की इतनी सदियों के बाद उसके नाम की कोई इस तरह फज़ीहत करेगाl भगवान् उसकी आत्मा को शांति देl

Friday, 17 July 2015

पढाई और नींद


पढाई और नींद में क्या सम्बन्ध है इसके बारे में एक विद्यार्थी से ज्यादा और कौन बता सकता हैl रात को बढ़िया सी नींद लेकर सुबह उठे, तैयार हुए और सोच कर पढ़ने के लिए बैठे की आज तो भई किसी तरह दो पाठ तो तैयार करने ही हैl लेकिन किताब को हाथ में लिए अभी आधा घंटा ही हुआ था की आँखे भारी होने लगी, उबासियाँ आने लगी, ऐसा लगाने लगा जैसे कल सारी रात रतजगा किया होl जबकि कल दस बजे ही बिस्तर पकड़ लिया था यह सोच कर की सुबह जल्दी उठकर fresh mind से पढाई करुँगीl लेकिन जो प्लानिंग की जाय वैसा हो जाय तो फिर बात ही क्याl कुछ समझ नहीं आता की किताब उठाते ही नींद क्यों आने लगती हैl पलकें भारी होने के बावजूद मैं आँखों को खुला रखने की कोशिश में जुटी थीl लेकिन ऐसा लगने लगा मानो पलकों पर टनों भारी वजन रखा होl आँखे बार-बार घड़ी पर जा रही थीl समय जैसे रुक गया लगता होl सेकेंड की सुई भी घंटे की सुई जैसे चलती हुई लग रही थीl

फिर सोचा एक कप चाय बनाकर पी ली जायl और अगला आधा घंटा चाय बनाने और अपने आप को जगाये रखने की कोशिश में निकल गयाl लेकिन फिर भी इस निक्कमी नींद ने पीछा ही नहीं छोड़ाl इसको कोई और काम नहीं है क्या? जब रात को भरपूर प्रयास करते है की नींद आ जाय क्योंकि सुबह जल्दी उठना है तो इसका कहीं पर भी नामोनिशान नहीं मिलता है और जब रात भर पढ़ने का प्लान होता है तो इसे आने में एक सेकेंड नहीं लगता हैl यह हमेशा ही गलत वक्त पर ही आती हैl

दो कप चाय के पीने के बावजूद भी चाय का कोई असर दिखता नज़र नहीं आ रहा थाl पलकें अभी भी उतनी ही भारी थीl तभी नींद का एक झोंका आया और आँखे बंदl पहले शायद मेरा सिर लुढ़का और फिर मैंl शरीर बिस्तर पर ऐसे पड़ा हुआ था जैसे रात भर चावल की बोरियाँ ढोयी होl नींद का नशा ऐसा जैसे चाय में चीनी की जगह भांग, अफ़ीम और गांजा तीनों मिलाकर पी लिए होl चाय से ऐसा नशा भी चढ़ सकता है पहली बार पता चलता हैl

सच में पढाई के वक्त आने वाली नींद से गहरी नींद कोई हो ही नहीं सकती हैl दो घंटे कब निकल गये पता ही नहीं चला और जब आँख खुली तो दोपहर के खाने का वक्त हो रहा थाl आँखे रगड़ते हुए कमरे से बाहर निकली यह पता लगाने के लिए की क्या बन रहा है ताकि सोने के बाद लगने वाली भूख को शांत किया जा सकेl माँ ने देखा तो बोली बेटा पढ़-पढ़कर क्यों अपनी आँखे ख़राब कर रही हो पहले ही इतना मोटा चश्मा लगा हुआ है और कितना मोटा चश्मा लगाना हैl माँ को क्या पता ये आँखे ज्यादा पढ़ने से नहीं बल्कि ज्यादा सोने की वजह से सूजी हुई हैंl

खैर, लंच खत्म किया और सीधे अपने कमरे मेंl पहले ही सुबह का वक्त बर्बाद हो चुका हैl लेकिन खाना खाने के बाद पढाई हो ऐसा हो ही नहीं सकता हैl दिन का खाना खाने के बाद तो एक झपकी बनती ही हैl और फिर उस छोटी-सी चपकी में फिर से दो घंटे निकल जाते हैंl घड़ी में देखा चार बज रहे थे और अभी तक चार पन्ने भी थी से नहीं पढ़े थेl लेकिन पलकें अभी भी भारी-भारी सी लग रही थीl क्या किया जाय?

फिर सोचा मूड बदलने के लिए एक गेम खेल ली जायl फटाफट कंप्यूटर खोलाl की बोर्ड पर हाथ सदे हुए और दिमाग एकदम चौकन्ना, कुछ देर पहले जो नींद परेशान कर रही थी उसका अब नामों-निशान तक नहीं थाl दिमाग बिजली की गति से दौड़ रहा था और बिना एक भी प्लेयर के मरे मैंने अपना मुश्किल लेवल पूरा कर लियाl लेकिन अफ़सोस इस जीत की ख़ुशी को देखने वाला कोई नहीं थाl अगर पढाई भी एक विडियो गेम की तरह होती तो उसका हर लेवल मैं जीत जातीl

तभी घड़ी पर नज़र पड़ी पांच बज रहे थे लेकिन मैंने अभी तो खेलना शुरू किया थाl एक घंटा कैसे बीत गयाl काश पढाई करते वक्त भी वक्त ऐसे ही बीत जाताl लेकिन क्या किया जा सकता थाl तभी माँ ने शाम की चाय के लिए बाहर से आवाज लगाईl लगता नहीं आज मेरी कुछ पढाई होगीl