Monday, 8 February 2016

नीलोफ़र-3

नीलोफ़र के पेट में चार दिन बाद कुछ गया था| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह क्यों जिन्दा थी या अपने आप को जिन्दा रखने के लिए क्यों इतनी मेहनत कर रही थी| इस वक्त उसे मरना ज्यादा आसान लग रहा था| क्योंकि अगर आज वह बच भी गयी तो फिर क्या? उसके परिवार का कोई भी अभी तक उसका पता लेने नहीं आया था| पता नहीं वे जिन्दा थे भी या नहीं? और सारी जिंदगी वह यहाँ तो नहीं रहेगी| आज नहीं तो कल वह आदमी उसे अपने घर से निकाल ही देगा| दो दिन की जिंदगी और लेकर अब वह क्या करेगी?

रात को अजीत फिर उसके लिए वही खाना ले आया था| दिन में दो बार वह उसे खाना दे जाता| कई बार वह उसके लिए दूध भी ले आता था| लेकिन उसने नीलोफ़र से कभी भी उसकी हालत के बारे में नहीं पूछा| नीलोफ़र सारा दिन यूँ ही बिस्तर में पड़ी रहती| वह अपने अब्बा, बहनों और परिवार के बारे में ही सोचती रहती थी| क्या वे सब उसे भूल गये? और कितने दिन वह आदमी उसे यहाँ अपने घर रखेगा? और आखिर वह उसे बचा क्यूँ रहा था जबकि वह खुद मुसलमानों को मारने में शामिल था?

नीलोफ़र को कई दिन गुजर गये थे उस कमरे में पड़े-पड़े| जब भी वह आदमी लौटकर आता तो सबसे पहले वह नीलोफ़र को खाना दे जाता| वही जो वह खुद खा रहा था| शायद वह किसी के घर से वो रोटी और सब्जी लेकर आता था| जब भी वह आता नीलोफ़र बिस्तर में दुबक जाती| हालाँकि वह उसकी तरफ देखता भी नहीं था| वह बस खाना रखता और दरवाज़ा बंद करके चला जाता|

अजीत अपने कमरे में बैठा उन रोटियों की तरफ देख रहा था जो उसके पिता के दोस्त जोगिन्दर की पत्नी रोज उसे बनाकर दे दिया करती थी| उनमें से दो वह नीलोफ़र को दे आया करता था| नीलोफ़र को उसने बचाया और उसे घर के अन्दर ले आया| लेकिन उसे उससे ज्यादा मतलब नहीं था| वो अगर उस भूसे के ढेर में मर भी जाती तो उसे ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ता| पिछले एक महीने में उसने इतनी मौत देखी थी की उसे ना तो अब किसी के जिन्दा होने से कोई फ़र्क पड़ता था और ना ही मरने से| उसने खुद इतनी हैवानियत दिखाई थी की वह खुद अब पत्थर बन चुका था| नीलोफ़र की तरह ही उसे खुद भी नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा था या फिर अपने आप को जिन्दा रखने की कोशिश क्यों कर रहा था? जिस तलवार से उसने उन लोगों को मारा था वह खुद अपना गला उससे काट लेना चाहता था ताकि जिस दर्द से वह गुजर रहा था उसे खत्म कर सके| लेकिन दूसरे के गले पर तलवार चलाना जीतना आसान होता है अपने गले पर उसे चलाना उतना ही मुश्किल|

उस दिन जब वह नीलोफ़र को खाना देने गया तो खाना देने के बाद भी वह वहीँ चौखट पर ही खड़ा रहा| उसे शायद समझ नहीं आ रहा था की वह किस तरह नीलोफ़र से बात करे|

“तुम्हें अपने परिवार के बारे में कुछ पता है तो मुझे बता दो, मैं तुम्हें उनके पास छोड़ आऊँगा|” यह पहली बार था जब इतने दिनों में अजीत ने नीलोफ़र से कुछ कहा था| वह बात तो उससे कर रहा था लेकिन देख एक दिवार को रहा था|

“मुझे नहीं पता| मेरे अब्बा मुझे लेने आने वाले थे|” नीलोफ़र ने सहमी-सी आवाज में कहा|

“तुम्हारा घर कौन सा था?”

“कोई नहीं|”

“तो तुम यहाँ कैसे आयी?”

“मेरा घर लखनऊ में था लेकिन हम पाकिस्तान जाने वाले थे इसलिए मेरे अब्बा मुझे और मेरी बहन को यहाँ मेरे मामा के घर छोड़ गये थे|”

“तुम्हें अपना लखनऊ का पता याद है?”

नीलोफ़र खामोश थी| उसे कुछ याद नहीं था|

“तुम्हारा कोई और रिश्तेदार जो आस-पास रहता हो?”

“वो सब यहीं थे|”

“यहाँ तुम्हारे मामा का घर कौन-सा था?”

“वो बड़े टीले के पास जो पीली कोठी है उसके बगल वाली कोठी|”

“ठीक है मैं कुछ पता करता हूँ| तुम्हारे पिता का नाम क्या है?”

“मोहम्मद अब्बास|”

“और मामा का?”

"वाहिद खान|"

“और तुम्हारा नाम क्या है?”

“नीलोफ़र|”

नीलोफ़र से वह थोड़ी बहुत जानकारी लेकर अजीत अपने कमरे में लौट आया| लेकिन नीलोफ़र जिन लोगों की बात कर रही थी उसे उन लोगों के जिन्दा होने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी| उसे पता था की उस रात उन्होंने किसी को भी नहीं छोड़ा था| उसके मामा के घर पर हमला करने वाली भीड़ में वह भी शामिल था| और अगर कोई उनके हमले से बचकर भाग भी गया होगा तो वह शायद ही हिंदुस्तान में हो क्योंकि पाकिस्तान का बॉर्डर यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था| और उसके परिवार के बाकि लोग कहाँ पर होंगे यह कहना भी मुश्किल था क्योंकि कौन पाकिस्तान गया और कौन पाकिस्तान जाते हुए मारा गया इस बारे में पता करना नामुमकिन था|

“तुम्हें अगर कपड़े चाहिए तो वहाँ उस अल्मारी से ले सकती हो|” कहकर अजीत वहाँ से चला गया|

नीलोफ़र पलंग से उतरकर कमरे में रखी लकड़ी की अलमारी के पास गयी| उसने उसे खोलकर देखा| उसमे ढेर सारे सूट-सलवार भरे हुए थे| उसने उनमें से एक निकाला और पहन लिया| वह उसे थोड़ा ढीला था| फिर वह खिड़की की तरफ गयी| अजीत अन्दर के बरामदे में अपने कमरे के बाहर सीढ़ियों पर अपना सिर पकड़े बैठा था| उसे समझ नहीं आ रहा था की नीलोफ़र को बचाकर उसने गलती की या नहीं| लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| वह बस उसे किसी तरह इस गाँव से निकालना चाहता था| हालाँकि दंगे अब रुक चुके थे लेकिन लोगों के दिलों की कड़वाहट अभी भी कम नहीं हुई थी|

अगले कई दिन अजीत ने पाकिस्तान जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी इकटठा करते हुए बिताये| वह आस-पास के हर उस कैम्प में नीलोफ़र के पिता के नाम सन्देश लिखवा आया था की वह जिन्दा थी| वह सुबह नीलोफ़र को खाना देकर निकलता और शाम को भी खाना लेकर घर में आता| लेकिन कई दिनों तक उसे कोई ऐसा नहीं मिला जो उसे जनता हो|

नीलोफ़र की हालत भी थोड़ी सुधर चुकी थी लेकिन उसकी पीठ पर लगा जख्म अभी तक ठीक नहीं हुआ था| वह सारा दिन कमरे में ही पड़ी रहती थी| अजीत ज्यादातर वक्त घर पर होता नहीं था और उसकी गैरमौजूदगी में वह कभी कमरे से बाहर नहीं जाती थी|

एक दिन रात के अँधेरे में चुपचाप अजीत नीलोफ़र को लेकर घर से बाहर निकला| उसे पता था की अगर गाँव के किसी आदमी को भनक भी लगी तो वो दोनों ही जिन्दा नहीं बचेंगे| नीलोफ़र के पिता के बारे में छानबीन करते हुए उसे एक औरत मिली थी जो उसके पिता को जानती थी| शायद वह उनके पड़ोस में रहती थी| और लोगों की तरह वह भी अपने कुछ रिश्तेदारों को ढूढ़ रही थी| उसने अजीत को बताया की नीलोफ़र का परिवार उसे मरा समझकर पाकिस्तान जा चुका था| जब अजीत ने उसे नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने के लिए कहा वह नीलोफ़र को अपने साथ ले जाने को तैयार हो गयी थी| अजीत नीलोफ़र को उसी के पास ले जा रहा था|

दोनों पैदल ही जा रहे थे| अजीत तेज़ कदमों से आगे-आगे और नीलोफ़र एक काली चादर में अपना सिर छुपाये धीमे कदमों से उसके पीछे-पीछे| कुछ-कुछ देर बाद वह पीछे मुड़कर देख लेता था की वह पीछे ही है| सुबह होते-होते वे उस कैंप तक पहुँच चुके थे जहाँ से बसों में भरकर लोग पाकिस्तान तक जा रहे थे| उस औरत ने उसे वही मिलने के लिए कहा था|

शाम होने लगी थी लेकिन उस औरत कही कुछ पता नहीं था| नीलोफ़र अपना सिर झुकाये एक पेड़ के नीचे बनी दिवार पर बैठी हुई थी| अजीत भी उसके पास ही खड़ा था| वह औरत कल उसे यही पर मिलने का वादा कर गयी थी| लेकिन सुबह से शाम घिर आयी थी| ज्यादातर लोग जो पाकिस्तान जाने के लिए वहाँ उस कैम्प में इकटठा हुए थे भी अब जा चुके थे| अजीत ने देखा की जोगिन्दर उसे देखकर उसकी तरफ बढ़ा चला आ रहा था| वह उसे देखकर घबरा गया था|

Thursday, 4 February 2016

नीलोफ़र-2

वह आदमी लालटेन हाथ में लिए एक बार आँगन के दरवाजे की तरफ गया| दरवाज़ा खोलते हुए वह किसी सोच में डूबा हुआ था| कुछ देर वहीँ दरवाज़े के पास खड़ा वह कुछ सोचता रहा| फिर वह वापिस नीलोफ़र के पास आया| वह नीलोफ़र को घूर रहा था| नीलोफ़र जमीन पर पड़ी सिसक रही थी| उसे भी समझ नहीं आ रहा था की वह उसे मारने में इतना वक्त क्यों लगा रहा था|

कुछ देर बाद वह नौजवान वापिस घर के अन्दर चला गया| नीलोफ़र यूँ ही पड़ी रही बिना हिले-डुले| उसका पूरा शरीर दर्द से सुन्न हो गया था| वह फिर वापिस नहीं आया| और रात को कब नीलोफ़र की आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला|

सुबह एक आहट से नीलोफ़र की आँख खुली| वह नौजवान एक चादर लपेटे हुए आँगन के दरवाजे से बाहर जा रहा था| नीलोफ़र किसी तरह अपने दोनों हाथों से सरकती हुई वापिस भूसे के ढेर के पीछे आ गयी|

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गाँव के कई आदमी छोटे-बड़े, जवान और उम्रदराज़ उस चाय की दुकान पर इकठ्ठा थे| यह सुबह किसी अन्य दिन की सुबह जैसी ही लग रही थी| लेकिन एक बात थी जो उस सुबह में नहीं थी| कई ऐसे लोग थे जो कुछ दिन पहले तक उस चाय की दुकान पर चाय पीने आया करते थे लेकिन अब वे कभी नहीं आयेंगे| गाँव के लोग खुश थे की उनका गाँव अब उन लोगों से साफ हो चुका था|

उन्ही सब के बीच एक चौबीस वर्षीय नौजवान भी था अजीत| वह चुपचाप एक कोने में बैठा उन लोगों की बातें सुन रहा था लेकिन उनकी एक भी बात पर उसका ध्यान नहीं था| उसके कानों में गूंज रही थी उन लोगों की चींखे जिन्हें उसने कल रात मौत के घाट उतार डाला था सिर्फ इसलिए क्योंकि उस कौम के दूसरे लोगों ने उसके माता-पिता, भाई और दो बहनों की हत्या कर दी थी| फिर उसने भी वही सब किया जो सब कर रहे थे| वह भी उन लोगों की भीड़ में शामिल था जिसने नीलोफ़र के घर पर हमला किया था|

लेकिन वह नीलोफ़र को नहीं मार पाया| जो जुनून कुछ देर पहले तक उसके सिर पर सवार था शायद नीलोफ़र को देखकर वह उतर चुका था| वह उसे मार डालना चाहता था अपनी बहनों की मौत का बदला ले लेना चाहता था| लेकिन शायद उसकी बहनों की याद ही थी जिसने उसके हाथों को रोक दिया था| उसकी छोटी बहन नीलोफ़र के जैसे ही थी| वह भी शायद उतनी ही डरी हुई होगी जीतनी कल उसे नीलोफ़र लग रही थी| शायद वह भी इसी हाल में होगी जिसमे नीलोफ़र थी जब उन लोगों ने उसे मारा होगा| एकबारगी उसने गाँव के लोगों को बुला लेने की सोची ताकि वे उसे मार डाले| लेकिन उसे पता था की उसे मारा बाद में जायेगा पहले उसके साथ वह होगा जो उसकी बहनों के साथ हुआ और जो वह नहीं चाहता था की दुनिया में किसी भी लड़की के साथ हो|

जब उन लोगों की पंचायत खत्म हुई तो अजीत अपने घर की ओर चल दिया| रास्ते में कई जले हुए घर थे जिनमें से एक घर निलोफर के उस रिश्तेदार का था जिसके घर वे लोग तीन दिन पहले ही आकर रुके थे| वे लोग लखनऊ से यहाँ पर आये थे ताकि पाकिस्तान जा सके| सुबह होते ही उन्हें यहाँ से निकल जाना था| लेकिन उन्हें नहीं पता था की वह रात उनकी जिंदगी की आखिरी रात होने वाली थी| उन जले हुए घरों में अब मातम करने वाला भी कोई नहीं बचा था|

घर पहुँचकर अजीत सीधा अपने कमरे में चला गया| पूरा दिन ना तो वह अपने कमरे से बाहर निकला और ना ही नीलोफ़र अपनी जगह से हिली|

रात फिर ढल आई थी| नीलोफ़र अभी भी उसी भूसे के ढेर में पड़ी हुई थी| उसे तीन दिन हो गये थे बिना कुछ खाए पिये| उसके शरीर में इतनी भी जान नहीं बची थी की वह अपना हाथ भी हिला सके|

तभी किसी ने आँगन का दरवाज़ा खटखटाया| नीलोफ़र इस बार चौंकी नहीं| अगर कुछ होगा भी तो ज्यादा से ज्यादा उसे मार दिया जायेगा| उसने अपने आप को बचाने का इरादा भी अब छोड़ दिया था| कुछ देर बाद अजीत घर के अन्दर से निकलकर आया| वह कुछ देर तक दरवाज़े पर खड़े उस आदमी से बात करता रहा| वह आदमी अजीत को बुलाने आया था| वे लोग दूसरे गाँव जा रहे थे ताकि अपनी कौम के मारे गये लोगों की मौत का बदला ले सके| लेकिन इस बार उसने जाने से मना कर दिया| उसने आंगन का दरवाज़ा बंद किया और वापिस घर के अन्दर चला गया| उसने नीलोफ़र पर भी कोई ध्यान नहीं दिया| उसने भी शायद उसे उसकी किस्मत पर छोड़ दिया था|

नीलोफ़र का पूरा शरीर बुखार से तप रहा था| उसने तीन दिन से ना तो कुछ खाया था और ना ही कुछ पिया था| वह मर तो रही थी लेकिन धीरे-धीरे करके| और जो कुछ कसर थी वो अब आसमान में घिर आये बादल पूरी करने वाले थे| कुछ देर में ही उसके गर्म शरीर पर बारिश की ठंडी बुँदे पड़ने लगी थी| तभी आधी बेहोशी की हालत में उसे अपने शरीर पर रेंगते दो हाथ महसूस हुए| अपनी अधखुली आँखों से उसने एक धुंधले शरीर को अपने ऊपर झुका हुआ पाया| अजीत एक चादर को उसके शरीर पर लपेट रहा था| उसने जल्द ही नीलोफ़र को अपने हाथों में उठाया और घर के अन्दर ले गया| वह उसे एक कमरे में ले गया और उसके एक पलंग पर डाल दिया| दूसरे ही पल वह उसे कम्बलों में लपेट रहा था| अजीत को उस वक्त खुद भी नहीं पता था की वह नीलोफ़र को अपनी छोटी बहन के कमरे में क्यों ले आया था|

थोड़ी गर्माहट पाकर नीलोफ़र के शरीर ने अब कांपना बंद कर दिया था लेकिन बिना खाये-पिये उसका शरीर कमज़ोर पड़ चुका था|

अजीत अपने कमरे में चुपचाप बैठा था| उसने भी पिछले तीन दिनों से, जबसे उसने उन लोगों को मारा था, कुछ नहीं खाया था| और ना ही उसे नींद आई थी| वह जब भी अपनी आँखे बंद करता उन लोगों के कटे हुए शरीर उसकी आँखों के सामने आ जाते थे| उन औरतों की चींखे उसके कानों में गूंजने लगती थी जिनका बलात्कार उसके दोस्त और साथी कर रहे थे| उसने सोचा था उन लोगों को मारकर, उनसे अपने परिवार की मौत का बदला लेकर उसकी तकलीफ़ थोड़ी कम हो जायेगी लेकिन राहत मिलने की बजाय उसकी बैचेनी और ज्यादा बढ़ गयी थी| ऐसा नहीं था वह उन लोगों के खिलाफ अपनी कड़वाहट भूल गया था लेकिन उन्हें मारने का भी अब उसका कोई मन नहीं था|

सुबह एक बार वह नीलोफ़र को देखने गया| वह दरवाजे की चौखट पर ही खड़ा रहा| वह अभी भी बिस्तर में बेहोश पड़ी थी| वह नहीं चाहता था की नीलोफ़र यहाँ उसके घर में रहे लेकिन इस हालत में वह उसे उठाकर बाहर फेंक भी नहीं पा रहा था| उसके मर जाने से ज्यादा डर उसे उन लोगों से था जो नीलोफ़र के पीछे पड़े हुए थे| अगर उसे मरना ही था तो वह चुपचाप यहाँ इस कमरे में मर जाये| वह नहीं चाहता था की वह उन लोगों के हाथ लगे|

दो दिन और गुजर चुके थे जब नीलोफ़र को होश आया| वह तीन-चार कम्बलों में लिपटी हुई थी और उसका शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था| उसने अपने कमज़ोर हाथों से कम्बलों को परे सरकाया| वह उठने की कोशिश कर रही थी की उसकी सूजी हुई पीठ में जबरदस्त दर्द हुआ और वह वापिस पलग पर लुढ़क गयी| वह पलंग पर पड़ी करहा रही थी जब अजीत उसे देखने आया| वह अन्दर नहीं गया बस चौखट पर खड़े होकर ही उसे देख गया|

कुछ देर बाद जब वह वापिस लौटा तो उसके हाथ में पानी का एक गिलास और एक अख़बार का टुकड़ा था जिसमे खाने का कुछ सामान लिपटा हुआ था| पिछले बीस दिनों से वह यही सब कुछ खा रहा था| उसने गिलास और अख़बार को पलंग के सिरहाने की मेज पर रखा और वापिस अपने कमरे में चला आया| उसने नीलोफ़र की तरफ देखा भी नहीं| लेकिन नीलोफ़र अधखुली आँखों से उसे देख रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था वह आदमी उसे क्यों यहाँ अपने घर में ले आया था और क्यों उसे खाना दे रहा था, आखिर वह उसे बचा क्यों रहा था?

 लेकिन अजीत उसे बचा नहीं रहा था| वह तो बस उसे अपने हाथों से मार नहीं पा रहा था| शायद वह अपनी आत्मा पर एक और मौत का बोझ नहीं ढ़ोना चाहता था|

Tuesday, 2 February 2016

नीलोफ़र-1

बाहर कुछ हल्की-सी आवाज हुई और नीलोफ़र हड़बड़ाकर वापिस अपनी जगह में दुबक गयी| वह जिस जले हुए तख़्त के पीछे छुपी हुई थी उसमें बने एक सुराख़ में से उसने झांककर देखा| बाहर एकदम सन्नाटा फैला हुआ था| उस जले हुए घर में अब कोई नहीं बचा था| बाहर की गली भी एकदम सुनसान पड़ी हुई थी| उस गली का हर घर जला हुआ और सुनसान था| नीलोफ़र को दो दिन हो गये थे इस तरह यहाँ पर छुपे हुए| वह गहरी नींद में सो रही थी जब एक उन्मादी भीड़ ने उसके घर पर हमला कर दिया था और वहाँ मौजूद हर इन्सान को मारकर घर को आग के हवाले कर दिया| उसकी बड़ी बहन भी उसके साथ ही सो रही थी जब यह सब हुआ| उन्होंने दूसरे घर की छत पर कूदकर किसी तरह अपनी जान बचाई| उसकी बड़ी बहन ने उसे तो छुपा दिया था लेकिन वह अपने आप को नहीं बचा पाई| उन लोगों ने उसकी बहन के साथ क्या किया नीलोफ़र को इस बात का अंदाजा तक नहीं था| वह पूरे दिन और पूरी रात जगी रही और वहाँ छुपी रही इस उम्मीद में की उसकी बहन आयेगी और उसे यहाँ से ले जायेगी | लेकिन उसे क्या पता था की वह अपनी बहन को अब कभी नहीं देख पायेगी| अगले दिन की शाम होते-होते तक उसकी उम्मीद भी टूटने लगी थी| उसकी आँखे भारी हो रही थी लेकिन फिर भी वह अपनी आँखों को खुला रख रही थी की कही उसकी बहन आये और वह उसे देख ना पाये| लेकिन इतनी कोशिश करने के बाद भी उसे एक झपकी आ गयी थी|

रात फिर घिर आयी थी| नीलोफ़र की आँखे रो-रोकर सूज चुकी थी| वह पत्थर-सी बनी उस तख़्त के पीछे बैठी हुई थी| फिर न जाने क्या सोचकर वह तख़्त के पीछे से बाहर निकल आयी| शायद उसे समझ आ गया था की उसकी बहन अब लौटकर नहीं आयेगी| उसे याद था उसके अब्बा उसे यहाँ पर क्यों छोड़कर गये थे| उन्होंने सोचा था की वह और उसकी बहन यहाँ पर सुरक्षित रहेंगे| लेकिन उन्हें क्या पता था की वे उन दोनों को अब कभी नहीं देख पायेंगे|

नीलोफ़र किसी तरह लड़खड़ाती हुई उस घर से बाहर निकली| उस अँधेरी काली रात में उन जले हुए घरों का नजारा और भी ज्यादा भयंकर लग रहा था| उस गाँव में मौजूद हर एक मुसलमान का घर जला दिया गया था| उन घरों में रहने वालों को मौत के घाट उतार दिया गया था, और अगर कोई बच भी गया था तो वह यहाँ से भाग चुका था|

नीलोफ़र को नहीं पता था की उसे कहाँ जाना था| वह उस अँधेरी गली में बदहवास-सी घूम रही थी| उसे नहीं पता था की वह जिन्दा बच पायेगी या नहीं| वह उस मनहुस पल को कोस रही थी जब उसके अब्बा उसे यहाँ उसके मामा के घर छोड़ गये थे| पूरे गाँव में एक सन्नाटा पसरा हुआ था| रात का आखिरी पहर था और सब अपने घरों में गहरी नींद में सोये हुए थे| नीलोफ़र बस अपने शरीर को ढोए चली जा रही थी| और कुछ देर तक उन गलियों में घुमने के बाद उसे खेत दिखाई दिये|

वह उस आखिरी घर से गुजर ही रही थी जब उसने उन लोगों की भीड़ की मशालों को अपनी तरफ आते देखा| अगर उन्होंने उसे देख लिया तो उसे भी नोच लिया जायेगा| उसने उस घर की तरफ देखा| उसे पता था की वह किसी हिन्दू का घर था क्योंकि गाँव के उस हिस्से में हिन्दू रहते थे| लेकिन वहाँ पर अँधेरा पसरा हुआ था| शायद दंगों की वजह से उस घर के लोग भी घर छोड़कर जा चुके थे| उसने आँगन के दरवाजे को हल्के-से खोला और अन्दर चली गयी| और कुछ ही देर में उन लोगों की भीड़ उस घर के सामने से गुजरी| वे लोग ज़ोर-ज़ोर से नारे लगा रहे थे और ताज़े खून से सनी नंगी तलवारों को हवा में लहरा रहे थे|

आँगन में भूसे के एक ढेर के पीछे छुपी नीलोफ़र बस उनके निकल जाने की ही दुआ मांग रही थी| जब उसे लगा की सब लोग चले गये थे तो उसने किसी तरह अपने आप को पैरों पर खड़ा किया और दरवाजे की तरफ देखा|

‘अगर में रात यही पर गुजार लूँ तो|’ उसने सोचा| वह भी न जाने क्या सोच रही थी| दिन हो या रात अगर वह उन लोगों के हाथ लग गयी तो उसे कोई नहीं बचा पायेगा, उसका अल्लाह भी नहीं| लेकिन उसमें अब सोचने की भी शक्ति नहीं बची थी| उसे खुद नहीं पता था की वह क्यों जिन्दा थी और क्यों अपने आप को इस तरह बचाती फिर रही थी| अच्छा होता अपनी बहन के साथ वह भी मर जाती|

वह उस भूसे के ढेर के पीछे निश्चित-सी होकर बैठ गई जैसे सुबह हो जाएगी और सब कुछ ठीक हो जायेगा| उसने आँखे बंद की ही थी की तभी उस घर के आंगन का दरवाज़ा खुला और एक नौजवान हाथ में मशाल लिए आँगन में घुसा| हवा में फड़फड़ाती मशाल की लौ में उसका तना हुआ लाल चेहरा एकदम साफ नज़र आ रहा था| उसके दूसरे हाथ में एक तलवार थी जो खून से सनी हुई थी| आँगन से वह सीधा घर की तरफ बढ़ गया| उसने मशाल को बरामदे में एक तरफ लटकाया और वही दिवार पर लटक रही एक लालटेन को जलाने लगा| उसके हाथों और कपड़ों पर ताज़ा खून साफ नज़र आ रहा था| फिर उसने लालटेन ली और घर के अन्दर चला गया| निलोफर साँस रोके यह सब देख रही थी| ‘उसने यहाँ रूककर कोई गलती तो नहीं की?’ उसे पता था की यह एक हिन्दू का घर था और जहाँ से वह आई थी उसके लिए अब वहाँ जाना मुश्किल था|

नीलोफ़र वहाँ से उठकर निकल जाना चाहती थी लेकिन उसके पैरों में इतनी भी हिम्मत नहीं बची थी की वह उस आँगन को भी पार कर सके| हालाँकि अगस्त अभी ख़त्म नहीं हुआ था और बाहर इतनी ठण्ड भी नहीं थी लेकिन फिर भी उसका पतला लम्बा शरीर बुरी तरह से कांप रहा था| उसने फिर से आँखे बंद की यही सोचकर की जल्द ही सुबह होगी| वह सो जाना चाहती थी लेकिन चीथड़ों में लिपटा उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था| उसने अपने शरीर को समेटा और भूसे को उठाकर अपने ऊपर डाल लिया| लेकिन फिर भी उसकी कंपकंपाहट कम नहीं हुई| नीलोफ़र को आँखे मूंदे अभी कुछ देर ही हुई थी की उसे आँगन में कुछ आहट-सी महसूस हुई| लेकिन सिर उठाकर देखने की भी उसमे हिम्मत नहीं थी| तभी उसने देखा की वही आदमी जो कुछ देर पहले घर के अन्दर गया था लालटेन लिए उसके सामने खड़ा था| उसकी उम्र कुछ ज्यादा नहीं होगी, बस तेईस या चौबीस| और वह शायद उसे पहचान गया था की वह उसके धर्म की नहीं थी| उसने भूसे के ढेर से निलोफर को उठाया और वही एक तरफ कोने में जमीन पर पटक दिया| नीलोफ़र कमर में लगी तेज़ चोट से तड़प उठी और उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे| उसे पता था की उसके साथ क्या होने वाला था| वह वहाँ जमीन पर पड़ी सिसक रही थी और वह आदमी अपनी तलवार की तरफ बढ़ रहा था| उसने वही बरामदे में पड़ी खून से सनी अपनी तलवार को उठाया और नीलोफ़र के पास गया| उसने नीलोफ़र को मारने के लिए अपना हाथ उठा तो लिया था लेकिन पता नहीं क्यों उसके हाथ वही हवा में ही रुके रहे| उस रात उसने कई लोगों की जान ली थी लेकिन वह नीलोफ़र को मार नहीं पा रहा था| फिर उसने तलवार को गुस्से में एक तरफ फैंक दिया| लेकिन जमीन पर अपनी आँखे बंद किये पड़ी नीलोफ़र अपनी गर्दन पर आती हुई उस तलवार का इंतज़ार कर रही थी| उसकी बहन उसे छोड़कर जा चुकी थी और उसके अब्बा भी अपने वादे के मुताबिक उसे लेने के लिए नहीं आये| उसके लिए उसकी दुनिया ख़त्म हो चुकी थी और अब जो चंद सांसे बची थी वे भी जितनी जल्दी बंद हो जाये उतना अच्छा| वह यही चाहती थी की वह आदमी उसे मार डाले और उसका अंत कर दे| लेकिन उसकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था|