वह आदमी लालटेन हाथ में लिए एक बार आँगन के दरवाजे की तरफ गया| दरवाज़ा खोलते हुए वह किसी सोच में डूबा हुआ था| कुछ देर वहीँ दरवाज़े के पास खड़ा वह कुछ सोचता रहा| फिर वह वापिस नीलोफ़र के पास आया| वह नीलोफ़र को घूर रहा था| नीलोफ़र जमीन पर पड़ी सिसक रही थी| उसे भी समझ नहीं आ रहा था की वह उसे मारने में इतना वक्त क्यों लगा रहा था|
कुछ देर बाद वह नौजवान वापिस घर के अन्दर चला गया| नीलोफ़र यूँ ही पड़ी रही बिना हिले-डुले| उसका पूरा शरीर दर्द से सुन्न हो गया था| वह फिर वापिस नहीं आया| और रात को कब नीलोफ़र की आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला|
सुबह एक आहट से नीलोफ़र की आँख खुली| वह नौजवान एक चादर लपेटे हुए आँगन के दरवाजे से बाहर जा रहा था| नीलोफ़र किसी तरह अपने दोनों हाथों से सरकती हुई वापिस भूसे के ढेर के पीछे आ गयी|
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गाँव के कई आदमी छोटे-बड़े, जवान और उम्रदराज़ उस चाय की दुकान पर इकठ्ठा थे| यह सुबह किसी अन्य दिन की सुबह जैसी ही लग रही थी| लेकिन एक बात थी जो उस सुबह में नहीं थी| कई ऐसे लोग थे जो कुछ दिन पहले तक उस चाय की दुकान पर चाय पीने आया करते थे लेकिन अब वे कभी नहीं आयेंगे| गाँव के लोग खुश थे की उनका गाँव अब उन लोगों से साफ हो चुका था|
उन्ही सब के बीच एक चौबीस वर्षीय नौजवान भी था अजीत| वह चुपचाप एक कोने में बैठा उन लोगों की बातें सुन रहा था लेकिन उनकी एक भी बात पर उसका ध्यान नहीं था| उसके कानों में गूंज रही थी उन लोगों की चींखे जिन्हें उसने कल रात मौत के घाट उतार डाला था सिर्फ इसलिए क्योंकि उस कौम के दूसरे लोगों ने उसके माता-पिता, भाई और दो बहनों की हत्या कर दी थी| फिर उसने भी वही सब किया जो सब कर रहे थे| वह भी उन लोगों की भीड़ में शामिल था जिसने नीलोफ़र के घर पर हमला किया था|
लेकिन वह नीलोफ़र को नहीं मार पाया| जो जुनून कुछ देर पहले तक उसके सिर पर सवार था शायद नीलोफ़र को देखकर वह उतर चुका था| वह उसे मार डालना चाहता था अपनी बहनों की मौत का बदला ले लेना चाहता था| लेकिन शायद उसकी बहनों की याद ही थी जिसने उसके हाथों को रोक दिया था| उसकी छोटी बहन नीलोफ़र के जैसे ही थी| वह भी शायद उतनी ही डरी हुई होगी जीतनी कल उसे नीलोफ़र लग रही थी| शायद वह भी इसी हाल में होगी जिसमे नीलोफ़र थी जब उन लोगों ने उसे मारा होगा| एकबारगी उसने गाँव के लोगों को बुला लेने की सोची ताकि वे उसे मार डाले| लेकिन उसे पता था की उसे मारा बाद में जायेगा पहले उसके साथ वह होगा जो उसकी बहनों के साथ हुआ और जो वह नहीं चाहता था की दुनिया में किसी भी लड़की के साथ हो|
जब उन लोगों की पंचायत खत्म हुई तो अजीत अपने घर की ओर चल दिया| रास्ते में कई जले हुए घर थे जिनमें से एक घर निलोफर के उस रिश्तेदार का था जिसके घर वे लोग तीन दिन पहले ही आकर रुके थे| वे लोग लखनऊ से यहाँ पर आये थे ताकि पाकिस्तान जा सके| सुबह होते ही उन्हें यहाँ से निकल जाना था| लेकिन उन्हें नहीं पता था की वह रात उनकी जिंदगी की आखिरी रात होने वाली थी| उन जले हुए घरों में अब मातम करने वाला भी कोई नहीं बचा था|
घर पहुँचकर अजीत सीधा अपने कमरे में चला गया| पूरा दिन ना तो वह अपने कमरे से बाहर निकला और ना ही नीलोफ़र अपनी जगह से हिली|
रात फिर ढल आई थी| नीलोफ़र अभी भी उसी भूसे के ढेर में पड़ी हुई थी| उसे तीन दिन हो गये थे बिना कुछ खाए पिये| उसके शरीर में इतनी भी जान नहीं बची थी की वह अपना हाथ भी हिला सके|
तभी किसी ने आँगन का दरवाज़ा खटखटाया| नीलोफ़र इस बार चौंकी नहीं| अगर कुछ होगा भी तो ज्यादा से ज्यादा उसे मार दिया जायेगा| उसने अपने आप को बचाने का इरादा भी अब छोड़ दिया था| कुछ देर बाद अजीत घर के अन्दर से निकलकर आया| वह कुछ देर तक दरवाज़े पर खड़े उस आदमी से बात करता रहा| वह आदमी अजीत को बुलाने आया था| वे लोग दूसरे गाँव जा रहे थे ताकि अपनी कौम के मारे गये लोगों की मौत का बदला ले सके| लेकिन इस बार उसने जाने से मना कर दिया| उसने आंगन का दरवाज़ा बंद किया और वापिस घर के अन्दर चला गया| उसने नीलोफ़र पर भी कोई ध्यान नहीं दिया| उसने भी शायद उसे उसकी किस्मत पर छोड़ दिया था|
नीलोफ़र का पूरा शरीर बुखार से तप रहा था| उसने तीन दिन से ना तो कुछ खाया था और ना ही कुछ पिया था| वह मर तो रही थी लेकिन धीरे-धीरे करके| और जो कुछ कसर थी वो अब आसमान में घिर आये बादल पूरी करने वाले थे| कुछ देर में ही उसके गर्म शरीर पर बारिश की ठंडी बुँदे पड़ने लगी थी| तभी आधी बेहोशी की हालत में उसे अपने शरीर पर रेंगते दो हाथ महसूस हुए| अपनी अधखुली आँखों से उसने एक धुंधले शरीर को अपने ऊपर झुका हुआ पाया| अजीत एक चादर को उसके शरीर पर लपेट रहा था| उसने जल्द ही नीलोफ़र को अपने हाथों में उठाया और घर के अन्दर ले गया| वह उसे एक कमरे में ले गया और उसके एक पलंग पर डाल दिया| दूसरे ही पल वह उसे कम्बलों में लपेट रहा था| अजीत को उस वक्त खुद भी नहीं पता था की वह नीलोफ़र को अपनी छोटी बहन के कमरे में क्यों ले आया था|
थोड़ी गर्माहट पाकर नीलोफ़र के शरीर ने अब कांपना बंद कर दिया था लेकिन बिना खाये-पिये उसका शरीर कमज़ोर पड़ चुका था|
अजीत अपने कमरे में चुपचाप बैठा था| उसने भी पिछले तीन दिनों से, जबसे उसने उन लोगों को मारा था, कुछ नहीं खाया था| और ना ही उसे नींद आई थी| वह जब भी अपनी आँखे बंद करता उन लोगों के कटे हुए शरीर उसकी आँखों के सामने आ जाते थे| उन औरतों की चींखे उसके कानों में गूंजने लगती थी जिनका बलात्कार उसके दोस्त और साथी कर रहे थे| उसने सोचा था उन लोगों को मारकर, उनसे अपने परिवार की मौत का बदला लेकर उसकी तकलीफ़ थोड़ी कम हो जायेगी लेकिन राहत मिलने की बजाय उसकी बैचेनी और ज्यादा बढ़ गयी थी| ऐसा नहीं था वह उन लोगों के खिलाफ अपनी कड़वाहट भूल गया था लेकिन उन्हें मारने का भी अब उसका कोई मन नहीं था|
सुबह एक बार वह नीलोफ़र को देखने गया| वह दरवाजे की चौखट पर ही खड़ा रहा| वह अभी भी बिस्तर में बेहोश पड़ी थी| वह नहीं चाहता था की नीलोफ़र यहाँ उसके घर में रहे लेकिन इस हालत में वह उसे उठाकर बाहर फेंक भी नहीं पा रहा था| उसके मर जाने से ज्यादा डर उसे उन लोगों से था जो नीलोफ़र के पीछे पड़े हुए थे| अगर उसे मरना ही था तो वह चुपचाप यहाँ इस कमरे में मर जाये| वह नहीं चाहता था की वह उन लोगों के हाथ लगे|
दो दिन और गुजर चुके थे जब नीलोफ़र को होश आया| वह तीन-चार कम्बलों में लिपटी हुई थी और उसका शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था| उसने अपने कमज़ोर हाथों से कम्बलों को परे सरकाया| वह उठने की कोशिश कर रही थी की उसकी सूजी हुई पीठ में जबरदस्त दर्द हुआ और वह वापिस पलग पर लुढ़क गयी| वह पलंग पर पड़ी करहा रही थी जब अजीत उसे देखने आया| वह अन्दर नहीं गया बस चौखट पर खड़े होकर ही उसे देख गया|
कुछ देर बाद जब वह वापिस लौटा तो उसके हाथ में पानी का एक गिलास और एक अख़बार का टुकड़ा था जिसमे खाने का कुछ सामान लिपटा हुआ था| पिछले बीस दिनों से वह यही सब कुछ खा रहा था| उसने गिलास और अख़बार को पलंग के सिरहाने की मेज पर रखा और वापिस अपने कमरे में चला आया| उसने नीलोफ़र की तरफ देखा भी नहीं| लेकिन नीलोफ़र अधखुली आँखों से उसे देख रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था वह आदमी उसे क्यों यहाँ अपने घर में ले आया था और क्यों उसे खाना दे रहा था, आखिर वह उसे बचा क्यों रहा था?
लेकिन अजीत उसे बचा नहीं रहा था| वह तो बस उसे अपने हाथों से मार नहीं पा रहा था| शायद वह अपनी आत्मा पर एक और मौत का बोझ नहीं ढ़ोना चाहता था|
कुछ देर बाद वह नौजवान वापिस घर के अन्दर चला गया| नीलोफ़र यूँ ही पड़ी रही बिना हिले-डुले| उसका पूरा शरीर दर्द से सुन्न हो गया था| वह फिर वापिस नहीं आया| और रात को कब नीलोफ़र की आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला|
सुबह एक आहट से नीलोफ़र की आँख खुली| वह नौजवान एक चादर लपेटे हुए आँगन के दरवाजे से बाहर जा रहा था| नीलोफ़र किसी तरह अपने दोनों हाथों से सरकती हुई वापिस भूसे के ढेर के पीछे आ गयी|
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गाँव के कई आदमी छोटे-बड़े, जवान और उम्रदराज़ उस चाय की दुकान पर इकठ्ठा थे| यह सुबह किसी अन्य दिन की सुबह जैसी ही लग रही थी| लेकिन एक बात थी जो उस सुबह में नहीं थी| कई ऐसे लोग थे जो कुछ दिन पहले तक उस चाय की दुकान पर चाय पीने आया करते थे लेकिन अब वे कभी नहीं आयेंगे| गाँव के लोग खुश थे की उनका गाँव अब उन लोगों से साफ हो चुका था|
उन्ही सब के बीच एक चौबीस वर्षीय नौजवान भी था अजीत| वह चुपचाप एक कोने में बैठा उन लोगों की बातें सुन रहा था लेकिन उनकी एक भी बात पर उसका ध्यान नहीं था| उसके कानों में गूंज रही थी उन लोगों की चींखे जिन्हें उसने कल रात मौत के घाट उतार डाला था सिर्फ इसलिए क्योंकि उस कौम के दूसरे लोगों ने उसके माता-पिता, भाई और दो बहनों की हत्या कर दी थी| फिर उसने भी वही सब किया जो सब कर रहे थे| वह भी उन लोगों की भीड़ में शामिल था जिसने नीलोफ़र के घर पर हमला किया था|
लेकिन वह नीलोफ़र को नहीं मार पाया| जो जुनून कुछ देर पहले तक उसके सिर पर सवार था शायद नीलोफ़र को देखकर वह उतर चुका था| वह उसे मार डालना चाहता था अपनी बहनों की मौत का बदला ले लेना चाहता था| लेकिन शायद उसकी बहनों की याद ही थी जिसने उसके हाथों को रोक दिया था| उसकी छोटी बहन नीलोफ़र के जैसे ही थी| वह भी शायद उतनी ही डरी हुई होगी जीतनी कल उसे नीलोफ़र लग रही थी| शायद वह भी इसी हाल में होगी जिसमे नीलोफ़र थी जब उन लोगों ने उसे मारा होगा| एकबारगी उसने गाँव के लोगों को बुला लेने की सोची ताकि वे उसे मार डाले| लेकिन उसे पता था की उसे मारा बाद में जायेगा पहले उसके साथ वह होगा जो उसकी बहनों के साथ हुआ और जो वह नहीं चाहता था की दुनिया में किसी भी लड़की के साथ हो|
जब उन लोगों की पंचायत खत्म हुई तो अजीत अपने घर की ओर चल दिया| रास्ते में कई जले हुए घर थे जिनमें से एक घर निलोफर के उस रिश्तेदार का था जिसके घर वे लोग तीन दिन पहले ही आकर रुके थे| वे लोग लखनऊ से यहाँ पर आये थे ताकि पाकिस्तान जा सके| सुबह होते ही उन्हें यहाँ से निकल जाना था| लेकिन उन्हें नहीं पता था की वह रात उनकी जिंदगी की आखिरी रात होने वाली थी| उन जले हुए घरों में अब मातम करने वाला भी कोई नहीं बचा था|
घर पहुँचकर अजीत सीधा अपने कमरे में चला गया| पूरा दिन ना तो वह अपने कमरे से बाहर निकला और ना ही नीलोफ़र अपनी जगह से हिली|
रात फिर ढल आई थी| नीलोफ़र अभी भी उसी भूसे के ढेर में पड़ी हुई थी| उसे तीन दिन हो गये थे बिना कुछ खाए पिये| उसके शरीर में इतनी भी जान नहीं बची थी की वह अपना हाथ भी हिला सके|
तभी किसी ने आँगन का दरवाज़ा खटखटाया| नीलोफ़र इस बार चौंकी नहीं| अगर कुछ होगा भी तो ज्यादा से ज्यादा उसे मार दिया जायेगा| उसने अपने आप को बचाने का इरादा भी अब छोड़ दिया था| कुछ देर बाद अजीत घर के अन्दर से निकलकर आया| वह कुछ देर तक दरवाज़े पर खड़े उस आदमी से बात करता रहा| वह आदमी अजीत को बुलाने आया था| वे लोग दूसरे गाँव जा रहे थे ताकि अपनी कौम के मारे गये लोगों की मौत का बदला ले सके| लेकिन इस बार उसने जाने से मना कर दिया| उसने आंगन का दरवाज़ा बंद किया और वापिस घर के अन्दर चला गया| उसने नीलोफ़र पर भी कोई ध्यान नहीं दिया| उसने भी शायद उसे उसकी किस्मत पर छोड़ दिया था|
नीलोफ़र का पूरा शरीर बुखार से तप रहा था| उसने तीन दिन से ना तो कुछ खाया था और ना ही कुछ पिया था| वह मर तो रही थी लेकिन धीरे-धीरे करके| और जो कुछ कसर थी वो अब आसमान में घिर आये बादल पूरी करने वाले थे| कुछ देर में ही उसके गर्म शरीर पर बारिश की ठंडी बुँदे पड़ने लगी थी| तभी आधी बेहोशी की हालत में उसे अपने शरीर पर रेंगते दो हाथ महसूस हुए| अपनी अधखुली आँखों से उसने एक धुंधले शरीर को अपने ऊपर झुका हुआ पाया| अजीत एक चादर को उसके शरीर पर लपेट रहा था| उसने जल्द ही नीलोफ़र को अपने हाथों में उठाया और घर के अन्दर ले गया| वह उसे एक कमरे में ले गया और उसके एक पलंग पर डाल दिया| दूसरे ही पल वह उसे कम्बलों में लपेट रहा था| अजीत को उस वक्त खुद भी नहीं पता था की वह नीलोफ़र को अपनी छोटी बहन के कमरे में क्यों ले आया था|
थोड़ी गर्माहट पाकर नीलोफ़र के शरीर ने अब कांपना बंद कर दिया था लेकिन बिना खाये-पिये उसका शरीर कमज़ोर पड़ चुका था|
अजीत अपने कमरे में चुपचाप बैठा था| उसने भी पिछले तीन दिनों से, जबसे उसने उन लोगों को मारा था, कुछ नहीं खाया था| और ना ही उसे नींद आई थी| वह जब भी अपनी आँखे बंद करता उन लोगों के कटे हुए शरीर उसकी आँखों के सामने आ जाते थे| उन औरतों की चींखे उसके कानों में गूंजने लगती थी जिनका बलात्कार उसके दोस्त और साथी कर रहे थे| उसने सोचा था उन लोगों को मारकर, उनसे अपने परिवार की मौत का बदला लेकर उसकी तकलीफ़ थोड़ी कम हो जायेगी लेकिन राहत मिलने की बजाय उसकी बैचेनी और ज्यादा बढ़ गयी थी| ऐसा नहीं था वह उन लोगों के खिलाफ अपनी कड़वाहट भूल गया था लेकिन उन्हें मारने का भी अब उसका कोई मन नहीं था|
सुबह एक बार वह नीलोफ़र को देखने गया| वह दरवाजे की चौखट पर ही खड़ा रहा| वह अभी भी बिस्तर में बेहोश पड़ी थी| वह नहीं चाहता था की नीलोफ़र यहाँ उसके घर में रहे लेकिन इस हालत में वह उसे उठाकर बाहर फेंक भी नहीं पा रहा था| उसके मर जाने से ज्यादा डर उसे उन लोगों से था जो नीलोफ़र के पीछे पड़े हुए थे| अगर उसे मरना ही था तो वह चुपचाप यहाँ इस कमरे में मर जाये| वह नहीं चाहता था की वह उन लोगों के हाथ लगे|
दो दिन और गुजर चुके थे जब नीलोफ़र को होश आया| वह तीन-चार कम्बलों में लिपटी हुई थी और उसका शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था| उसने अपने कमज़ोर हाथों से कम्बलों को परे सरकाया| वह उठने की कोशिश कर रही थी की उसकी सूजी हुई पीठ में जबरदस्त दर्द हुआ और वह वापिस पलग पर लुढ़क गयी| वह पलंग पर पड़ी करहा रही थी जब अजीत उसे देखने आया| वह अन्दर नहीं गया बस चौखट पर खड़े होकर ही उसे देख गया|
कुछ देर बाद जब वह वापिस लौटा तो उसके हाथ में पानी का एक गिलास और एक अख़बार का टुकड़ा था जिसमे खाने का कुछ सामान लिपटा हुआ था| पिछले बीस दिनों से वह यही सब कुछ खा रहा था| उसने गिलास और अख़बार को पलंग के सिरहाने की मेज पर रखा और वापिस अपने कमरे में चला आया| उसने नीलोफ़र की तरफ देखा भी नहीं| लेकिन नीलोफ़र अधखुली आँखों से उसे देख रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था वह आदमी उसे क्यों यहाँ अपने घर में ले आया था और क्यों उसे खाना दे रहा था, आखिर वह उसे बचा क्यों रहा था?
लेकिन अजीत उसे बचा नहीं रहा था| वह तो बस उसे अपने हाथों से मार नहीं पा रहा था| शायद वह अपनी आत्मा पर एक और मौत का बोझ नहीं ढ़ोना चाहता था|
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