बाहर कुछ हल्की-सी आवाज हुई और नीलोफ़र हड़बड़ाकर वापिस अपनी जगह में दुबक गयी| वह जिस जले हुए तख़्त के पीछे छुपी हुई थी उसमें बने एक सुराख़ में से उसने झांककर देखा| बाहर एकदम सन्नाटा फैला हुआ था| उस जले हुए घर में अब कोई नहीं बचा था| बाहर की गली भी एकदम सुनसान पड़ी हुई थी| उस गली का हर घर जला हुआ और सुनसान था| नीलोफ़र को दो दिन हो गये थे इस तरह यहाँ पर छुपे हुए| वह गहरी नींद में सो रही थी जब एक उन्मादी भीड़ ने उसके घर पर हमला कर दिया था और वहाँ मौजूद हर इन्सान को मारकर घर को आग के हवाले कर दिया| उसकी बड़ी बहन भी उसके साथ ही सो रही थी जब यह सब हुआ| उन्होंने दूसरे घर की छत पर कूदकर किसी तरह अपनी जान बचाई| उसकी बड़ी बहन ने उसे तो छुपा दिया था लेकिन वह अपने आप को नहीं बचा पाई| उन लोगों ने उसकी बहन के साथ क्या किया नीलोफ़र को इस बात का अंदाजा तक नहीं था| वह पूरे दिन और पूरी रात जगी रही और वहाँ छुपी रही इस उम्मीद में की उसकी बहन आयेगी और उसे यहाँ से ले जायेगी | लेकिन उसे क्या पता था की वह अपनी बहन को अब कभी नहीं देख पायेगी| अगले दिन की शाम होते-होते तक उसकी उम्मीद भी टूटने लगी थी| उसकी आँखे भारी हो रही थी लेकिन फिर भी वह अपनी आँखों को खुला रख रही थी की कही उसकी बहन आये और वह उसे देख ना पाये| लेकिन इतनी कोशिश करने के बाद भी उसे एक झपकी आ गयी थी|
रात फिर घिर आयी थी| नीलोफ़र की आँखे रो-रोकर सूज चुकी थी| वह पत्थर-सी बनी उस तख़्त के पीछे बैठी हुई थी| फिर न जाने क्या सोचकर वह तख़्त के पीछे से बाहर निकल आयी| शायद उसे समझ आ गया था की उसकी बहन अब लौटकर नहीं आयेगी| उसे याद था उसके अब्बा उसे यहाँ पर क्यों छोड़कर गये थे| उन्होंने सोचा था की वह और उसकी बहन यहाँ पर सुरक्षित रहेंगे| लेकिन उन्हें क्या पता था की वे उन दोनों को अब कभी नहीं देख पायेंगे|
नीलोफ़र किसी तरह लड़खड़ाती हुई उस घर से बाहर निकली| उस अँधेरी काली रात में उन जले हुए घरों का नजारा और भी ज्यादा भयंकर लग रहा था| उस गाँव में मौजूद हर एक मुसलमान का घर जला दिया गया था| उन घरों में रहने वालों को मौत के घाट उतार दिया गया था, और अगर कोई बच भी गया था तो वह यहाँ से भाग चुका था|
नीलोफ़र को नहीं पता था की उसे कहाँ जाना था| वह उस अँधेरी गली में बदहवास-सी घूम रही थी| उसे नहीं पता था की वह जिन्दा बच पायेगी या नहीं| वह उस मनहुस पल को कोस रही थी जब उसके अब्बा उसे यहाँ उसके मामा के घर छोड़ गये थे| पूरे गाँव में एक सन्नाटा पसरा हुआ था| रात का आखिरी पहर था और सब अपने घरों में गहरी नींद में सोये हुए थे| नीलोफ़र बस अपने शरीर को ढोए चली जा रही थी| और कुछ देर तक उन गलियों में घुमने के बाद उसे खेत दिखाई दिये|
वह उस आखिरी घर से गुजर ही रही थी जब उसने उन लोगों की भीड़ की मशालों को अपनी तरफ आते देखा| अगर उन्होंने उसे देख लिया तो उसे भी नोच लिया जायेगा| उसने उस घर की तरफ देखा| उसे पता था की वह किसी हिन्दू का घर था क्योंकि गाँव के उस हिस्से में हिन्दू रहते थे| लेकिन वहाँ पर अँधेरा पसरा हुआ था| शायद दंगों की वजह से उस घर के लोग भी घर छोड़कर जा चुके थे| उसने आँगन के दरवाजे को हल्के-से खोला और अन्दर चली गयी| और कुछ ही देर में उन लोगों की भीड़ उस घर के सामने से गुजरी| वे लोग ज़ोर-ज़ोर से नारे लगा रहे थे और ताज़े खून से सनी नंगी तलवारों को हवा में लहरा रहे थे|
आँगन में भूसे के एक ढेर के पीछे छुपी नीलोफ़र बस उनके निकल जाने की ही दुआ मांग रही थी| जब उसे लगा की सब लोग चले गये थे तो उसने किसी तरह अपने आप को पैरों पर खड़ा किया और दरवाजे की तरफ देखा|
‘अगर में रात यही पर गुजार लूँ तो|’ उसने सोचा| वह भी न जाने क्या सोच रही थी| दिन हो या रात अगर वह उन लोगों के हाथ लग गयी तो उसे कोई नहीं बचा पायेगा, उसका अल्लाह भी नहीं| लेकिन उसमें अब सोचने की भी शक्ति नहीं बची थी| उसे खुद नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा थी और क्यों अपने आप को इस तरह बचाती फिर रही थी| अच्छा होता अपनी बहन के साथ वह भी मर जाती|
वह उस भूसे के ढेर के पीछे निश्चित-सी होकर बैठ गई जैसे सुबह हो जाएगी और सब कुछ ठीक हो जायेगा| उसने आँखे बंद की ही थी की तभी उस घर के आंगन का दरवाज़ा खुला और एक नौजवान हाथ में मशाल लिए आँगन में घुसा| हवा में फड़फड़ाती मशाल की लौ में उसका तना हुआ लाल चेहरा एकदम साफ नज़र आ रहा था| उसके दूसरे हाथ में एक तलवार थी जो खून से सनी हुई थी| आँगन से वह सीधा घर की तरफ बढ़ गया| उसने मशाल को बरामदे में एक तरफ लटकाया और वही दिवार पर लटक रही एक लालटेन को जलाने लगा| उसके हाथों और कपड़ों पर ताज़ा खून साफ नज़र आ रहा था| फिर उसने लालटेन ली और घर के अन्दर चला गया| निलोफर साँस रोके यह सब देख रही थी| ‘उसने यहाँ रूककर कोई गलती तो नहीं की?’ उसे पता था की यह एक हिन्दू का घर था और जहाँ से वह आई थी उसके लिए अब वहाँ जाना मुश्किल था|
नीलोफ़र वहाँ से उठकर निकल जाना चाहती थी लेकिन उसके पैरों में इतनी भी हिम्मत नहीं बची थी की वह उस आँगन को भी पार कर सके| हालाँकि अगस्त अभी ख़त्म नहीं हुआ था और बाहर इतनी ठण्ड भी नहीं थी लेकिन फिर भी उसका पतला लम्बा शरीर बुरी तरह से कांप रहा था| उसने फिर से आँखे बंद की यही सोचकर की जल्द ही सुबह होगी| वह सो जाना चाहती थी लेकिन चीथड़ों में लिपटा उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था| उसने अपने शरीर को समेटा और भूसे को उठाकर अपने ऊपर डाल लिया| लेकिन फिर भी उसकी कंपकंपाहट कम नहीं हुई| नीलोफ़र को आँखे मूंदे अभी कुछ देर ही हुई थी की उसे आँगन में कुछ आहट-सी महसूस हुई| लेकिन सिर उठाकर देखने की भी उसमे हिम्मत नहीं थी| तभी उसने देखा की वही आदमी जो कुछ देर पहले घर के अन्दर गया था लालटेन लिए उसके सामने खड़ा था| उसकी उम्र कुछ ज्यादा नहीं होगी, बस तेईस या चौबीस| और वह शायद उसे पहचान गया था की वह उसके धर्म की नहीं थी| उसने भूसे के ढेर से निलोफर को उठाया और वही एक तरफ कोने में जमीन पर पटक दिया| नीलोफ़र कमर में लगी तेज़ चोट से तड़प उठी और उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे| उसे पता था की उसके साथ क्या होने वाला था| वह वहाँ जमीन पर पड़ी सिसक रही थी और वह आदमी अपनी तलवार की तरफ बढ़ रहा था| उसने वही बरामदे में पड़ी खून से सनी अपनी तलवार को उठाया और नीलोफ़र के पास गया| उसने नीलोफ़र को मारने के लिए अपना हाथ उठा तो लिया था लेकिन पता नहीं क्यों उसके हाथ वही हवा में ही रुके रहे| उस रात उसने कई लोगों की जान ली थी लेकिन वह नीलोफ़र को मार नहीं पा रहा था| फिर उसने तलवार को गुस्से में एक तरफ फैंक दिया| लेकिन जमीन पर अपनी आँखे बंद किये पड़ी नीलोफ़र अपनी गर्दन पर आती हुई उस तलवार का इंतज़ार कर रही थी| उसकी बहन उसे छोड़कर जा चुकी थी और उसके अब्बा भी अपने वादे के मुताबिक उसे लेने के लिए नहीं आये| उसके लिए उसकी दुनिया ख़त्म हो चुकी थी और अब जो चंद सांसे बची थी वे भी जितनी जल्दी बंद हो जाये उतना अच्छा| वह यही चाहती थी की वह आदमी उसे मार डाले और उसका अंत कर दे| लेकिन उसकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था|
रात फिर घिर आयी थी| नीलोफ़र की आँखे रो-रोकर सूज चुकी थी| वह पत्थर-सी बनी उस तख़्त के पीछे बैठी हुई थी| फिर न जाने क्या सोचकर वह तख़्त के पीछे से बाहर निकल आयी| शायद उसे समझ आ गया था की उसकी बहन अब लौटकर नहीं आयेगी| उसे याद था उसके अब्बा उसे यहाँ पर क्यों छोड़कर गये थे| उन्होंने सोचा था की वह और उसकी बहन यहाँ पर सुरक्षित रहेंगे| लेकिन उन्हें क्या पता था की वे उन दोनों को अब कभी नहीं देख पायेंगे|
नीलोफ़र किसी तरह लड़खड़ाती हुई उस घर से बाहर निकली| उस अँधेरी काली रात में उन जले हुए घरों का नजारा और भी ज्यादा भयंकर लग रहा था| उस गाँव में मौजूद हर एक मुसलमान का घर जला दिया गया था| उन घरों में रहने वालों को मौत के घाट उतार दिया गया था, और अगर कोई बच भी गया था तो वह यहाँ से भाग चुका था|
नीलोफ़र को नहीं पता था की उसे कहाँ जाना था| वह उस अँधेरी गली में बदहवास-सी घूम रही थी| उसे नहीं पता था की वह जिन्दा बच पायेगी या नहीं| वह उस मनहुस पल को कोस रही थी जब उसके अब्बा उसे यहाँ उसके मामा के घर छोड़ गये थे| पूरे गाँव में एक सन्नाटा पसरा हुआ था| रात का आखिरी पहर था और सब अपने घरों में गहरी नींद में सोये हुए थे| नीलोफ़र बस अपने शरीर को ढोए चली जा रही थी| और कुछ देर तक उन गलियों में घुमने के बाद उसे खेत दिखाई दिये|
वह उस आखिरी घर से गुजर ही रही थी जब उसने उन लोगों की भीड़ की मशालों को अपनी तरफ आते देखा| अगर उन्होंने उसे देख लिया तो उसे भी नोच लिया जायेगा| उसने उस घर की तरफ देखा| उसे पता था की वह किसी हिन्दू का घर था क्योंकि गाँव के उस हिस्से में हिन्दू रहते थे| लेकिन वहाँ पर अँधेरा पसरा हुआ था| शायद दंगों की वजह से उस घर के लोग भी घर छोड़कर जा चुके थे| उसने आँगन के दरवाजे को हल्के-से खोला और अन्दर चली गयी| और कुछ ही देर में उन लोगों की भीड़ उस घर के सामने से गुजरी| वे लोग ज़ोर-ज़ोर से नारे लगा रहे थे और ताज़े खून से सनी नंगी तलवारों को हवा में लहरा रहे थे|
आँगन में भूसे के एक ढेर के पीछे छुपी नीलोफ़र बस उनके निकल जाने की ही दुआ मांग रही थी| जब उसे लगा की सब लोग चले गये थे तो उसने किसी तरह अपने आप को पैरों पर खड़ा किया और दरवाजे की तरफ देखा|
‘अगर में रात यही पर गुजार लूँ तो|’ उसने सोचा| वह भी न जाने क्या सोच रही थी| दिन हो या रात अगर वह उन लोगों के हाथ लग गयी तो उसे कोई नहीं बचा पायेगा, उसका अल्लाह भी नहीं| लेकिन उसमें अब सोचने की भी शक्ति नहीं बची थी| उसे खुद नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा थी और क्यों अपने आप को इस तरह बचाती फिर रही थी| अच्छा होता अपनी बहन के साथ वह भी मर जाती|
वह उस भूसे के ढेर के पीछे निश्चित-सी होकर बैठ गई जैसे सुबह हो जाएगी और सब कुछ ठीक हो जायेगा| उसने आँखे बंद की ही थी की तभी उस घर के आंगन का दरवाज़ा खुला और एक नौजवान हाथ में मशाल लिए आँगन में घुसा| हवा में फड़फड़ाती मशाल की लौ में उसका तना हुआ लाल चेहरा एकदम साफ नज़र आ रहा था| उसके दूसरे हाथ में एक तलवार थी जो खून से सनी हुई थी| आँगन से वह सीधा घर की तरफ बढ़ गया| उसने मशाल को बरामदे में एक तरफ लटकाया और वही दिवार पर लटक रही एक लालटेन को जलाने लगा| उसके हाथों और कपड़ों पर ताज़ा खून साफ नज़र आ रहा था| फिर उसने लालटेन ली और घर के अन्दर चला गया| निलोफर साँस रोके यह सब देख रही थी| ‘उसने यहाँ रूककर कोई गलती तो नहीं की?’ उसे पता था की यह एक हिन्दू का घर था और जहाँ से वह आई थी उसके लिए अब वहाँ जाना मुश्किल था|
नीलोफ़र वहाँ से उठकर निकल जाना चाहती थी लेकिन उसके पैरों में इतनी भी हिम्मत नहीं बची थी की वह उस आँगन को भी पार कर सके| हालाँकि अगस्त अभी ख़त्म नहीं हुआ था और बाहर इतनी ठण्ड भी नहीं थी लेकिन फिर भी उसका पतला लम्बा शरीर बुरी तरह से कांप रहा था| उसने फिर से आँखे बंद की यही सोचकर की जल्द ही सुबह होगी| वह सो जाना चाहती थी लेकिन चीथड़ों में लिपटा उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था| उसने अपने शरीर को समेटा और भूसे को उठाकर अपने ऊपर डाल लिया| लेकिन फिर भी उसकी कंपकंपाहट कम नहीं हुई| नीलोफ़र को आँखे मूंदे अभी कुछ देर ही हुई थी की उसे आँगन में कुछ आहट-सी महसूस हुई| लेकिन सिर उठाकर देखने की भी उसमे हिम्मत नहीं थी| तभी उसने देखा की वही आदमी जो कुछ देर पहले घर के अन्दर गया था लालटेन लिए उसके सामने खड़ा था| उसकी उम्र कुछ ज्यादा नहीं होगी, बस तेईस या चौबीस| और वह शायद उसे पहचान गया था की वह उसके धर्म की नहीं थी| उसने भूसे के ढेर से निलोफर को उठाया और वही एक तरफ कोने में जमीन पर पटक दिया| नीलोफ़र कमर में लगी तेज़ चोट से तड़प उठी और उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे| उसे पता था की उसके साथ क्या होने वाला था| वह वहाँ जमीन पर पड़ी सिसक रही थी और वह आदमी अपनी तलवार की तरफ बढ़ रहा था| उसने वही बरामदे में पड़ी खून से सनी अपनी तलवार को उठाया और नीलोफ़र के पास गया| उसने नीलोफ़र को मारने के लिए अपना हाथ उठा तो लिया था लेकिन पता नहीं क्यों उसके हाथ वही हवा में ही रुके रहे| उस रात उसने कई लोगों की जान ली थी लेकिन वह नीलोफ़र को मार नहीं पा रहा था| फिर उसने तलवार को गुस्से में एक तरफ फैंक दिया| लेकिन जमीन पर अपनी आँखे बंद किये पड़ी नीलोफ़र अपनी गर्दन पर आती हुई उस तलवार का इंतज़ार कर रही थी| उसकी बहन उसे छोड़कर जा चुकी थी और उसके अब्बा भी अपने वादे के मुताबिक उसे लेने के लिए नहीं आये| उसके लिए उसकी दुनिया ख़त्म हो चुकी थी और अब जो चंद सांसे बची थी वे भी जितनी जल्दी बंद हो जाये उतना अच्छा| वह यही चाहती थी की वह आदमी उसे मार डाले और उसका अंत कर दे| लेकिन उसकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था|
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