नीलोफ़र के पेट में चार दिन बाद कुछ गया था| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह क्यों जिन्दा थी या अपने आप को जिन्दा रखने के लिए क्यों इतनी मेहनत कर रही थी| इस वक्त उसे मरना ज्यादा आसान लग रहा था| क्योंकि अगर आज वह बच भी गयी तो फिर क्या? उसके परिवार का कोई भी अभी तक उसका पता लेने नहीं आया था| पता नहीं वे जिन्दा थे भी या नहीं? और सारी जिंदगी वह यहाँ तो नहीं रहेगी| आज नहीं तो कल वह आदमी उसे अपने घर से निकाल ही देगा| दो दिन की जिंदगी और लेकर अब वह क्या करेगी?
रात को अजीत फिर उसके लिए वही खाना ले आया था| दिन में दो बार वह उसे खाना दे जाता| कई बार वह उसके लिए दूध भी ले आता था| लेकिन उसने नीलोफ़र से कभी भी उसकी हालत के बारे में नहीं पूछा| नीलोफ़र सारा दिन यूँ ही बिस्तर में पड़ी रहती| वह अपने अब्बा, बहनों और परिवार के बारे में ही सोचती रहती थी| क्या वे सब उसे भूल गये? और कितने दिन वह आदमी उसे यहाँ अपने घर रखेगा? और आखिर वह उसे बचा क्यूँ रहा था जबकि वह खुद मुसलमानों को मारने में शामिल था?
नीलोफ़र को कई दिन गुजर गये थे उस कमरे में पड़े-पड़े| जब भी वह आदमी लौटकर आता तो सबसे पहले वह नीलोफ़र को खाना दे जाता| वही जो वह खुद खा रहा था| शायद वह किसी के घर से वो रोटी और सब्जी लेकर आता था| जब भी वह आता नीलोफ़र बिस्तर में दुबक जाती| हालाँकि वह उसकी तरफ देखता भी नहीं था| वह बस खाना रखता और दरवाज़ा बंद करके चला जाता|
अजीत अपने कमरे में बैठा उन रोटियों की तरफ देख रहा था जो उसके पिता के दोस्त जोगिन्दर की पत्नी रोज उसे बनाकर दे दिया करती थी| उनमें से दो वह नीलोफ़र को दे आया करता था| नीलोफ़र को उसने बचाया और उसे घर के अन्दर ले आया| लेकिन उसे उससे ज्यादा मतलब नहीं था| वो अगर उस भूसे के ढेर में मर भी जाती तो उसे ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ता| पिछले एक महीने में उसने इतनी मौत देखी थी की उसे ना तो अब किसी के जिन्दा होने से कोई फ़र्क पड़ता था और ना ही मरने से| उसने खुद इतनी हैवानियत दिखाई थी की वह खुद अब पत्थर बन चुका था| नीलोफ़र की तरह ही उसे खुद भी नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा था या फिर अपने आप को जिन्दा रखने की कोशिश क्यों कर रहा था? जिस तलवार से उसने उन लोगों को मारा था वह खुद अपना गला उससे काट लेना चाहता था ताकि जिस दर्द से वह गुजर रहा था उसे खत्म कर सके| लेकिन दूसरे के गले पर तलवार चलाना जीतना आसान होता है अपने गले पर उसे चलाना उतना ही मुश्किल|
उस दिन जब वह नीलोफ़र को खाना देने गया तो खाना देने के बाद भी वह वहीँ चौखट पर ही खड़ा रहा| उसे शायद समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरह नीलोफ़र से बात करे|
“तुम्हें अपने परिवार के बारे में कुछ पता है तो मुझे बता दो, मैं तुम्हें उनके पास छोड़ आऊँगा|” यह पहली बार था जब इतने दिनों में अजीत ने नीलोफ़र से कुछ कहा था| वह बात तो उससे कर रहा था लेकिन देख एक दिवार को रहा था|
“मुझे नहीं पता| मेरे अब्बा मुझे लेने आने वाले थे|” नीलोफ़र ने सहमी-सी आवाज में कहा|
“तुम्हारा घर कौन सा था?”
“कोई नहीं|”
“तो तुम यहाँ कैसे आयी?”
“मेरा घर लखनऊ में था लेकिन हम पाकिस्तान जाने वाले थे इसलिए मेरे अब्बा मुझे और मेरी बहन को यहाँ मेरे मामा के घर छोड़ गये थे|”
“तुम्हें अपना लखनऊ का पता याद है?”
नीलोफ़र खामोश थी| उसे कुछ याद नहीं था|
“तुम्हारा कोई और रिश्तेदार जो आस-पास रहता हो?”
“वो सब यहीं थे|”
“यहाँ तुम्हारे मामा का घर कौन-सा था?”
“वो बड़े टीले के पास जो पीली कोठी है उसके बगल वाली कोठी|”
“ठीक है मैं कुछ पता करता हूँ| तुम्हारे पिता का नाम क्या है?”
“मोहम्मद अब्बास|”
“और मामा का?”
"वाहिद खान|"
“और तुम्हारा नाम क्या है?”
“नीलोफ़र|”
नीलोफ़र से वह थोड़ी बहुत जानकारी लेकर अजीत अपने कमरे में लौट आया| लेकिन नीलोफ़र जिन लोगों की बात कर रही थी उसे उन लोगों के जिन्दा होने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी| उसे पता था की उस रात उन्होंने किसी को भी नहीं छोड़ा था| उसके मामा के घर पर हमला करने वाली भीड़ में वह भी शामिल था| और अगर कोई उनके हमले से बचकर भाग भी गया होगा तो वह शायद ही हिंदुस्तान में हो क्योंकि पाकिस्तान का बॉर्डर यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था| और उसके परिवार के बाकि लोग कहाँ पर होंगे यह कहना भी मुश्किल था क्योंकि कौन पाकिस्तान गया और कौन पाकिस्तान जाते हुए मारा गया इस बारे में पता करना नामुमकिन था|
“तुम्हें अगर कपड़े चाहिए तो वहाँ उस अल्मारी से ले सकती हो|” कहकर अजीत वहाँ से चला गया|
नीलोफ़र पलंग से उतरकर कमरे में रखी लकड़ी की अलमारी के पास गयी| उसने उसे खोलकर देखा| उसमे ढेर सारे सूट-सलवार भरे हुए थे| उसने उनमें से एक निकाला और पहन लिया| वह उसे थोड़ा ढीला था| फिर वह खिड़की की तरफ गयी| अजीत अन्दर के बरामदे में अपने कमरे के बाहर सीढ़ियों पर अपना सिर पकड़े बैठा था| उसे समझ नहीं आ रहा था की नीलोफ़र को बचाकर उसने गलती की या नहीं| लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| वह बस उसे किसी तरह इस गाँव से निकालना चाहता था| हालाँकि दंगे अब रुक चुके थे लेकिन लोगों के दिलों की कड़वाहट अभी भी कम नहीं हुई थी|
अगले कई दिन अजीत ने पाकिस्तान जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी इकटठा करते हुए बिताये| वह आस-पास के हर उस कैम्प में नीलोफ़र के पिता के नाम सन्देश लिखवा आया था की वह जिन्दा थी| वह सुबह नीलोफ़र को खाना देकर निकलता और शाम को भी खाना लेकर घर में आता| लेकिन कई दिनों तक उसे कोई ऐसा नहीं मिला जो उसे जनता हो|
नीलोफ़र की हालत भी थोड़ी सुधर चुकी थी लेकिन उसकी पीठ पर लगा जख्म अभी तक ठीक नहीं हुआ था| वह सारा दिन कमरे में ही पड़ी रहती थी| अजीत ज्यादातर वक्त घर पर होता नहीं था और उसकी गैरमौजूदगी में वह कभी कमरे से बाहर नहीं जाती थी|
एक दिन रात के अँधेरे में चुपचाप अजीत नीलोफ़र को लेकर घर से बाहर निकला| उसे पता था की अगर गाँव के किसी आदमी को भनक भी लगी तो वो दोनों ही जिन्दा नहीं बचेंगे| नीलोफ़र के पिता के बारे में छानबीन करते हुए उसे एक औरत मिली थी जो उसके पिता को जानती थी| शायद वह उनके पड़ोस में रहती थी| और लोगों की तरह वह भी अपने कुछ रिश्तेदारों को ढूढ़ रही थी| उसने अजीत को बताया की नीलोफ़र का परिवार उसे मरा समझकर पाकिस्तान जा चुका था| जब अजीत ने उसे नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने के लिए कहा वह नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने को तैयार हो गयी थी| अजीत नीलोफ़र को उसी के पास ले जा रहा था|
दोनों पैदल ही जा रहे थे| अजीत तेज़ कदमों से आगे-आगे और नीलोफ़र एक काली चादर में अपना सिर छुपाये धीमे कदमों से उसके पीछे-पीछे| कुछ-कुछ देर बाद वह पीछे मुड़कर देख लेता था की वह पीछे ही है| सुबह होते-होते वे उस कैंप तक पहुँच चुके थे जहाँ से बसों में भरकर लोग पाकिस्तान तक जा रहे थे| उस औरत ने उसे वही मिलने के लिए कहा था|
शाम होने लगी थी लेकिन उस औरत कही कुछ पता नहीं था| नीलोफ़र अपना सिर झुकाये एक पेड़ के नीचे बनी दिवार पर बैठी हुई थी| अजीत भी उसके पास ही खड़ा था| वह औरत कल उसे यही पर मिलने का वादा कर गयी थी| लेकिन सुबह से शाम घिर आयी थी| ज्यादातर लोग जो पाकिस्तान जाने के लिए वहाँ उस कैम्प में इकटठा हुए थे भी अब जा चुके थे| अजीत ने देखा की जोगिन्दर उसे देखकर उसकी तरफ बढ़ा चला आ रहा था| वह उसे देखकर घबरा गया था|
रात को अजीत फिर उसके लिए वही खाना ले आया था| दिन में दो बार वह उसे खाना दे जाता| कई बार वह उसके लिए दूध भी ले आता था| लेकिन उसने नीलोफ़र से कभी भी उसकी हालत के बारे में नहीं पूछा| नीलोफ़र सारा दिन यूँ ही बिस्तर में पड़ी रहती| वह अपने अब्बा, बहनों और परिवार के बारे में ही सोचती रहती थी| क्या वे सब उसे भूल गये? और कितने दिन वह आदमी उसे यहाँ अपने घर रखेगा? और आखिर वह उसे बचा क्यूँ रहा था जबकि वह खुद मुसलमानों को मारने में शामिल था?
नीलोफ़र को कई दिन गुजर गये थे उस कमरे में पड़े-पड़े| जब भी वह आदमी लौटकर आता तो सबसे पहले वह नीलोफ़र को खाना दे जाता| वही जो वह खुद खा रहा था| शायद वह किसी के घर से वो रोटी और सब्जी लेकर आता था| जब भी वह आता नीलोफ़र बिस्तर में दुबक जाती| हालाँकि वह उसकी तरफ देखता भी नहीं था| वह बस खाना रखता और दरवाज़ा बंद करके चला जाता|
अजीत अपने कमरे में बैठा उन रोटियों की तरफ देख रहा था जो उसके पिता के दोस्त जोगिन्दर की पत्नी रोज उसे बनाकर दे दिया करती थी| उनमें से दो वह नीलोफ़र को दे आया करता था| नीलोफ़र को उसने बचाया और उसे घर के अन्दर ले आया| लेकिन उसे उससे ज्यादा मतलब नहीं था| वो अगर उस भूसे के ढेर में मर भी जाती तो उसे ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ता| पिछले एक महीने में उसने इतनी मौत देखी थी की उसे ना तो अब किसी के जिन्दा होने से कोई फ़र्क पड़ता था और ना ही मरने से| उसने खुद इतनी हैवानियत दिखाई थी की वह खुद अब पत्थर बन चुका था| नीलोफ़र की तरह ही उसे खुद भी नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा था या फिर अपने आप को जिन्दा रखने की कोशिश क्यों कर रहा था? जिस तलवार से उसने उन लोगों को मारा था वह खुद अपना गला उससे काट लेना चाहता था ताकि जिस दर्द से वह गुजर रहा था उसे खत्म कर सके| लेकिन दूसरे के गले पर तलवार चलाना जीतना आसान होता है अपने गले पर उसे चलाना उतना ही मुश्किल|
उस दिन जब वह नीलोफ़र को खाना देने गया तो खाना देने के बाद भी वह वहीँ चौखट पर ही खड़ा रहा| उसे शायद समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरह नीलोफ़र से बात करे|
“तुम्हें अपने परिवार के बारे में कुछ पता है तो मुझे बता दो, मैं तुम्हें उनके पास छोड़ आऊँगा|” यह पहली बार था जब इतने दिनों में अजीत ने नीलोफ़र से कुछ कहा था| वह बात तो उससे कर रहा था लेकिन देख एक दिवार को रहा था|
“मुझे नहीं पता| मेरे अब्बा मुझे लेने आने वाले थे|” नीलोफ़र ने सहमी-सी आवाज में कहा|
“तुम्हारा घर कौन सा था?”
“कोई नहीं|”
“तो तुम यहाँ कैसे आयी?”
“मेरा घर लखनऊ में था लेकिन हम पाकिस्तान जाने वाले थे इसलिए मेरे अब्बा मुझे और मेरी बहन को यहाँ मेरे मामा के घर छोड़ गये थे|”
“तुम्हें अपना लखनऊ का पता याद है?”
नीलोफ़र खामोश थी| उसे कुछ याद नहीं था|
“तुम्हारा कोई और रिश्तेदार जो आस-पास रहता हो?”
“वो सब यहीं थे|”
“यहाँ तुम्हारे मामा का घर कौन-सा था?”
“वो बड़े टीले के पास जो पीली कोठी है उसके बगल वाली कोठी|”
“ठीक है मैं कुछ पता करता हूँ| तुम्हारे पिता का नाम क्या है?”
“मोहम्मद अब्बास|”
“और मामा का?”
"वाहिद खान|"
“और तुम्हारा नाम क्या है?”
“नीलोफ़र|”
नीलोफ़र से वह थोड़ी बहुत जानकारी लेकर अजीत अपने कमरे में लौट आया| लेकिन नीलोफ़र जिन लोगों की बात कर रही थी उसे उन लोगों के जिन्दा होने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी| उसे पता था की उस रात उन्होंने किसी को भी नहीं छोड़ा था| उसके मामा के घर पर हमला करने वाली भीड़ में वह भी शामिल था| और अगर कोई उनके हमले से बचकर भाग भी गया होगा तो वह शायद ही हिंदुस्तान में हो क्योंकि पाकिस्तान का बॉर्डर यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था| और उसके परिवार के बाकि लोग कहाँ पर होंगे यह कहना भी मुश्किल था क्योंकि कौन पाकिस्तान गया और कौन पाकिस्तान जाते हुए मारा गया इस बारे में पता करना नामुमकिन था|
“तुम्हें अगर कपड़े चाहिए तो वहाँ उस अल्मारी से ले सकती हो|” कहकर अजीत वहाँ से चला गया|
नीलोफ़र पलंग से उतरकर कमरे में रखी लकड़ी की अलमारी के पास गयी| उसने उसे खोलकर देखा| उसमे ढेर सारे सूट-सलवार भरे हुए थे| उसने उनमें से एक निकाला और पहन लिया| वह उसे थोड़ा ढीला था| फिर वह खिड़की की तरफ गयी| अजीत अन्दर के बरामदे में अपने कमरे के बाहर सीढ़ियों पर अपना सिर पकड़े बैठा था| उसे समझ नहीं आ रहा था की नीलोफ़र को बचाकर उसने गलती की या नहीं| लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| वह बस उसे किसी तरह इस गाँव से निकालना चाहता था| हालाँकि दंगे अब रुक चुके थे लेकिन लोगों के दिलों की कड़वाहट अभी भी कम नहीं हुई थी|
अगले कई दिन अजीत ने पाकिस्तान जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी इकटठा करते हुए बिताये| वह आस-पास के हर उस कैम्प में नीलोफ़र के पिता के नाम सन्देश लिखवा आया था की वह जिन्दा थी| वह सुबह नीलोफ़र को खाना देकर निकलता और शाम को भी खाना लेकर घर में आता| लेकिन कई दिनों तक उसे कोई ऐसा नहीं मिला जो उसे जनता हो|
नीलोफ़र की हालत भी थोड़ी सुधर चुकी थी लेकिन उसकी पीठ पर लगा जख्म अभी तक ठीक नहीं हुआ था| वह सारा दिन कमरे में ही पड़ी रहती थी| अजीत ज्यादातर वक्त घर पर होता नहीं था और उसकी गैरमौजूदगी में वह कभी कमरे से बाहर नहीं जाती थी|
एक दिन रात के अँधेरे में चुपचाप अजीत नीलोफ़र को लेकर घर से बाहर निकला| उसे पता था की अगर गाँव के किसी आदमी को भनक भी लगी तो वो दोनों ही जिन्दा नहीं बचेंगे| नीलोफ़र के पिता के बारे में छानबीन करते हुए उसे एक औरत मिली थी जो उसके पिता को जानती थी| शायद वह उनके पड़ोस में रहती थी| और लोगों की तरह वह भी अपने कुछ रिश्तेदारों को ढूढ़ रही थी| उसने अजीत को बताया की नीलोफ़र का परिवार उसे मरा समझकर पाकिस्तान जा चुका था| जब अजीत ने उसे नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने के लिए कहा वह नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने को तैयार हो गयी थी| अजीत नीलोफ़र को उसी के पास ले जा रहा था|
दोनों पैदल ही जा रहे थे| अजीत तेज़ कदमों से आगे-आगे और नीलोफ़र एक काली चादर में अपना सिर छुपाये धीमे कदमों से उसके पीछे-पीछे| कुछ-कुछ देर बाद वह पीछे मुड़कर देख लेता था की वह पीछे ही है| सुबह होते-होते वे उस कैंप तक पहुँच चुके थे जहाँ से बसों में भरकर लोग पाकिस्तान तक जा रहे थे| उस औरत ने उसे वही मिलने के लिए कहा था|
शाम होने लगी थी लेकिन उस औरत कही कुछ पता नहीं था| नीलोफ़र अपना सिर झुकाये एक पेड़ के नीचे बनी दिवार पर बैठी हुई थी| अजीत भी उसके पास ही खड़ा था| वह औरत कल उसे यही पर मिलने का वादा कर गयी थी| लेकिन सुबह से शाम घिर आयी थी| ज्यादातर लोग जो पाकिस्तान जाने के लिए वहाँ उस कैम्प में इकटठा हुए थे भी अब जा चुके थे| अजीत ने देखा की जोगिन्दर उसे देखकर उसकी तरफ बढ़ा चला आ रहा था| वह उसे देखकर घबरा गया था|