Monday, 8 February 2016

नीलोफ़र-3

नीलोफ़र के पेट में चार दिन बाद कुछ गया था| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह क्यों जिन्दा थी या अपने आप को जिन्दा रखने के लिए क्यों इतनी मेहनत कर रही थी| इस वक्त उसे मरना ज्यादा आसान लग रहा था| क्योंकि अगर आज वह बच भी गयी तो फिर क्या? उसके परिवार का कोई भी अभी तक उसका पता लेने नहीं आया था| पता नहीं वे जिन्दा थे भी या नहीं? और सारी जिंदगी वह यहाँ तो नहीं रहेगी| आज नहीं तो कल वह आदमी उसे अपने घर से निकाल ही देगा| दो दिन की जिंदगी और लेकर अब वह क्या करेगी?

रात को अजीत फिर उसके लिए वही खाना ले आया था| दिन में दो बार वह उसे खाना दे जाता| कई बार वह उसके लिए दूध भी ले आता था| लेकिन उसने नीलोफ़र से कभी भी उसकी हालत के बारे में नहीं पूछा| नीलोफ़र सारा दिन यूँ ही बिस्तर में पड़ी रहती| वह अपने अब्बा, बहनों और परिवार के बारे में ही सोचती रहती थी| क्या वे सब उसे भूल गये? और कितने दिन वह आदमी उसे यहाँ अपने घर रखेगा? और आखिर वह उसे बचा क्यूँ रहा था जबकि वह खुद मुसलमानों को मारने में शामिल था?

नीलोफ़र को कई दिन गुजर गये थे उस कमरे में पड़े-पड़े| जब भी वह आदमी लौटकर आता तो सबसे पहले वह नीलोफ़र को खाना दे जाता| वही जो वह खुद खा रहा था| शायद वह किसी के घर से वो रोटी और सब्जी लेकर आता था| जब भी वह आता नीलोफ़र बिस्तर में दुबक जाती| हालाँकि वह उसकी तरफ देखता भी नहीं था| वह बस खाना रखता और दरवाज़ा बंद करके चला जाता|

अजीत अपने कमरे में बैठा उन रोटियों की तरफ देख रहा था जो उसके पिता के दोस्त जोगिन्दर की पत्नी रोज उसे बनाकर दे दिया करती थी| उनमें से दो वह नीलोफ़र को दे आया करता था| नीलोफ़र को उसने बचाया और उसे घर के अन्दर ले आया| लेकिन उसे उससे ज्यादा मतलब नहीं था| वो अगर उस भूसे के ढेर में मर भी जाती तो उसे ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ता| पिछले एक महीने में उसने इतनी मौत देखी थी की उसे ना तो अब किसी के जिन्दा होने से कोई फ़र्क पड़ता था और ना ही मरने से| उसने खुद इतनी हैवानियत दिखाई थी की वह खुद अब पत्थर बन चुका था| नीलोफ़र की तरह ही उसे खुद भी नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा था या फिर अपने आप को जिन्दा रखने की कोशिश क्यों कर रहा था? जिस तलवार से उसने उन लोगों को मारा था वह खुद अपना गला उससे काट लेना चाहता था ताकि जिस दर्द से वह गुजर रहा था उसे खत्म कर सके| लेकिन दूसरे के गले पर तलवार चलाना जीतना आसान होता है अपने गले पर उसे चलाना उतना ही मुश्किल|

उस दिन जब वह नीलोफ़र को खाना देने गया तो खाना देने के बाद भी वह वहीँ चौखट पर ही खड़ा रहा| उसे शायद समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरह नीलोफ़र से बात करे|

“तुम्हें अपने परिवार के बारे में कुछ पता है तो मुझे बता दो, मैं तुम्हें उनके पास छोड़ आऊँगा|” यह पहली बार था जब इतने दिनों में अजीत ने नीलोफ़र से कुछ कहा था| वह बात तो उससे कर रहा था लेकिन देख एक दिवार को रहा था|

“मुझे नहीं पता| मेरे अब्बा मुझे लेने आने वाले थे|” नीलोफ़र ने सहमी-सी आवाज में कहा|

“तुम्हारा घर कौन सा था?”

“कोई नहीं|”

“तो तुम यहाँ कैसे आयी?”

“मेरा घर लखनऊ में था लेकिन हम पाकिस्तान जाने वाले थे इसलिए मेरे अब्बा मुझे और मेरी बहन को यहाँ मेरे मामा के घर छोड़ गये थे|”

“तुम्हें अपना लखनऊ का पता याद है?”

नीलोफ़र खामोश थी| उसे कुछ याद नहीं था|

“तुम्हारा कोई और रिश्तेदार जो आस-पास रहता हो?”

“वो सब यहीं थे|”

“यहाँ तुम्हारे मामा का घर कौन-सा था?”

“वो बड़े टीले के पास जो पीली कोठी है उसके बगल वाली कोठी|”

“ठीक है मैं कुछ पता करता हूँ| तुम्हारे पिता का नाम क्या है?”

“मोहम्मद अब्बास|”

“और मामा का?”

"वाहिद खान|"

“और तुम्हारा नाम क्या है?”

“नीलोफ़र|”

नीलोफ़र से वह थोड़ी बहुत जानकारी लेकर अजीत अपने कमरे में लौट आया| लेकिन नीलोफ़र जिन लोगों की बात कर रही थी उसे उन लोगों के जिन्दा होने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी| उसे पता था की उस रात उन्होंने किसी को भी नहीं छोड़ा था| उसके मामा के घर पर हमला करने वाली भीड़ में वह भी शामिल था| और अगर कोई उनके हमले से बचकर भाग भी गया होगा तो वह शायद ही हिंदुस्तान में हो क्योंकि पाकिस्तान का बॉर्डर यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था| और उसके परिवार के बाकि लोग कहाँ पर होंगे यह कहना भी मुश्किल था क्योंकि कौन पाकिस्तान गया और कौन पाकिस्तान जाते हुए मारा गया इस बारे में पता करना नामुमकिन था|

“तुम्हें अगर कपड़े चाहिए तो वहाँ उस अल्मारी से ले सकती हो|” कहकर अजीत वहाँ से चला गया|

नीलोफ़र पलंग से उतरकर कमरे में रखी लकड़ी की अलमारी के पास गयी| उसने उसे खोलकर देखा| उसमे ढेर सारे सूट-सलवार भरे हुए थे| उसने उनमें से एक निकाला और पहन लिया| वह उसे थोड़ा ढीला था| फिर वह खिड़की की तरफ गयी| अजीत अन्दर के बरामदे में अपने कमरे के बाहर सीढ़ियों पर अपना सिर पकड़े बैठा था| उसे समझ नहीं आ रहा था की नीलोफ़र को बचाकर उसने गलती की या नहीं| लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| वह बस उसे किसी तरह इस गाँव से निकालना चाहता था| हालाँकि दंगे अब रुक चुके थे लेकिन लोगों के दिलों की कड़वाहट अभी भी कम नहीं हुई थी|

अगले कई दिन अजीत ने पाकिस्तान जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी इकटठा करते हुए बिताये| वह आस-पास के हर उस कैम्प में नीलोफ़र के पिता के नाम सन्देश लिखवा आया था की वह जिन्दा थी| वह सुबह नीलोफ़र को खाना देकर निकलता और शाम को भी खाना लेकर घर में आता| लेकिन कई दिनों तक उसे कोई ऐसा नहीं मिला जो उसे जनता हो|

नीलोफ़र की हालत भी थोड़ी सुधर चुकी थी लेकिन उसकी पीठ पर लगा जख्म अभी तक ठीक नहीं हुआ था| वह सारा दिन कमरे में ही पड़ी रहती थी| अजीत ज्यादातर वक्त घर पर होता नहीं था और उसकी गैरमौजूदगी में वह कभी कमरे से बाहर नहीं जाती थी|

एक दिन रात के अँधेरे में चुपचाप अजीत नीलोफ़र को लेकर घर से बाहर निकला| उसे पता था की अगर गाँव के किसी आदमी को भनक भी लगी तो वो दोनों ही जिन्दा नहीं बचेंगे| नीलोफ़र के पिता के बारे में छानबीन करते हुए उसे एक औरत मिली थी जो उसके पिता को जानती थी| शायद वह उनके पड़ोस में रहती थी| और लोगों की तरह वह भी अपने कुछ रिश्तेदारों को ढूढ़ रही थी| उसने अजीत को बताया की नीलोफ़र का परिवार उसे मरा समझकर पाकिस्तान जा चुका था| जब अजीत ने उसे नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने के लिए कहा वह नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने को तैयार हो गयी थी| अजीत नीलोफ़र को उसी के पास ले जा रहा था|

दोनों पैदल ही जा रहे थे| अजीत तेज़ कदमों से आगे-आगे और नीलोफ़र एक काली चादर में अपना सिर छुपाये धीमे कदमों से उसके पीछे-पीछे| कुछ-कुछ देर बाद वह पीछे मुड़कर देख लेता था की वह पीछे ही है| सुबह होते-होते वे उस कैंप तक पहुँच चुके थे जहाँ से बसों में भरकर लोग पाकिस्तान तक जा रहे थे| उस औरत ने उसे वही मिलने के लिए कहा था|

शाम होने लगी थी लेकिन उस औरत कही कुछ पता नहीं था| नीलोफ़र अपना सिर झुकाये एक पेड़ के नीचे बनी दिवार पर बैठी हुई थी| अजीत भी उसके पास ही खड़ा था| वह औरत कल उसे यही पर मिलने का वादा कर गयी थी| लेकिन सुबह से शाम घिर आयी थी| ज्यादातर लोग जो पाकिस्तान जाने के लिए वहाँ उस कैम्प में इकटठा हुए थे भी अब जा चुके थे| अजीत ने देखा की जोगिन्दर उसे देखकर उसकी तरफ बढ़ा चला आ रहा था| वह उसे देखकर घबरा गया था|

Thursday, 4 February 2016

नीलोफ़र-2

वह आदमी लालटेन हाथ में लिए एक बार आँगन के दरवाजे की तरफ गया| दरवाज़ा खोलते हुए वह किसी सोच में डूबा हुआ था| कुछ देर वहीँ दरवाज़े के पास खड़ा वह कुछ सोचता रहा| फिर वह वापिस नीलोफ़र के पास आया| वह नीलोफ़र को घूर रहा था| नीलोफ़र जमीन पर पड़ी सिसक रही थी| उसे भी समझ नहीं आ रहा था की वह उसे मारने में इतना वक्त क्यों लगा रहा था|

कुछ देर बाद वह नौजवान वापिस घर के अन्दर चला गया| नीलोफ़र यूँ ही पड़ी रही बिना हिले-डुले| उसका पूरा शरीर दर्द से सुन्न हो गया था| वह फिर वापिस नहीं आया| और रात को कब नीलोफ़र की आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला|

सुबह एक आहट से नीलोफ़र की आँख खुली| वह नौजवान एक चादर लपेटे हुए आँगन के दरवाजे से बाहर जा रहा था| नीलोफ़र किसी तरह अपने दोनों हाथों से सरकती हुई वापिस भूसे के ढेर के पीछे आ गयी|

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गाँव के कई आदमी छोटे-बड़े, जवान और उम्रदराज़ उस चाय की दुकान पर इकठ्ठा थे| यह सुबह किसी अन्य दिन की सुबह जैसी ही लग रही थी| लेकिन एक बात थी जो उस सुबह में नहीं थी| कई ऐसे लोग थे जो कुछ दिन पहले तक उस चाय की दुकान पर चाय पीने आया करते थे लेकिन अब वे कभी नहीं आयेंगे| गाँव के लोग खुश थे की उनका गाँव अब उन लोगों से साफ हो चुका था|

उन्ही सब के बीच एक चौबीस वर्षीय नौजवान भी था अजीत| वह चुपचाप एक कोने में बैठा उन लोगों की बातें सुन रहा था लेकिन उनकी एक भी बात पर उसका ध्यान नहीं था| उसके कानों में गूंज रही थी उन लोगों की चींखे जिन्हें उसने कल रात मौत के घाट उतार डाला था सिर्फ इसलिए क्योंकि उस कौम के दूसरे लोगों ने उसके माता-पिता, भाई और दो बहनों की हत्या कर दी थी| फिर उसने भी वही सब किया जो सब कर रहे थे| वह भी उन लोगों की भीड़ में शामिल था जिसने नीलोफ़र के घर पर हमला किया था|

लेकिन वह नीलोफ़र को नहीं मार पाया| जो जुनून कुछ देर पहले तक उसके सिर पर सवार था शायद नीलोफ़र को देखकर वह उतर चुका था| वह उसे मार डालना चाहता था अपनी बहनों की मौत का बदला ले लेना चाहता था| लेकिन शायद उसकी बहनों की याद ही थी जिसने उसके हाथों को रोक दिया था| उसकी छोटी बहन नीलोफ़र के जैसे ही थी| वह भी शायद उतनी ही डरी हुई होगी जीतनी कल उसे नीलोफ़र लग रही थी| शायद वह भी इसी हाल में होगी जिसमे नीलोफ़र थी जब उन लोगों ने उसे मारा होगा| एकबारगी उसने गाँव के लोगों को बुला लेने की सोची ताकि वे उसे मार डाले| लेकिन उसे पता था की उसे मारा बाद में जायेगा पहले उसके साथ वह होगा जो उसकी बहनों के साथ हुआ और जो वह नहीं चाहता था की दुनिया में किसी भी लड़की के साथ हो|

जब उन लोगों की पंचायत खत्म हुई तो अजीत अपने घर की ओर चल दिया| रास्ते में कई जले हुए घर थे जिनमें से एक घर निलोफर के उस रिश्तेदार का था जिसके घर वे लोग तीन दिन पहले ही आकर रुके थे| वे लोग लखनऊ से यहाँ पर आये थे ताकि पाकिस्तान जा सके| सुबह होते ही उन्हें यहाँ से निकल जाना था| लेकिन उन्हें नहीं पता था की वह रात उनकी जिंदगी की आखिरी रात होने वाली थी| उन जले हुए घरों में अब मातम करने वाला भी कोई नहीं बचा था|

घर पहुँचकर अजीत सीधा अपने कमरे में चला गया| पूरा दिन ना तो वह अपने कमरे से बाहर निकला और ना ही नीलोफ़र अपनी जगह से हिली|

रात फिर ढल आई थी| नीलोफ़र अभी भी उसी भूसे के ढेर में पड़ी हुई थी| उसे तीन दिन हो गये थे बिना कुछ खाए पिये| उसके शरीर में इतनी भी जान नहीं बची थी की वह अपना हाथ भी हिला सके|

तभी किसी ने आँगन का दरवाज़ा खटखटाया| नीलोफ़र इस बार चौंकी नहीं| अगर कुछ होगा भी तो ज्यादा से ज्यादा उसे मार दिया जायेगा| उसने अपने आप को बचाने का इरादा भी अब छोड़ दिया था| कुछ देर बाद अजीत घर के अन्दर से निकलकर आया| वह कुछ देर तक दरवाज़े पर खड़े उस आदमी से बात करता रहा| वह आदमी अजीत को बुलाने आया था| वे लोग दूसरे गाँव जा रहे थे ताकि अपनी कौम के मारे गये लोगों की मौत का बदला ले सके| लेकिन इस बार उसने जाने से मना कर दिया| उसने आंगन का दरवाज़ा बंद किया और वापिस घर के अन्दर चला गया| उसने नीलोफ़र पर भी कोई ध्यान नहीं दिया| उसने भी शायद उसे उसकी किस्मत पर छोड़ दिया था|

नीलोफ़र का पूरा शरीर बुखार से तप रहा था| उसने तीन दिन से ना तो कुछ खाया था और ना ही कुछ पिया था| वह मर तो रही थी लेकिन धीरे-धीरे करके| और जो कुछ कसर थी वो अब आसमान में घिर आये बादल पूरी करने वाले थे| कुछ देर में ही उसके गर्म शरीर पर बारिश की ठंडी बुँदे पड़ने लगी थी| तभी आधी बेहोशी की हालत में उसे अपने शरीर पर रेंगते दो हाथ महसूस हुए| अपनी अधखुली आँखों से उसने एक धुंधले शरीर को अपने ऊपर झुका हुआ पाया| अजीत एक चादर को उसके शरीर पर लपेट रहा था| उसने जल्द ही नीलोफ़र को अपने हाथों में उठाया और घर के अन्दर ले गया| वह उसे एक कमरे में ले गया और उसके एक पलंग पर डाल दिया| दूसरे ही पल वह उसे कम्बलों में लपेट रहा था| अजीत को उस वक्त खुद भी नहीं पता था की वह नीलोफ़र को अपनी छोटी बहन के कमरे में क्यों ले आया था|

थोड़ी गर्माहट पाकर नीलोफ़र के शरीर ने अब कांपना बंद कर दिया था लेकिन बिना खाये-पिये उसका शरीर कमज़ोर पड़ चुका था|

अजीत अपने कमरे में चुपचाप बैठा था| उसने भी पिछले तीन दिनों से, जबसे उसने उन लोगों को मारा था, कुछ नहीं खाया था| और ना ही उसे नींद आई थी| वह जब भी अपनी आँखे बंद करता उन लोगों के कटे हुए शरीर उसकी आँखों के सामने आ जाते थे| उन औरतों की चींखे उसके कानों में गूंजने लगती थी जिनका बलात्कार उसके दोस्त और साथी कर रहे थे| उसने सोचा था उन लोगों को मारकर, उनसे अपने परिवार की मौत का बदला लेकर उसकी तकलीफ़ थोड़ी कम हो जायेगी लेकिन राहत मिलने की बजाय उसकी बैचेनी और ज्यादा बढ़ गयी थी| ऐसा नहीं था वह उन लोगों के खिलाफ अपनी कड़वाहट भूल गया था लेकिन उन्हें मारने का भी अब उसका कोई मन नहीं था|

सुबह एक बार वह नीलोफ़र को देखने गया| वह दरवाजे की चौखट पर ही खड़ा रहा| वह अभी भी बिस्तर में बेहोश पड़ी थी| वह नहीं चाहता था की नीलोफ़र यहाँ उसके घर में रहे लेकिन इस हालत में वह उसे उठाकर बाहर फेंक भी नहीं पा रहा था| उसके मर जाने से ज्यादा डर उसे उन लोगों से था जो नीलोफ़र के पीछे पड़े हुए थे| अगर उसे मरना ही था तो वह चुपचाप यहाँ इस कमरे में मर जाये| वह नहीं चाहता था की वह उन लोगों के हाथ लगे|

दो दिन और गुजर चुके थे जब नीलोफ़र को होश आया| वह तीन-चार कम्बलों में लिपटी हुई थी और उसका शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था| उसने अपने कमज़ोर हाथों से कम्बलों को परे सरकाया| वह उठने की कोशिश कर रही थी की उसकी सूजी हुई पीठ में जबरदस्त दर्द हुआ और वह वापिस पलग पर लुढ़क गयी| वह पलंग पर पड़ी करहा रही थी जब अजीत उसे देखने आया| वह अन्दर नहीं गया बस चौखट पर खड़े होकर ही उसे देख गया|

कुछ देर बाद जब वह वापिस लौटा तो उसके हाथ में पानी का एक गिलास और एक अख़बार का टुकड़ा था जिसमे खाने का कुछ सामान लिपटा हुआ था| पिछले बीस दिनों से वह यही सब कुछ खा रहा था| उसने गिलास और अख़बार को पलंग के सिरहाने की मेज पर रखा और वापिस अपने कमरे में चला आया| उसने नीलोफ़र की तरफ देखा भी नहीं| लेकिन नीलोफ़र अधखुली आँखों से उसे देख रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था वह आदमी उसे क्यों यहाँ अपने घर में ले आया था और क्यों उसे खाना दे रहा था, आखिर वह उसे बचा क्यों रहा था?

 लेकिन अजीत उसे बचा नहीं रहा था| वह तो बस उसे अपने हाथों से मार नहीं पा रहा था| शायद वह अपनी आत्मा पर एक और मौत का बोझ नहीं ढ़ोना चाहता था|

Tuesday, 2 February 2016

नीलोफ़र-1

बाहर कुछ हल्की-सी आवाज हुई और नीलोफ़र हड़बड़ाकर वापिस अपनी जगह में दुबक गयी| वह जिस जले हुए तख़्त के पीछे छुपी हुई थी उसमें बने एक सुराख़ में से उसने झांककर देखा| बाहर एकदम सन्नाटा फैला हुआ था| उस जले हुए घर में अब कोई नहीं बचा था| बाहर की गली भी एकदम सुनसान पड़ी हुई थी| उस गली का हर घर जला हुआ और सुनसान था| नीलोफ़र को दो दिन हो गये थे इस तरह यहाँ पर छुपे हुए| वह गहरी नींद में सो रही थी जब एक उन्मादी भीड़ ने उसके घर पर हमला कर दिया था और वहाँ मौजूद हर इन्सान को मारकर घर को आग के हवाले कर दिया| उसकी बड़ी बहन भी उसके साथ ही सो रही थी जब यह सब हुआ| उन्होंने दूसरे घर की छत पर कूदकर किसी तरह अपनी जान बचाई| उसकी बड़ी बहन ने उसे तो छुपा दिया था लेकिन वह अपने आप को नहीं बचा पाई| उन लोगों ने उसकी बहन के साथ क्या किया नीलोफ़र को इस बात का अंदाजा तक नहीं था| वह पूरे दिन और पूरी रात जगी रही और वहाँ छुपी रही इस उम्मीद में की उसकी बहन आयेगी और उसे यहाँ से ले जायेगी | लेकिन उसे क्या पता था की वह अपनी बहन को अब कभी नहीं देख पायेगी| अगले दिन की शाम होते-होते तक उसकी उम्मीद भी टूटने लगी थी| उसकी आँखे भारी हो रही थी लेकिन फिर भी वह अपनी आँखों को खुला रख रही थी की कही उसकी बहन आये और वह उसे देख ना पाये| लेकिन इतनी कोशिश करने के बाद भी उसे एक झपकी आ गयी थी|

रात फिर घिर आयी थी| नीलोफ़र की आँखे रो-रोकर सूज चुकी थी| वह पत्थर-सी बनी उस तख़्त के पीछे बैठी हुई थी| फिर न जाने क्या सोचकर वह तख़्त के पीछे से बाहर निकल आयी| शायद उसे समझ आ गया था की उसकी बहन अब लौटकर नहीं आयेगी| उसे याद था उसके अब्बा उसे यहाँ पर क्यों छोड़कर गये थे| उन्होंने सोचा था की वह और उसकी बहन यहाँ पर सुरक्षित रहेंगे| लेकिन उन्हें क्या पता था की वे उन दोनों को अब कभी नहीं देख पायेंगे|

नीलोफ़र किसी तरह लड़खड़ाती हुई उस घर से बाहर निकली| उस अँधेरी काली रात में उन जले हुए घरों का नजारा और भी ज्यादा भयंकर लग रहा था| उस गाँव में मौजूद हर एक मुसलमान का घर जला दिया गया था| उन घरों में रहने वालों को मौत के घाट उतार दिया गया था, और अगर कोई बच भी गया था तो वह यहाँ से भाग चुका था|

नीलोफ़र को नहीं पता था की उसे कहाँ जाना था| वह उस अँधेरी गली में बदहवास-सी घूम रही थी| उसे नहीं पता था की वह जिन्दा बच पायेगी या नहीं| वह उस मनहुस पल को कोस रही थी जब उसके अब्बा उसे यहाँ उसके मामा के घर छोड़ गये थे| पूरे गाँव में एक सन्नाटा पसरा हुआ था| रात का आखिरी पहर था और सब अपने घरों में गहरी नींद में सोये हुए थे| नीलोफ़र बस अपने शरीर को ढोए चली जा रही थी| और कुछ देर तक उन गलियों में घुमने के बाद उसे खेत दिखाई दिये|

वह उस आखिरी घर से गुजर ही रही थी जब उसने उन लोगों की भीड़ की मशालों को अपनी तरफ आते देखा| अगर उन्होंने उसे देख लिया तो उसे भी नोच लिया जायेगा| उसने उस घर की तरफ देखा| उसे पता था की वह किसी हिन्दू का घर था क्योंकि गाँव के उस हिस्से में हिन्दू रहते थे| लेकिन वहाँ पर अँधेरा पसरा हुआ था| शायद दंगों की वजह से उस घर के लोग भी घर छोड़कर जा चुके थे| उसने आँगन के दरवाजे को हल्के-से खोला और अन्दर चली गयी| और कुछ ही देर में उन लोगों की भीड़ उस घर के सामने से गुजरी| वे लोग ज़ोर-ज़ोर से नारे लगा रहे थे और ताज़े खून से सनी नंगी तलवारों को हवा में लहरा रहे थे|

आँगन में भूसे के एक ढेर के पीछे छुपी नीलोफ़र बस उनके निकल जाने की ही दुआ मांग रही थी| जब उसे लगा की सब लोग चले गये थे तो उसने किसी तरह अपने आप को पैरों पर खड़ा किया और दरवाजे की तरफ देखा|

‘अगर में रात यही पर गुजार लूँ तो|’ उसने सोचा| वह भी न जाने क्या सोच रही थी| दिन हो या रात अगर वह उन लोगों के हाथ लग गयी तो उसे कोई नहीं बचा पायेगा, उसका अल्लाह भी नहीं| लेकिन उसमें अब सोचने की भी शक्ति नहीं बची थी| उसे खुद नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा थी और क्यों अपने आप को इस तरह बचाती फिर रही थी| अच्छा होता अपनी बहन के साथ वह भी मर जाती|

वह उस भूसे के ढेर के पीछे निश्चित-सी होकर बैठ गई जैसे सुबह हो जाएगी और सब कुछ ठीक हो जायेगा| उसने आँखे बंद की ही थी की तभी उस घर के आंगन का दरवाज़ा खुला और एक नौजवान हाथ में मशाल लिए आँगन में घुसा| हवा में फड़फड़ाती मशाल की लौ में उसका तना हुआ लाल चेहरा एकदम साफ नज़र आ रहा था| उसके दूसरे हाथ में एक तलवार थी जो खून से सनी हुई थी| आँगन से वह सीधा घर की तरफ बढ़ गया| उसने मशाल को बरामदे में एक तरफ लटकाया और वही दिवार पर लटक रही एक लालटेन को जलाने लगा| उसके हाथों और कपड़ों पर ताज़ा खून साफ नज़र आ रहा था| फिर उसने लालटेन ली और घर के अन्दर चला गया| निलोफर साँस रोके यह सब देख रही थी| ‘उसने यहाँ रूककर कोई गलती तो नहीं की?’ उसे पता था की यह एक हिन्दू का घर था और जहाँ से वह आई थी उसके लिए अब वहाँ जाना मुश्किल था|

नीलोफ़र वहाँ से उठकर निकल जाना चाहती थी लेकिन उसके पैरों में इतनी भी हिम्मत नहीं बची थी की वह उस आँगन को भी पार कर सके| हालाँकि अगस्त अभी ख़त्म नहीं हुआ था और बाहर इतनी ठण्ड भी नहीं थी लेकिन फिर भी उसका पतला लम्बा शरीर बुरी तरह से कांप रहा था| उसने फिर से आँखे बंद की यही सोचकर की जल्द ही सुबह होगी| वह सो जाना चाहती थी लेकिन चीथड़ों में लिपटा उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था| उसने अपने शरीर को समेटा और भूसे को उठाकर अपने ऊपर डाल लिया| लेकिन फिर भी उसकी कंपकंपाहट कम नहीं हुई| नीलोफ़र को आँखे मूंदे अभी कुछ देर ही हुई थी की उसे आँगन में कुछ आहट-सी महसूस हुई| लेकिन सिर उठाकर देखने की भी उसमे हिम्मत नहीं थी| तभी उसने देखा की वही आदमी जो कुछ देर पहले घर के अन्दर गया था लालटेन लिए उसके सामने खड़ा था| उसकी उम्र कुछ ज्यादा नहीं होगी, बस तेईस या चौबीस| और वह शायद उसे पहचान गया था की वह उसके धर्म की नहीं थी| उसने भूसे के ढेर से निलोफर को उठाया और वही एक तरफ कोने में जमीन पर पटक दिया| नीलोफ़र कमर में लगी तेज़ चोट से तड़प उठी और उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे| उसे पता था की उसके साथ क्या होने वाला था| वह वहाँ जमीन पर पड़ी सिसक रही थी और वह आदमी अपनी तलवार की तरफ बढ़ रहा था| उसने वही बरामदे में पड़ी खून से सनी अपनी तलवार को उठाया और नीलोफ़र के पास गया| उसने नीलोफ़र को मारने के लिए अपना हाथ उठा तो लिया था लेकिन पता नहीं क्यों उसके हाथ वही हवा में ही रुके रहे| उस रात उसने कई लोगों की जान ली थी लेकिन वह नीलोफ़र को मार नहीं पा रहा था| फिर उसने तलवार को गुस्से में एक तरफ फैंक दिया| लेकिन जमीन पर अपनी आँखे बंद किये पड़ी नीलोफ़र अपनी गर्दन पर आती हुई उस तलवार का इंतज़ार कर रही थी| उसकी बहन उसे छोड़कर जा चुकी थी और उसके अब्बा भी अपने वादे के मुताबिक उसे लेने के लिए नहीं आये| उसके लिए उसकी दुनिया ख़त्म हो चुकी थी और अब जो चंद सांसे बची थी वे भी जितनी जल्दी बंद हो जाये उतना अच्छा| वह यही चाहती थी की वह आदमी उसे मार डाले और उसका अंत कर दे| लेकिन उसकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था|

Sunday, 22 November 2015

सुजाता की कहानी- अंत

विक्रम अपने दिल की बातें उसे बताये जा रहा था और सुजाता चुपचाप उसे सुने जा रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह विक्रम को रोके या पूरी बात कह लेने दे| उसने हमेशा से ही इस दिन का इंतज़ार किया था जब कोई उससे कहता की वह उससे प्यार करता है| लेकिन आज ना जाने सुजाता को क्या हो गया था| विक्रम जैसा इन्सान जिसके बारे में उसने सपने में भी नहीं सोचा था उससे कह रहा था की वह उससे प्यार करता है फिर भी वह खामोश बैठी थी, उसके चेहरे पर ख़ुशी का कोई नामोनिशान नहीं था|

विक्रम ने देखा की सुजाता की आँखे भर आई थी और उसकी आँखों से दो आंसू उसके गालों पर लुढ़कने को तैयार थे| विक्रम भी चुप हो गया| उसे लगा की उसकी बातों को सुनकर शायद सुजाता को अच्छा नहीं लगा|

“मुझे लगता है अब हमें चलना चाहिये|” विक्रम ने उठते हुए कहा|

लेकिन सुजाता खामोश अपनी कुर्सी पर बैठी रही| विक्रम भी वापिस बैठ गया|

“सुजाता मैं तुम्हें किसी तरह का दुःख नहीं पहुँचाना चाहता था| अगर तुम्हें मेरी किसी भी बात से चोट पहुँची है तो मैं तुमसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ|”

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है|” सुजाता ने अपनी आँखे पोंछते हुए कहा| “आप जानते हैं आज तक किसी ने मुझ से इस तरह की बातें नहीं कही| और आप....आप मुझ से प्यार करेंगे ऐसा मैंने सोचा भी नहीं था| आप जैसा इन्सान किसी किस्मत वाले को ही मिल सकता है|”

“लेकिन मुझे लगता है की अगर तुम मुझे मिल जाओ तो मैं इन दुनिया में सबसे ज्यादा किस्मत वाला इन्सान होऊंगा|”

सुजाता कुछ देर तक विक्रम का चेहरा निहारती रही| उसने आज तक इस तरह विक्रम की आँखों में नहीं देखा था| ‘क्या सच में ऐसा हो सकता है? क्या सच में विक्रम मुझ से इतना प्यार करता है?’ उसके दिलो-दिमाग में बस यही सवाल घूम रहे थे|

“आपको पता है प्यार की सबसे अजीब बात क्या है?” सुजाता ने विक्रम के चेहरे पर से नज़रे हटाते हुए कहा|

“क्या?”

“यही की जिसे हम चाहते है वह हमें नहीं चाहता और जो हमसे प्यार करता है हमें उसके प्यार की कोई परवाह नहीं होती है| प्यार की चाहत में हम ऐसे इन्सान के पीछे भागते रहते हैं जिसका हमें पता होता है की वह हमें नहीं मिलेगा लेकिन फिर भी हम उससे उसी प्यार की उम्मीद करते हैं जैसा हम उसे करते हैं यह सब जानते हुए भी ऐसा कभी नहीं होगा| और हम उस इन्सान का प्यार ठुकरा देते हैं जो सच में हमें प्यार करता है|

“तो क्या तुम किसी और से प्यार करती हो?”

“प्यार? मुझे शायद ऐसा लगा था की मैं उससे प्यार करती हूँ लेकिन वह जो कुछ भी था बस प्यार नहीं था| प्यार का मतलब होता है किसी भी चीज़ की उम्मीद ना करना लेकिन हम असल में उसे इतना स्वार्थी बना देते हैं की हमें पता ही नहीं चलता की कब हमरा प्यार प्यार न रह कर एक जरुरत बन जाता है| और हम प्यार करने की बजाय उम्मीदों में फंस कर रह जाते हैं| और जब हमारी उम्मीद पूरी नहीं होती तो हम बदला लेने पर उतर आते हैं|”

“क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ|”

“मैं इतना आगे निकल आई हूँ लगता है मैं खुद अपनी मदद नहीं कर सकती हूँ| अगर आप को पता चलेगा की मैं क्या कर रही हूँ तो शायद आप मुझ वैसे पसंद न करे जैसा आप अभी करते हैं|”

“लेकिन....|”

“मुझे लगता है मुझे अब चलना चाहिए|” सुजाता ने उठते हुए कहा|

“मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ|”

सुजाता विक्रम की तरफ देख कर मुस्कुराई| उसे इस दिन का न जाने कब से इंतज़ार था जब कोई उससे कहता की वह उससे प्यार करता है, उसकी जरूरतों का ख्याल रखता, उसे घर छोड़कर आता| लेकिन सुजाता ने एक गलती की, उसने एक गलत इन्सान से इन सब की उम्मीद की| और आज जो कुछ सुजाता कर रही थी इसी गलती का नतीजा था|

सुजाता जब होटल से बाहर निकली तो आठ बजने को थे| उसका फोन बजा| दूसरी तरफ अभय था| सुजाता ने फोन उठाया तो अभय ने उसे बताया की उसने सलोनी को तलाक़ के कागज दे दिए हैं और कुछ दिनों बाद वे दोनों साथ रह सकते हैं| अभय की बात सुनकर सुजाता ने फोन काट दिया| उसका मकसद पूरा हो रहा था|

वही विक्रम अभी भी अपनी जगह पर ही बैठा हुआ था| सुजाता ने उसे क्या कहा और क्या नहीं उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था| उसने उसे ना तो हाँ कहा था और ना ही ना| वह कुछ देर वहाँ पर रुका और फिर अपने घर की तरफ चल दिया|

जब सुजाता घर पहुँची तो वह पहले वाली सुजाता नहीं रह गयी थी| वह उस सुजाता जैसी तो बिल्कुल नहीं थी जो चार साल पहले थी, भोली, मासूम| आज उसकी सारी मासूमियत जा चुकी थी| आज वह बदला लेने वाली सुजाता बन चुकी थी जो बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी| आज सुजाता को समझ आ रहा था की उसने कभी भी अभय से प्यार किया ही नहीं था| वह तो अभय को पाने की एक चाहत भर थी| अगर वह सच में अभय से प्यार करती तो इस तरह उसका घर नहीं बर्बाद करती| लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| उसे जो करना था वह कर चुकी थी| अब उसे बस उस दिन का इंतज़ार था जब अभय उसके पास आयेगा और वह उसे उसी तरह से अपनी जिंदगी से निकाल देगी जैसे अभय ने तीन साल पहले उसे अपनी जिंदगी से निकाला था|

सुजाता यह सब सोच ही रही थी की उसके घर की घंटी बजी| वह उठकर देखने नहीं गयी की दरवाजे पर कौन था| उसे लगा जो कोई भी होगा थोड़ी देर बाद चला जायेगा| लेकिन दस मिनट बाद घंटी फिर बजी| सुजाता ने घड़ी की तरफ देखा रात के दस बज रहे थे| इस वक्त शायद हो कोई उससे मिलने आता था| जब उसने दरवाज़ा खोला तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था विक्रम उसके सामने खड़ा था| वह थोड़ा परेशान लग रहा था|

“मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था| मैं बस तुमसे इतना कहना चाहता हूँ की मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और हमेशा ही तुमसे प्यार करता रहूँगा|”

विक्रम की बात सुनकर सुजाता की आँखों से आंसू बहने लगे| उसे लगा उसके शरीर में जान ही नहीं बची थी की वह अपने पैरों पर खड़ी रह पाये| वह गिरने ही वाली थी की विक्रम ने उसे अपनी बाँहों में थाम लिया| सुजाता कुछ देर उसके सीने से लगी यूँ ही सिसकती रही|

विक्रम की बाँहों में आकर आज उसे समझ आ रहा था की प्यार होता क्या है| आज इस पल वह अभय, सलोनी, अपना बदला सब को भूल चुकी थी| उसे याद था तो बस विक्रम जिसके सीने से वह लिपटी हुई थी, जिसके तेज़ धड़कते दिल की आवाज वह सुन सकती थी| उसे इसी मरहम की जरुरत थी जिसके लिए वह पिछले तीन साल से तड़प रही थी| उसे पता ही नहीं था की उसके बदले की आग अभय से बदला लेकर नहीं बल्कि विक्रम के प्यार से बुझेगी|

सुजाता रातभर विक्रम की बाँहों में ही बैठी रही| सुबह होने को थी लेकिन उन दोनों ने एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं कहा था| शायद उन्हें अपना प्यार जताने के लिए शब्दों की जरुरत ही नहीं थी|

सुजाता ने घड़ी की तरफ देखा सुबह के चार बजे थे| विक्रम की आँखे बंद थी और उसने सोफे पर अपना सिर टिकाया हुआ था| शायद वह हल्की नींद में था| सुजाता ने जब उसका हाथ हिलाया तो वह उठ गया|

“एक काम है जो मुझे पूरा करना है| क्या आप मेरे साथ चलेंगे?” सुजाता ने विक्रम से कहा|

“हाँ|”

और वे दोनों सलोनी के घर की तरफ बढ़ चले| सुजाता ने फोन करके अभय को भी वही पर आने के लिए कहा|

जब वे दोनों सलोनी के घर पहुँचे तो दो अनजान लोगों को इतनी सुबह अपने घर देखकर वह हैरान थी| सुजाता को वह पहली बार देख रही थी| अभय ने कभी भी सलोनी से सुजाता के बारे में बात नहीं की थी| जितनी हैरान सलोनी थी उतना ही हैरान अभय भी था| उसे समझ नहीं आ रहा था की सुजाता ने उसे इस तरह सलोनी के घर क्यों बुलाया था और वो भी तब जब वह उससे शादी करने को तैयार था|

“सलोनी मुझे पता है अभी जो कुछ भी मैं कहने जा रही हूँ उसे सुनकर शायद तुम्हें हैरानी हो क्योंकि जो कुछ भी हुआ उसमे तुम्हारी कोई गलती नहीं थी| बल्कि इसमे किसी की भी कोई गलती नहीं थी जो कुछ भी हुआ वो सब मेरी वजह से हुआ| मैं ही हूँ जिसकी वजह से अभय तुम्हें तलाक देने वाला है| मैंने ही उसे ऐसा करने के लिए भड़काया था|”

अभय और सलोनी दोनों अपना मुहँ खोले हैरानी से उसे देख रहे थे|

“सुजाता ये तुम क्या कह रही हो| तुमने मुझे किसी भी चीज के लिए नहीं भड़काया| मैं खुद सलोनी को तलाक दे रहा हूँ|”

“ऐसा तुम्हें लगता है अभय| मैं तुमसे कभी शादी नहीं करने वाली थी| मैं बस इतना चाहती थी की तुम्हारा और सलोनी का रिश्ता टूट जाये|”

“लेकिन तुम ऐसा क्यों चाहती थी? और हमारा रिश्ता तो पहले से ही टूट चुका था|”

“तुम चाहते तो अपने रिश्ते को बचा सकते थे और तुम ऐसा कर भी रहे थे लेकिन मैंने तुम्हारे दिमाग में सलोनी को तलाक देने की बात डाली| अगर मैं तुमसे ये न कहती की मैं तुमसे प्यार करती हूँ और तुमसे शादी करुँगी क्या तब भी तुम सलोनी को तलाक देते?”

अभय के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था| शायद सुजाता ठीक कह रही थी| अगर सुजाता ने उससे शादी करने के लिए हाँ नहीं कहा होता तो शायद वह सलोनी को तलाक देने की सोचता भी नहीं| सुजाता के आने से पहले वह अपना रिश्ता बचाये रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा था|

“लेकिन तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मैं तो तुम्हें अपना अच्छा दोस्त समझता था?”

“तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यही थी की तुम मुझे अपना दोस्त समझते थे जबकि मैंने तुम्हें अपना दोस्त माना ही नहीं था| तुम शायद भूल गये मैं हमेशा से तुमसे प्यार करती थी या शायद मैं ऐसा समझती थी की मैं तुमसे प्यार करती हूँ| और जब तुमने सलोनी से शादी की तो मुझे लगा की तुमने मुझे ठुकरा कर सलोनी से शादी की है|”

“लेकिन ऐसा कभी भी नहीं था| मैंने कभी भी तुमसे प्यार नहीं किया और मैंने कभी भी तुमसे ऐसा नहीं कहा| अगर तुम आज भी मुझसे पूछोगी तो मैं यही कहूँगा| मैं आज भी तुमसे प्यार नहीं करता| मेरी जिंदगी में सिर्फ सलोनी है जिससे मैंने प्यार किया था|

सलोनी अभय की तरफ देख रही थी| उसकी आँखे भर आई थी|

“मुझे पता है| मैं पिछले तीन सालों से इसी गलतफहमी में जी रही थी| लेकिन आज मुझे समझ आ चुका है| इसलिए मैंने तुम्हें यहाँ पर बुलाया है यह सब बताने के लिए की तुम सलोनी के साथ अपना रिश्ता मत तोड़ो| और सलोनी मैं तुमसे भी यही कहूँगी की चाहे जो भी नाराजगी हो अभय तुमसे से बहुत प्यार करता है|

सुजाता और विक्रम दोनों सलोनी के घर से बाहर निकले तो सूरज निकल आया था| सुजाता के लिए आज का दिन एक नई शुरुआत लेकर आया था| अब उसके सीने में कोई गम नहीं बचा था| जो कुछ भी था उसे विक्रम के प्यार ने साफ कर दिया था| विक्रम ने उसे ऐसा काम करने से बचा लिया था अगर वह हो जाता तो वह जिंदगी भर अपने आप से ही नज़रे नहीं मिला पाती| आज खुद को वह वही पुरानी वाली सुजाता महसूस कर रही थी|

बाहर ठंडी हवा चल रही थी| विक्रम प्यार से सुजाता की तरफ देख रहा था|

“आप मुझ से इस बात से नाराज तो नहीं|” सुजाता ने धीरे से उससे पूछा| लेकिन विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया| उसने सुजाता को अपनी तरफ खिंचा और प्यार से उसे चूम लिया| सुजाता के लिए यही काफी था|

Saturday, 21 November 2015

सुजाता की कहानी-11

विक्रम जब अपनी सुबह की मीटिंग खत्म करके तीन बजे ऑफिस पहुँचा तो सुजाता उसके सामने खड़ी शाम को होने वाली मीटिंग के बारे में बता रही थी| लेकिन विक्रम ने उसकी कही एक बात को भी नहीं सुना था| वह सिर्फ यही सोच रहा था की किस तरह सुजाता से बात की जाये| उसने रातभर उन बातों को मन में दोहराया था जिसे वह सुजाता को कहने वाला था| लेकिन ना जाने क्या बात थी की वह कुछ बोल नहीं पा रहा था| उसे शायद सुजाता को बाहर ले जाना पड़ेगा ताकि वह अकेले में उससे बात कर सके|

“आज शाम तुम क्या कर रही हो|” विक्रम ने सुजाता को बीच में ही टोकते हुए कहा|

“जी कुछ नहीं|” हालाँकि सुजाता को शाम को अभय से मिलना था लेकिन उसने विक्रम को नहीं बताया की उसे किसी से मिलने जाना था|

“शाम को छह बजे एक मीटिंग है क्या तुम मेरे साथ चल पाओगी?” विक्रम ने बिना उसकी तरफ देखे सुजाता से पूछा|

सुजाता को इससे कोई परेशानी नहीं थी| अभय से मिलना आज उसके लिए ज़रूरी नहीं था| वह सिर्फ एक कारण से उसे मिलती थी और वह था उसे दर्द में देखना| वह किसी को समझा नहीं सकती थी की अभय को इस तरह से तड़पते हुए देखकर उसे कितनी खुशी मिलती थी| और आज हालात ऐसे हो गये थे की अभय वक्त से पहले ही आकर उसका इंतज़ार करता था और उसे घर जाने की जल्दी भी नहीं रहती थी| आज वह जितना ज्यादा हो सके उतना वक्त सुजाता के साथ बिताना चाहता था|

“ठीक है|” सुजाता ने कहा| वह मन ही मन खुश हो रही थी यह सोचकर की अभय एक दिन उससे नहीं मिलेगा तो कितना परेशान होगा|

“ठीक है तुम तैयार रहना हम छह बजे यहाँ से निकलेंगे|”

सुजाता जब उसके कमरे से बाहर चली गयी तो विक्रम ने राहत की साँस ली जैसे उसने आधी लड़ाई जीत ली हो| अब बस सुजाता से बात करना बाकि बचा था और आज शाम को हर हालत में वह सुजाता से बात करके रहेगा उसने सोच लिया था|

विक्रम खुश भी था और थोड़ा बैचेन भी| उसने कभी किसी लड़की से इस तरह की बातें नहीं की थी| उसकी पहली और आखिरी गर्लफ्रेंड रुपाली जिसके साथ उसने आठ साल गुजारे थे उसे कॉलेज में मिली थी| वहाँ पर भी रुपाली ही थी जिसने विक्रम से अपने दिल की बात पहले कही थी| उसके चले जाने के बाद कभी भी किसी और लड़की से उसकी इतनी नजदीकी नहीं रही| और यहाँ पर एक बात और थी जो उसे डरा रही थी| सुजाता और लड़कियों की तरह नहीं थी जो हमेशा ही उसकी बाँहों में आने को तैयार रहती थी| वह उनसे एकदम अलग थी| विक्रम के स्टेटस और पर्सनालिटी का आज तक उस पर असर नहीं पड़ा था|

लेकिन यहाँ पर सुजाता और विक्रम दोनों ही गलत थे| विक्रम यह सोचता था की वह आज तक सुजाता पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाया था वही सुजाता को लगता था की विक्रम जैसा कामयाब और सुन्दर आदमी उसकी तरफ क्यों देखेगा जब उसके पीछे हजारों सुन्दर लडकियाँ पड़ी हुई थी| यहाँ तक की ऑफिस की लड़कियाँ भी विक्रम का ध्यान अपनी और आकर्षित करने की हमेशा ही कोशिश करती रहती थी| लेकिन सुजाता को विक्रम के साथ उस तरह का रिश्ता रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी जैसा की वो लडकियाँ चाहती थी| उसके लिये विक्रम चाँद की तरह था जिसे वह देख सकती थी, उसकी तारीफ कर सकती थी लेकिन उसके नज़दीक जाने या उसे पाने की कभी सोच भी नहीं सकती थी| इसलिए उसने हमेशा ही विक्रम से एक दूरी बनाये रखी थी| वे दोनों कई बार अकेले साथ बाहर मीटिंग के लिए जा चुके थे लेकिन न तो विक्रम ने ही उससे कभी ऑफिस के काम के अलावा किसी और बारे में बात की और ना ही कभी सुजाता ने उससे कोई बाहर की बात की| सुजता उससे तभी बात करती जब विक्रम उससे कुछ पूछता था और वह उसका जवाब देती थी|

सुजाता ने जब फोन पर अभय को बताया की आज वह उससे नहीं मिल पायेगी तो उसकी आवाज में मायूसी-सी आ गयी थी| उन्हें मिले अभी दो महीने ही हुए थे और अभय को लगने लगा था जैसे वह सुजाता के बगैर जी नहीं सकता था| वह जितनी जल्दी हो सके सलोनी से छुटकारा पाकर सुजाता से शादी कर लेना चाहता था| वह इस कदर सुजाता की बातों में आ गया था की उसे अब इस बात की परवाह भी नहीं थी की सलोनी उन दोनों की बेटी को हमेशा के लिए उससे दूर ले जाएगी| उसे लग रहा था की वह अब सुजाता के साथ नई शांति भरी जिंदगी गुजार सकेगा| उसे इस बात का अंदाज़ा तक नहीं था की सुजाता उसके साथ क्या करने वाली थी|

अभय से बात करके सुजाता और भी खुश थी| जैसा उसने सोचा था और जैसा वह चाह रही थी बिल्कुल वैसा ही हो रहा था| पिछले तीन साल से वह जिस आग में जल रही थी आज अभय की वैसी ही हालत देखकर उसके मन को शांति मिल रही थी|

विक्रम और सुजाता जब छह बजे ऑफिस से निकले तब भी सुजाता का चेहरा चमक रहा था| लेकिन जितना खुश सुजाता लग रही थी उतनी ही ज्यादा विक्रम की बैचेनी बढ़ती जा रही थी| विक्रम सुजाता को उसी फाइव स्टार होटल में ले गया था जहाँ वे अक्सर जाया करते थे| वे दोनों चुपचाप हमेशा की तरह उसी टेबल पर बैठे थे जिस पर वे अक्सर बैठा करते थे| सुजाता को लगा था की वे किसी का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन विक्रम को पता था की ऐसा कुछ नहीं था| उसका दिल जोरों से धड़क रहा था| उन्हें वहाँ बैठे-बैठे एक घंटा होने वाला था लेकिन विक्रम ने उससे कुछ नहीं कहा| दोनों चुपचाप अपनी कॉफ़ी पी रहे थे| सुजाता को इस तरह इंतज़ार करने की आदत पड़ गयी थी क्योंकि कई बार जिसके साथ मीटिंग होती थी वह आता ही नहीं था| और सुजाता को इस बात की भनक भी नहीं थी की विक्रम उसे बहाने से अपने साथ लेकर आता था ताकि वह कुछ अकेला वक्त उसके साथ गुजार सके| आज भी विक्रम वही कर रहा था|

“सुजाता तुम्हें पता है मैं तुम्हें अपने साथ आज यहाँ क्यों लेकर आया हूँ?”

“मीटिंग के लिए?”

“नहीं| मैं तुमसे कुछ और बात करना चाहता हूँ|”

सुजाता ने अपना कॉफ़ी का कप वापिस टेबल पर रख दिया| उसे लगा शायद विक्रम उससे ऑफिस के काम के बारे में कुछ बात करना चाहता है| आगे जो कुछ भी होने वाला था उसने सपने में भी नहीं सोचा था|

“देखो मुझे पता है.....” विक्रम बोलते-बोलते रुक गया| शायद वह सही शब्द खोजने की कोशिश कर रहा था| “आज कोई मीटिंग नहीं है| मैं तुम्हें अपने साथ लेकर आया हूँ क्योंकि मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी|”

सुजाता ने कोई जवाब नहीं दिया वह चुपचाप विक्रम की बातों को सुन रही थी|

“मैं जो कुछ भी कहने जा रहा हूँ उसका ऑफिस या ऑफिस के काम से कोई लेना देना नहीं है| मुझे पता है तुम सोच रही होगी ऐसी कौन सी बात है जो मैं तुमसे करने वाला हूँ| लेकिन मुझे गलत मत समझना क्योंकि मुझे नहीं पता की मैं किस तरह से तुम से यह बात करूँ|

अब सुजाता भी थोड़ा घबराने लगी थी| ना जाने विक्रम उससे क्या कहने वाला था|

“मैंने एक दिन तुम्हें किसी के साथ एक रेस्टोरेंट में देखा था........किसी लडके साथ...|” विक्रम बोलते-बोलते हिचकिचा रहा था|

विक्रम की बात सुनकर सुजाता के चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था की विक्रम उससे यह सब क्यों पूछ रहा था|

“वैसे मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है की तुम किस से मिलती हो और किस से नहीं और ना मैं कोई हूँ तुम्हें रोकने वाला...मैं बस....मैं बस इतना जानना चाहता था की क्या....क्या तुम किस को पसंद करती हो...मेरा मतलब है क्या तुम किसी के साथ किसी रिलेशनशिप में हो|”

सुजाता को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था जो कुछ भी वह विक्रम के मुहँ से सुन रही थी| ऑफिस का अगर कोई और लड़का होता तो वह यकीन कर भी सकती थी लेकिन विक्रम....विक्रम उसकी पहुँच से बहुत दूर था|

“देखो तुम मुझे गलत मत समझना मैं सिर्फ बात करना चाहता हूँ| अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा है तो तुम मना कर सकती हो मैं तुमसे दुबारा इस बारे में बात नहीं करूँगा|”

सुजाता को मानो करंट लग गया हो| वह अपनी कुर्सी पर पत्थर की तरह बैठी हुई थी| उसे लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रही थी|

“सुजाता तुम सुन रही हो ना....सुजाता|”

सुजाता ने विक्रम की तरफ देखा| वह पहली बार उसके मुहँ से अपना नाम इतनी बार सुन रही थी|

“मैं....|” सुजाता ने धीरे से कहा| उसके मुहँ से आगे कोई शब्द नहीं निकला|

“देखो मैं जनता हूँ की मेरे इस तरह अचानक तुमसे ये सब बातें पुछने पर तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है| लेकिन यह सब जाने बगैर मैं तुमसे वो सब बातें नहीं कर सकता हूँ जो की मैं करना चाहता हूँ| मैं बस यह जानना चाहता हूँ क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई और है|”

“नहीं|” सुजाता ने धीरे से कहा| वह वहाँ से चले जाना चाहती थी| लेकिन फिर भी ना जाने क्यों वहाँ बैठे भी रहना चाहती थी| विक्रम जैसे व्यक्ति से इस तरह की बातों की उम्मीद उसे कभी नहीं थी| वह और सुनना चाहती थी की आखिर वह उससे कहना क्या चाहता था|

“देखो मुझे पता है तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है क्योंकि मुझे भी तुमसे यह सब बातें करते हुए अजीब लग रहा है| आज तक हमारे बीच का रिश्ता सिर्फ एक बॉस और सेक्रेटरी का था लेकिन मुझे पता ही नहीं चला की कब तुम मुझे अच्छी लगने लगी| मैंने कई बार तुमसे इस बारे में बात करनी चाही लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हुई| और मुझे आज भी नहीं पता था की मैं तुमसे कैसे अपने दिल की बात कहूँ|” विक्रम के हर शब्द के साथ सुजाता की हैरानी बढ़ती जा रही थी| प्यार करना तो बहुत दूर की बात थी आज तक किसी ने उससे यह तक नहीं कहा था की वह उसे पसंद करता है| और जहाँ तक अभय की बात थी वह उसके पास इसलिए आया था क्योंकि सलोनी ने उसे ठुकरा दिया था| अगर उसके और सलोनी के बीच में सब कुछ ठीक चल रहा होता तो क्या वह उसे याद करता, शायद कभी नहीं|

Sunday, 11 October 2015

सुजाता की कहानी-10

सुजाता आईने के सामने बैठी थी और अपने बाल संवार रही थी| उसके चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान थी| यह मुस्कान उसकी जीत की थी| अभय से मिलने से पहले उसने सोचा भी नहीं था की वह इस तरह उसके सामने बिखर जायेगा| आज जो कुछ भी हुआ था उसकी उम्मीद से कुछ ज्यादा ही था| अगर उसे दुनिया की सारी धन-दौलत भी मिल जाती तो वह इतनी खुश नहीं होती जितना वह आज थी क्योंकि वह धन-दौलत अभय के सामने कुछ भी नहीं थी| लेकिन वह इसलिए खुश नहीं थी क्योंकि अभय सलोनी को उसके लिए छोड़ रहा था और उसके साथ शादी करने के लिए तैयार था| वह तो बस अभय को चोट पहुँचाना चाहती थी, उतनी ही जितनी उसे पहुँची थी जब अभय ने सलोनी के साथ शादी की थी| अभय से बात करके उसे समझ आ गया था की उन दोनों का रिश्ता टूटने की कगार पर पहुँच चुका था और सिर्फ अभय ही था जो इस रिश्ते को बचाने की कोशिश कर रहा था क्योंकि वह आज भी उससे उतना ही प्यार करता था जितना उस वक्त करता था जब उन दोनों की शादी हुई थी| सुजाता ने सोच लिया था की वह इस रिश्ते को पूरी तरह से बर्बाद कर देगी, इतना की अभय के पास कोई मौका ना बचे सलोनी के पास वापिस जाने का| और जब तक अभय को इस बात का एहसास होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी|

सलोनी आराम से अपने बिस्तर पर लेटी थी| पिछले चार सालों से जिस चैन की उसे तलाश थी आज वह उसे मिल गया था| लेटे-लेटे वह यही सोच रही थी की जब अभय सलोनी को पूरी तरह से छोड़कर उसके पास आयेगा तो वह उसी तरह उसे दुत्कार देगी जैसा अभय ने उसके साथ चार साल पहले किया था| शायद तब उसकी असली जीत होगी|

सलोनी ने कभी सोचा भी नहीं था की किसी से बदला लेने के लिए वह इस हद तक जा सकती थी| ऐसा नहीं था की किसी ने कभी उसे चोट नहीं पहुँचाई थी| लोगों ने कई बार उसके भोलेपन और सरलता का फायदा उठाया था लेकिन वह हमेशा ही उन्हें माफ़ करके आगे बढ़ जाया करती थी| लेकिन अपना दिल टूटने पर वह ऐसा नहीं कर पायी| वह हमेशा ही बदले की आग में जलती रही और यही सोचती रही की किस तरह वह अभय को उस दर्द का एहसास करवा सके जो उसने उसे पहुँचाया था| ऐसा सुजाता सोचती थी की अभय ने उसे सलोनी के लिए ठुकरा दिया था| लेकिन सच उससे एकदम अलग था| उनके बीच में कभी ऐसा रिश्ता ही नहीं था की ऐसा कहा जा सके की अभय ने सलोनी का दिल तोड़ा था| लेकिन सुजाता ने अपने दिल टूटने का कारण हमेशा ही अभय को माना था| वह सलोनी से भी उतनी ही नफरत करती थी जितनी की अभय से|

सुबह जब सुजाता ऑफिस पहुँची तब भी वह चहक रही थी| किसी ने इस बात पर ध्यान दिया हो या नहीं लेकिन विक्रम उसके चेहरे की रौनक देखकर समझ गया था की ज़रूर ही कुछ खास बात थी| उसने उसे इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था| लेकिन उनके बीच में कभी इस तरह का रिश्ता ही नहीं रहा की वह उससे पूछ सके की वह इतनी खुश क्यों थी| उसके मन में कई तरह के ख्याल आ रहे थे और उनमें से एक था, जो की हर उस आदमी के मन में आता है जो किसी से प्यार करता है, कही वह किसी और से प्यार तो नहीं करती| इस ख्याल से ही विक्रम का मन बैचेन हो उठा था| वह अपने ख्यालों में इतना खोया हुआ था की उसने सुजाता की कही गयी एक भी बात को नहीं सुना जो उसके सामने खड़ी आज के कार्यक्रम और मीटिंग के बारे में बता रही थी| विक्रम ने एक नज़र सुजाता के चश्मे लगे सांवले चेहरे पर मारी| सुजाता अपनी डायरी में से पढ़कर उसे आज होने वाली मीटिंग के बारे में बता रही थी| वह एकटक उसे देख रहा था जैसे उसके चेहरे से पढ़ने की कोशिश कर रहा हो यह जानने के लिए की वह इतना खुश क्यों थी| सुजाता ने कुछ देर बाद बोलना बंद किया| विक्रम ने अपने सामने रखी फ़ाइल को खोला और उसे पढ़ने का नाटक करने लगा| सुजाता भी मीटिंग के बारे में बता कर वापिस अपने डेस्क पर आ गयी|

विक्रम सुजाता को बहुत पसंद करता था| या फिर एक तरह से कहा जाये उससे प्यार करने लगा था| लेकिन उसके अन्दर कभी हिम्मत नहीं आई की वह सुजाता से इस बारे में बात कर सके| वैसे यह भी एक अजीब विडम्बना थी की वह शक्स जिससे ज्यादातर लोग डरते थे आज खुद डर रहा था अपने दिल की बात करने में| ऐसा नहीं था की उसने पहले कभी इस बारे में कोशिश नहीं की थी| कई बार वह क्लाइंट मीटिंग के बहाने सुजाता को अपने साथ लंच पर ले जाता था जबकि वहाँ पर किसी को नहीं आना होता था और वे दोनों अकेले लंच कर रहे होते थे| वह उससे अपने दिल की बात करना चाहता था लेकिन जब भी वह सुजाता की तरफ देखता था उसकी हिम्मत जवाब दे जाती थी| उसे पता था की उसके स्टेटस की वजह से सेकड़ों लडकियाँ उसके पीछे थी| शादी करना तो बहुत दूर की बात थी वे तो उसकी गर्लफ्रेंड बनकर ही खुश हो जाती| लेकिन जैसा असर वह दूसरों पर डालता था वैसा प्रभाव वह आज तक सुजाता पर नहीं डाल पाया था| सुजाता ने उसे कभी अपने बॉस से ज्यादा नहीं माना| वह तो कभी उसकी तरफ देखती भी नहीं थी|

विक्रम को लगा था की उसे धीरे-धीरे कोशिश करनी चाहिये लेकिन आज सुजाता की ख़ुशी देखकर उसे डर लगने लगा था| अपने ऑफिस के कमरे में बैठा वह यही सोच रहा था की कैसे वह इस बारे में पता लगाये| खुद वह सुजाता से सीधे-सीधे पूछ नहीं सकता था और ना ही ऑफिस में किसी से इस बारे में बात कर सकता था| लेकिन उसे कोई ना कोई तरीका निकालना ही होगा| सारा दिन वह इसी बारे में सोचता रहा| यहाँ तक की ऑफिस में होने वाली मीटिंग पर भी उसका ध्यान नहीं था| फिर उसने वह किया जो उसने भी सुजाता की तरह नहीं सोचा था वह कभी करेगा|

छह बजते ही सुजाता ऑफिस से निकल गयी| वह आज भी अभय से मिलने वाली थी| विक्रम भी चुपचाप उसके पीछे चल दिया| सुजाता ऑटो में थी और विक्रम अपनी कार में| सुजाता जब रेस्टोरेंट पहुँची तो अभय पहले से ही उसका इतंजार कर रहा था| विक्रम भी अपनी कार से उतरकर यह देखने के लिए चल दिया की सुजाता किससे मिलने जा रही थी| बार-बार उसका मन यह कह रहा था की यह उसकी कोई सहेली हो| लेकिन जिसका उसे डर था वही हुआ| अभय को सुजाता के साथ देखकर और उन दोनों के चेहरे की मुस्कान को देखकर विक्रम समझ गया था की उसका डर सही था| वह वापिस अपनी कार में आया और अपने घर की तरफ चल दिया|

विक्रम यही सोच रहा था की शायद उसने देर कर दी, शायद उसे सुजाता से पहले ही बात कर लेनी चाहिए थी| लेकिन अब क्या? उसे अब क्या करना चाहिए? क्या सुजाता से इस बारे बताना चाहिए? लेकिन अब देर हो चुकी थी| लेकिन शायद इतनी भी नहीं| क्या पता जैसा वह सोच रहा था वैसा ना हो? क्या पता वे दोनों सिर्फ दोस्त हो? उसे एक बार तो कोशिश करके देखना चाहिए| और बिना सुजाता से बात किये वह कैसे जान सकता है की वह किसी से और प्यार करती है| उसने सोच लिया था की वह कल ही सुजाता से बात करेगा चाहे कुछ भी हो जाये| वह ज़रूर उसे अपने दिल की बात बतायेगा फिर बाकि उसकी मर्जी चाहे वह हाँ कहे या ना| रातभर विक्रम अपने बिस्तर पर करवटें बदलता रहा| वह यही सोच रहा था की किस तरह उसे सुजाता से बात करनी चाहिए| उसे इस बात की फ़िक्र थी की कहीं वह बुरा ना मान जाये, लेकिन उससे भी ज्यादा उसे इस बात की फ़िक्र थी की वह उससे बात कर भी पायेगा या नहीं| मन ही मन उसने सैंकड़ों बार उन बातों को दोहराया था जिसे वह कल सुजाता को कहने वाला था| इतनी बैचेनी भरी रात उसने कभी नहीं बितायी थी| शायद तब भी नहीं जब छोटी उम्र में ही उसके हाथ में इतनी बड़ी कंपनी की बागडोर आ गयी थी या जब उसकी गर्लफ्रेंड उसे छोड़कर चली गयी थी|

Monday, 28 September 2015

सुजाता की कहानी-9


सुजाता तैयार थी| आज उसकी आँखों पर उसका चश्मा नहीं था बल्कि लेंस थे जिन्हें उसने कल ही ख़रीदा था| उसने अपना सबसे बढियावाला सूट पहना हुआ था और अपने लंबे बालों को खुला छोड़ दिया था, आँखों में काज़ल, और होंटों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक| अपने आप को वह पहले कभी इतनी सुन्दर नहीं लगी जितना वह आज लग रही थी| आज कुछ अलग ही बात थी| उसका चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक थी| इतनी खुश शायद वह पहले कभी नहीं हुई होगी, तब भी नहीं जब उसे नौकरी मिली थी|

सुजाता जब अभय की बताई हुई जगह पर पहुँची तो अभय उसका पहले से ही इंतज़ार कर रहा था| उसे देखते ही वह उठकर खड़ा हो गया| पिछले तीन सालों में सुजाता एकदम बदल गयी थी| वह वैसी ही थी दुबली-पतली लेकिन उसके कपड़े पहनने का तरीका एकदम बदल गया था| मोटे चश्मे की जगह लेंस ने ले ली थी|

अभय भी पहले से काफ़ी बदल गया था| उसका पतला शरीर अब भर गया था, बालों का स्टाइल भी बदल गया था| अब वह पहले से कही ज़्यादा आकर्षक लग रहा था लेकिन उसके चेहरे की मुस्कराहट कहीं गायब थी| सुजाता उसकी आँखों के नीचे काले गड्डे भी देख सकती थी|

“क्या हुआ|”

“नहीं कुछ नहीं”, अभय ने सुजाता के चेहरे से अपनी नज़रें हटाते हुए कहा|

और दोनों अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ गये|

कुछ देर के लिये दोनों चुपचाप ही बैठे रहें| सुजाता ख़ामोशी से अभय के बोलने का इंतज़ार कर रही थी| वही था जो हमेशा बातचीत की शुरुआत करता था|

“क्या हुआ”, अभय को हल्का-हल्का मुस्कुराता देख सुजाता ने उससे पूछा, “कुछ हुआ है क्या?”

“नहीं, कुछ नहीं|”

“तो फिर तुम मुस्कुरा क्यों रहे हो?”

“तुम्हें देखकर|”

“मुझे देखकर? क्या मेरे चेहरे पर कुछ लगा है|”

“नहीं, कुछ नहीं| मैं बस यही सोच रहा था की इतने सालों में तुम कितना बदल गयी हो|”

सुजाता ने महसूस किया की अभय उससे बात करते हुए थोड़ा हिचकिचा रहा था| उसकी मुस्कुराहट उसके चेहरे की परेशानी छुपाने की कोशिश कर रही थी| वह शायद कुछ कहना चाहता था लेकिन कह नहीं पा रहा था|

“तुम कुछ परेशान लग रहे हो|”

“नहीं, नहीं तो|”

“क्या बात है? तुम्हारी आँखे देखकर लगता है तुम सही से सो नहीं रहे हो|”

अभय ने सुजाता को कुछ देर के लिए देखा फिर उसने अपना सिर झुका लिया|

“क्या बात है बताओ मुझे|”

“बस कुछ फॅमिली प्रॉब्लम है|”

“कैसी प्रॉब्लम?”

“ज्यादा कुछ नहीं बस वही मियां-बीवी के झगड़े|”

सुजाता को पता था की अभय बात को टालने की कोशिश कर रहा था| लेकिन उसे समझ आ गया था की उसके और सलोनी के बीच सबकुछ ठीक नहीं है| वह सब कुछ जानना चाहती थी लेकिन उसने अभय पर ज्यादा ज़ोर नहीं डाला|

“तुम अगर नहीं बताना चाहते तो ठीक है|”

अभय ने सुजाता की तरफ देखा| वह किसी दुविधा में लग रहा था| वह बोलना तो चाहता था लेकिन बोल नहीं पा रहा था| लेकिन सुजाता को पता था की अभय ने उसे बुलाया ही इस बारे में बात करने के लिए है|

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है| मैं बस अपनी परेशानियों से तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था|”

“अगर तुम सच में मुझे अपना दोस्त मानते हो तो ऐसा क्यों सोचते हो की मैं तुम्हारे दुःख में तुम्हारा साथ नहीं दूँगी|”

“ना जाने सलोनी को क्या हो गया है| हम जब भी साथ होते हैं सिवाये लड़ने के और कुछ नहीं करते|”

“लेकिन तुम तो एक-दूसरे से प्यार करते थे?”

“हाँ| लेकिन अब लगता है प्यार सिर्फ मैं उससे करता था| और उसने मुझ से शादी क्यों की मुझे नहीं पता| शादी के एक साल बाद ही उसने मुझ से डिवोर्स मांगना शुरू कर दिया था| मैंने उसे बहुत समझाया लेकिन उसे पता नहीं क्या हो गया था| और जब मैंने उसे मना किया तो वह घर छोड़कर चली गयी| लेकिन जब उसे पता चला की वह माँ बनने वाली है तो वह वापिस लौट आई| मुझे भी लगा की वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा लेकिन हमारी बेटी के पैदा होने के बाद भी हमारे बीच की दुरी कम नहीं हुई| उसने डिवोर्स मांगना तो बंद कर दिया लेकिन हमारे बीच सब कुछ वैसा नहीं रहा जैसा पहले था|”

अभय की बात सुनकर सुजाता की आँखों में चमक आने लगी थी| अभय को शायद पता भी नहीं था की सुजाता का मन ख़ुशी से फुला नहीं समां रहा था|

“सुजता तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो| मुझे पता था की एक तुम ही मेरी परेशानी को समझ सकती हो| मैं सलोनी से बहुत प्यार करता हूँ| लेकिन अब कुछ नहीं बचा| जिंदगी मानो ख़त्म हो गयी है जैसे कुछ बचा ही नहीं करने को| जब सलोनी मुझे छोड़कर चली गयी थी तो मुझे समझ आया की तुम किस प्यार के बारे में बोल रही थी और तुम्हारे ऊपर क्या बीती होगी|”

सुजाता ने उसे थोड़ा हौसला दिया, “जो होना था हो चुका| तुम्हें अब यह सब भूलकर आगे बढ़ जाना चाहिए|”

“लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है| मैंने सलोनी को मनाने की हर तरह से कोशिश की लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है|”

“तो तुम उसे डिवोर्स क्यों नहीं दे देते जैसा की वह चाहती है|”

सुजाता की बात सुनकर अभय कुछ देर तक कुछ नहीं बोला| उसे पता था की सलोनी के बिना जिंदगी के बारे में सोचना कितना मुश्किल है| और अगर सलोनी जाएगी तो वह उनकी बेटी को भी अपने साथ ले जायेगी|

“देखी तुम्हारी जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है| मैं मानती हूँ की तुम सलोनी से प्यार करते हो लेकिन ऐसे इन्सान के साथ रहना जो तुम्हारे साथ ना रहना चाहता हो ठीक नहीं है| क्या पता तुम्हें कोई और प्यार करने वाला मिल जाये|”

अभय ने सुजाता की आँखों में देखा| उसे पता था की सुजाता उसे प्यार करती थी| लेकिन क्या वह अब भी उससे प्यार करती है? क्या वो सलोनी का साथ छोड़कर किसी और के साथ अपनी नई जिंदगी बसा सकता है? सलोनी शायद अब उससे प्यार नहीं करती थी लेकिन उसे एक बात की तस्सली थी की वे दोनों साथ थे| सलोनी का साथ ही अभय के लिए काफी था|

“लेकिन मैं......|”

“देखो मुझे पता है की तुम्हारे लिए यह सब आसान नहीं होगा लेकिन कभी-कभी हमें ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनके बारे में हमने कभी सोचा भी ना हो|”

“क्या मैं तुमसे एक बात पूछूँ अगर तुम बुरा ना मानो तो?”

“हाँ|”

“क्या तुम आज भी मुझसे प्यार करती हो?”

सुजाता को इसी सवाल का इंतज़ार था और उसे पता था की उसे क्या करना था|

“हाँ| तुम पहले इन्सान थे जिसे मैंने प्यार किया और शायद में आज तक तुमसे प्यार करती हूँ| तुम्हारे अलावा मैंने आज तक किसी और के बारे में सोचा ही नहीं|”

“अगर मैं सलोनी को डिवोर्स दे दूँ तो क्या तुम मुझसे.......?”

“हाँ|” सुजाता ने अभय का सवाल खत्म होने से पहले ही उसे जवाब दे दिया|

अभय कुछ देर तक आश्चर्यचकित-सा उसे देखता रहा| उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं था की सुजाता उससे इतना प्यार करती थी की तुरंत ही उससे शादी करने के लिए तैयार हो जाएगी|

“मुझे नहीं पता था की तुम मुझसे इतना प्यार करती हो|”

“मुझे भी आज ही इस बात का एहसास हुआ|”

“मुझे आज लग रहा है की मुझे सलोनी की बजाय तुमसे शादी करनी चाहिए थी| मैंने गलती की| मैं सलोनी की सुन्दरता में इतना खो गया था की मैं तुम्हारे प्यार को समझ ही नहीं सका|”

“लेकिन अब तुम्हारे पास अपनी गलती को सुधारने कम मौका है|” सुजाता ने अभय के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा|

अभय को अपना दर्द थोड़ा कम होता महसूस हुआ| जिस प्यार को वह सलोनी से पाना चाह रहा था क्या पता वह उसे सुजाता से मिल जाये| सलोनी से लड़-लड़कर वह इतना तंग आ चुका था अब वह अपनी जिंदगी आराम से जीना चाहता था| शायद सुजाता उसे वह सुकून दे सके| लेकिन वह अपनी बेटी के बारे में भी सोच रहा था जिसे वह बहुत प्यार करता था| उसे पता था की अगर उसने सलोनी को डिवोर्स दे दिया तो अपनी बेटी से मिलना उसके लिए कितना मुश्किल हो जायेगा| सलोनी उनकी बेटी को लेकर अपने पिता के पास अमेरिका चले जाना चाहती थी|

लेकिन सुजाता ने उसे एक उम्मीद बंधाई थी| अपनी परेशानियों से निकालने का रस्ता अब उसे दिखने लगा था|