Monday, 31 August 2015

सुजाता की कहानी-5

अभय जिस लड़की से शादी कर रहा था सुजाता उसे अच्छी तरह से जानती थी| सलोनी थी ही इतनी सुन्दर की ऑफिस का हर लड़का उस पर मरता था| उसका दूध जैसा सफ़ेद रंग हर लड़की की जलन का कारण था| वह जितनी सुन्दर थी उतनी ही स्टाइलिश भी थी| अभय क्यों उसे छोड़कर सुजाता के पास आयेगा जिसके पास ना रूप है ना रंग| उसके पास सिर्फ अच्छा दिमाग था जिससे ज्यादातर लड़कों को कुछ लेना-देना नहीं होता|

जब अभय ने अपनी सगाई की खबर देने के लिये सुजाता को फोन किया तो वह ख़ामोशी से अभय की बात सुनती रही, उसके गालों पर आंसुओं की दो लकीरें बन गयी थी| उसे पहले से ही पता था की एक दिन ऐसा होने वाला था| लेकिन फिर भी वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पा रही थी| ना जाने अभय की आवाज़ सुनते ही उसे क्या हो जाता था| उसने सगाई में जाने के लिये अभय को कोई ज़वाब नहीं दिया|

और फिर उनकी बातचीत एकदम बंद हो गयी| ना तो सुजाता ने ही कभी अभय को संपर्क करने की कोशिश की और ना ही अभय ने दुबारा उसे फोन किया| वो शायद अपनी दुनिया में मग्न हो चुका था सुजाता की फ़िक्र छोड़कर| सुजाता ने भी कुछ ऐसा ही किया, उसने तो अपने फोन से अभय का नंबर भी निकाल दिया था ताकि वह भूले से भी उसको फोन ना कर पाये|

सुजाता ने अपने आप को धीरे-धीरे संभाला| उसके लिये ये सब एकदम नयी बात थी क्योंकि इससे पहले उसे कुछ खबर ही नहीं थी की प्यार होता क्या है, उसका एहसास क्या होता है और जब किसी से प्यार हो जाता है तो उसे जाहिर करने में कितनी तकलीफ़ होती है| उसे पता था की इसमें अभय की कोई गलती नहीं थी क्योंकि खुद उसे ही काफ़ी देर बाद पता चला की वह अभय से प्यार करने लगी थी| उसे बुरा सिर्फ अभय की उन बातों का लगा था जिसने उसे उन लड़कियों के साथ खड़ा कर दिया था जो अभय के करीब सिर्फ उसकी सुन्दरता को देखकर आती थी| उनका प्यार से कोई लेना देना नहीं था| अभय ने उसके प्यार को इतना नीचे गिरा दिया था|

लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| जो होना था हो चुका था| अभय उसकी ज़िन्दगी से जा चुका था हमेशा के लिये| और वह खुद भी नहीं चाहती थी की वह वापिस लौटकर आये क्योंकि अगर वह वापिस आ भी गया तो भी वह कभी भी उसकी भावनाओं को नहीं समझ पायेगा| लेकिन उसने कभी भी अभय से नफरत नहीं की उसे छोड़ देने के लिए क्योंकि वे कभी साथ थे ही नहीं| उनका रिश्ता कभी बना ही नहीं था| और सुजाता ने फैसला किया की अभय के साथ बिताए पलों को किसी कड़वी याद की तरह रखने की बज़ाय वह उन्हें एक मीठी याद की तरह सजोकर रखेगी क्योंकि यही वो पल थे जब उसने प्यार का मतलब जाना था, उसे महसूस किया था|

लेकिन सिर्फ सोच लेने से अगर ऐसा हो जाता तो हर वो इन्सान जिसका दिल टूटता है बड़ी ही आसानी से सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाता| यह उतना आसान नहीं होता जीतना की लगता है| सुजाता को हमेशा ही यही लगता था की एक दिन अभय को समझ आ ही जायेगा की वह उससे कितना प्यार करती है और उस दिन वह सुन्दरता की मोह माया से निकलकर उसके पास चला आयेगा| सुजाता के लिए हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता था की शायद आज अभय का फोन आ जाये लेकिन उसकी हर रात आंसुओं के साथ गुजरती थी| उसका ध्यान हर चीज़ से हटने लगा था| उसे बस अभय चाहिए था| वह रोती, मिन्नतें करती की क्यों नहीं अभय उसे मिल सकता है| कई बार उसके लिए यह सब बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता था|

सुजाता ने अपने आप को अभय के मोह में इस कदर बांध लिया था की वह वहाँ से बाहर ही नहीं निकलना चाहती थी| अभय के जाने के बाद बिखरी अपनी दुनिया को उसने वापिस समेटना तो शुरू कर दिया था लेकिन फिर भी वह उसे भूलना नहीं चाहती थी| वह चाहे कितना भी दिखावा करे उसे भूल जाने का लेकिन सच्चाई यही थी की वह उसे भूल नहीं पा रही थी| लेकन धीरे-धीरे उसने अभय को अपने दिल के एक कोने में समेट दिया था| ऐसा कोना जिस पर वह कभी निगाह नहीं डालन चाहती थी|

और इसी बीच तीन साल बीत गये| लेकिन सुजाता अभय को भूली नहीं थी| पता नहीं क्यों वह उसके वापिस आ जाने की उम्मीद पर जी रही थी जबकि उसे पता था की ऐसा कभी नहीं होगा| वह इतनी बेवकूफ़ कैसे हो सकती थी|

लेकिन जो कुछ भी हो सुजाता का दिल अब धड़कने लगा था| वह अब उस इन्सान के सपने देखने लगी थी जो सच में उसे प्यार करेगा| उसे नहीं पता था की उसे किस की चाहत है, वह कौन है, लेकिन उसे उस एक के मिल जाने का बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार था|

इस दौरान सुजाता ने दूसरी जगह नौकरी कर ली|

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‘क्या तुम मेरे लिए एक काम करोगी?’ सुजाता ने देखा की कंपनी में नए लोगों की भर्ती करने का जिम्मा रखने वाली विना उसके ऑफिस में खड़ी थी|

‘क्या हुआ?’

‘वो मुझे विक्रम सर् के लिए सेक्रेटरी को रखना था लेकिन अभी तक कोई नहीं मिला है| और आज वो वापिस लौट रहे हैं| क्या तुम कुछ दिनों के लिये यह काम संभाल लोगी?’

‘लेकिन मैं ही क्यों? ऑफिस में और भी बहुत लोग हैं?’

‘हाँ, है तो लेकिन कोई भी विक्रम सर् के डर की वजह से वहाँ जाना नहीं चाहता है| तुम्हें तो पता ही है वे कितना डांटते है| और तुम उनसे इतना नहीं डरती हो| और तुम्हें शोर्ट हैण्ड भी आती है|’ विना जल्दी-जल्दी इतना सब बोल गयी| और रुकने के बाद उसने एक गहरी साँस ली| ‘देखो प्लीज मेरा ये काम कर दो वर्ना मेरी नौकरी तो गयी|’

‘लेकिन तुम्हें पता है मेरे पास कितना काम है| और ये डेडलाइन भी तो है|’

‘देखो तुम्हें जो मदद चाहिए में करुँगी लेकिन मेरा ये काम कर दो| तुम कहोगी तो तुम्हारा प्रोजेक्ट मैं बना दूँगी लेकिन प्लीज यह कर दो| सिर्फ कुछ दिनों की बात है, एक-दो दिन में इंटरव्यू हैं| सर् के लिये कोई ना कोई ज़रूर मिल जायेगा||’

‘नहीं उसकी कोई जरुरत नहीं है| मैं खुद अपना काम कर लूँगी|’

‘ठीक है तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना है सिर्फ सर् जो कुछ भी कहते हैं उसे नोट करना है| और अगर उनके लिए कोई फोन आयेगा तो तुम्हें उन्हें भी संभालना पड़ेगा ताकि मुलाकात का वक्त दिया जा सके| मैं तुम्हें उनकी डायरी दे देती हूँ|’

सुजाता मना नहीं कर पायी| उसे नहीं पता था की कोई भी विक्रम सर् के साथ काम करने से इतना डरता क्यों था| हाँ वे थोड़ा सख्त थे लेकिन काम में मामले में तो इतनी सख्ती चलती है| वे हमेशा काम वक्त पर चाहते थे, और वे खुद भी समय के बहुत पाबंद थे| हाँ वे अपनी उम्र के लिहाज़ से थोड़ा ज्यादा ही गंभीर लगते थे| वे पैंतीस के आस-पास के होंगे लेकिन किसी साठ साल के आदमी की तरह व्यवहार करते थे| वे ज्यादा सुन्दर तो नहीं थे लेकिन देखने में आकर्षक थे| और उनका छह फुट का कद उन्हें और ज्यादा आकर्षक बना देता था|

विना ने सुजाता को एक डायरी दी जिसमें हर रोज़ होने वाली मीटिंग और मुलाकातों का ब्यौरा दर्ज़ था और मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गयी| सुजाता को पता था की उसने कितनी बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली थी| वह पिछले एक साल से इस ऑफिस में थी और इस एक साल के दौरान ही उन्होंने पांच सेक्रेटरी बदल दी थी| उन्हें किसी का काम करने का तरीका ही पसंद नहीं आता था| उसने सुना था जब से उनके पुराने सेक्रेटरी जो उनके साथ पिछले दस सालों से काम कर रहे थे नौकरी छोड़कर गये हैं तब से उन्होंने कई सेक्रेटरी बदल ली थी| इसलिए उनके ऑफिस में कोई नहीं जाना चाहता था क्योंकि अगर वे उस पर नाराज़ हो गये तो समझ लो की उनकी नौकरी गयी| लेकिन सुजाता को कभी उनसे डर नहीं लगा| वे अगर भूत भी होते तो भी वह उनसे नहीं डरती|

अगले दिन सुजाता वक्त से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी| वैसे वह हमेशा ही वक्त से पहले ही ऑफिस पहुँच जाया करती थी| लेकिन आज वह और पंद्रह मिनट पहले पहुँच गयी थी| उसने फटाफट डायरी खोली और उस पर निगाह मारी| दिन भर का कार्यक्रम उसमें था| सुजाता ने पूरे हफ्ते का कार्यक्रम पड़ डाला| दस बजते ही वह विक्रम के आने का इंतज़ार करने लगी| यह कंपनी विक्रम के पिता की थी और वह कॉलेज की पढाई पूरी करते ही इससे जुड़ गया था| बीच में वह आगे की पढाई करने के लिए अमेरिका चला गया| वहाँ से लौटने के बाद ज्यादातर काम का जिम्मा उसके सिर आ गया| इसलिए कुछ और करने के लिए उसके पास वक्त ही नहीं रहा| कभी विक्रम की एक गर्लफ्रेंड हुआ करती थी जिसे वह बहुत चाहता था और शायद उससे शादी भी कर लेता लेकिन उसकी व्यस्तता के चलते वह विक्रम को छोड़कर चली गयी| उसके बाद विक्रम ने अपने आप को काम में एकदम डुबो लिया| उसकी हर बात में सिर्फ काम होता था| इधर-उधर की बातें करना या दोस्तों के साथ टाइम-पास करना जैसे वह भूल ही गया था| वह कभी कभार ही अपने दोस्तों से मिलता था| अपने पैसे और शोहरत की वजह से उसके आस-पास लड़कियों की भी कमी नहीं थी लेकिन उनमें भी वह धीरे-धीरे दिलचस्पी खोता जा रहा था|

Monday, 24 August 2015

सुजाता की कहानी-4

अभय के चले जाने के बाद कई रातें सुजाता ने जागते हुए बिताईं| आफिस में भी उसका मन नहीं लगता था| वह बस एक बार अभय को देख लेना चाहती थी| वह फोन अपने हाथ में लेती, उसका नंबर भी निकाल लेती लेकिन उसे फोन करने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाती थी| उसे पता था की अभय से बात करके वह और ज़्यादा कमज़ोर पड़ जायेगी| उसे पता था की उसे अकेले ही इस तकलीफ़ को सहन करना पड़ेगा|

इसलिए अभय के चले जाने के बाद उसने कभी खुद से अभय को फोन नहीं किया| उसे ऐसा करना ही ठीक लगा क्योंकि अभय से जितना दूर वह रहेगी उतना ही उसके लिये अच्छा होगा| शुरू-शुरू में तो अभय रोज़ सुजाता से फोन पर बात कर लिया करता था लेकिन वक्त के साथ धीरे-धीरे उनकी बातचीत कम होने लगी थी| इसी बीच एक दिन अभय ने उसे मिलने के लिये बुलाया लेकिन सुजाता ने बहाना बनाकर अभय से मिलने से ही मनाकर दिया| उसे पता था की अभय वो मंजिल थी जिसे वह कभी भी नहीं पा सकती थी|

और आज भी उसने यही किया| आज अभय का जन्मदिन था और वह बार-बार उसे फोन कर रहा था लेकिन बहुत चाहने पर भी सुजाता ने उससे बात नहीं की| वह बस एक बार उसकी आवाज़ सुन लेना चाहती थी लेकिन इससे उसका दर्द और बढ़ जायेगा उसे ये भी पता था|

अभय को भी शायद यह महसूस होने लगा था की सुजाता उससे बात नहीं करना चाहती थी लेकिन उसने उससे इस बारे में कभी कुछ नहीं पूछा| और फिर धीरे-धीरे उन लोगों की बातचीत होनी कम होने लगी| और एक वक्त ऐसा आया जब उन लोगों ने कई महीनों तक बात नहीं की|

इस तरह एक साल और बीत गया| तभी एक दिन अचानक अभय उसे एक स्टोर में खरीददारी करते हुए मिल गया| अगर उसने उसे देखा नहीं होता तो वह चुपचाप वहाँ से निकल गयी होती| लेकिन उसे देखते ही अभय फ़ौरन उसके पास आया और उसके मना करने के बावजूद उसे एक कॉफ़ी शॉप में ले गया| वह जानना चाहता था की आखिर उसे हुआ क्या था और उसने उससे बातचीत करना बंद क्यों कर दिया था|

सुजाता काफी देर तक खामोश बैठी रही लेकिन वह अपने आंसुओं को रोक नहीं सकी जो उड़े धोखा देते हुए उसकी आँखों से बह निकले थे| वह नहीं चाहती थी की ऐसा कुछ भी अभय के सामने हो| लेकिन वह अपने आप को रोक नहीं पायी| काफी देर रोने के बाद उसके आंसू थमे| अभय शांत बैठा उसे देख रहा था| वह चाहता था की जो कुछ भी उसके दिल में था वह बाहर निकल आये|

सुजाता सोच रही थी उसे कहना चाहिए या नहीं| उसके साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था| उसे नहीं पता था की उसकी बात सुनकर अभय की क्या प्रतिक्रिया होगी| क्या वह उसे खो तो नहीं देगी|

‘तो अब बताओ क्या हुआ|’

‘नहीं कुछ नहीं|’

‘नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता| बहुत कुछ हुआ है और मैं बिना सुने आज यहाँ से नहीं जाने वाला हूँ|

सुजाता चाहती थी की अपना दिल खोलकर अभय के सामने रख दे, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था| उसने कभी किसी से इस तरह की बात नहीं की थी|

‘वो तुम मुझे अच्छे लगते हो,’ उसने धीरे से कहा|

अभय कुछ पलों के लिए तो खामोश रहा और फिर ज़ोर से हँस पड़ा|

‘बस इतनी सी बात| मुझे लगा ही था| तुम भी ना एकदम बेवकूफ़ हो| पहले क्यों नहीं बताया| और मुझे लगा पता नहीं क्या हुआ|’

अभय को इस तरह हँसता हुआ देखकर सुजाता को हैरानी हो रही थी| तो क्या वह भी उसे पसंद करता है?

‘मुझे लगा कहीं तुम मुझ से गुस्सा न हो जाओ|’

‘तुम्हें लगता है की मैं इस बात पर तुमसे गुस्सा हो जाऊँगा|’

‘पता नहीं?’ सुजाता ने अपना सिर झुका लिया|

‘तुम अगर पहले बता देती तो हम इस बात का कोई ना कोई हल ख़ोज लेते| तुम्हें बेकार ही इतनी तकलीफ़ से नहीं गुजरना पड़ता|’

अभय की बात सुनकर सुजाता को थोड़ी राहत महसूस हुई| उसका दिल भी अब शांत हो गया था|

‘देखो तुम्हारे साथ शायद ऐसा पहली बार हुआ है इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है लेकिन जब कुछ वक्त बीत जायेगा तो तुम्हें इस बात पर हंसी आयेगी की तुमने कितनी बेवकूफी की| हमें कई बार ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें हम बहुत पसंद करने लगते हैं| हमें लगता है हम उनके बिना जी नहीं सकते हैं लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है| तुम देखना कुछ समय बाद तुम यह सब भूल जाओगी|’

‘लेकिन....|’

‘मुझे लगा था तुम बहुत अक्लमंद हो| लेकिन तुम भी उन बेवकूफ़ लड़कियों की तरह निकली|’

‘मतलब?’

‘अरे भई, यह प्यार-व्यार के चक्कर में पड़ना हम जैसे लोगों का काम होता है जिन्हें कुछ और नहीं आता है| और तुम्हें सच कहूँ यह प्यार –व्यार कुछ नहीं होता है बस कुछ देर का आकर्षण होता है| कभी यह जल्दी ख़त्म हो जाता है और कभी देर तक चलता है| लेकिन एक दिन ख़त्म ज़रूर होता है| अब मुझे ही देख लो मुझे पता नहीं आज तक कितनी लड़कियों से प्यार हुआ| लेकिन सब का एक ही अंजाम हुआ, ब्रेक-अप|’

‘लेकिन मैं सच में तुमसे तुमसे प्यार करती हूँ|’

‘हाँ, हाँ मुझे पता है| लेकिन तुम्हारे साथ ऐसा पहली बार हुआ हैं ना इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है| पता है तुम मुझे क्यों अच्छी लगती थी और मैं क्यों तुम्हारे साथ इतना वक्त बिताता था?’

‘क्यों?”

‘क्योंकि मुझे पता था की तुम उन बाकि सब लड़कियों की तरह मुझ से प्यार नहीं कर बैठोगी और मेरे पीछे नहीं पड़ी रहोगी की मैं तुम्हें अपनी गर्लफ्रेंड बना लूँ| मैं उन सब से इतना परेशान हो चुका था| मैं तुम्हें समझदार समझता था लेकिन तुम भी बाकियों की तरह ही निकली| देखो तुम्हें अपना अपना भविष्य के बारे में सोचना चाहिए ना की मेरे बारे में| तुम्हें और भी कई अच्छे लड़के मिल जायेंगे|’

सुजाता एकटक अभय की बातों को सुन रही थी| उसके आंसू अब रुक चुके थे और चेहरा कठोर होने लगा था| अभय को ऐसा क्यों लगा की वह उसके प्यार में नहीं पड़ेगी? क्योंकि वह उससे कम सुन्दर है इसलिए? या फिर जिन लड़कियों के पास दिमाग होता है उनके पास दिल नहीं होता? क्यों वह एक सुन्दर लड़के के प्यार में नहीं पड़ सकती? क्या वह प्यार करना नहीं जानती? क्या प्यार करने का हक़ सिर्फ अभय जैसे लड़कों और उन सुन्दर लड़कियों को होता है जिनके साथ वह घूमता है? क्या उसके पास दिल नहीं है? क्या उसकी कोई भावनाएँ नहीं? और क्या उसका दिल टूटना नहीं जानता? उसका दिल भी चाहता है की कोई उसे भी प्यार करने वाला हो, उसे बाँहों में भरने वाला हो, उसका ख्याल रखने वाला हो, उसे हंसाने वाला हो? क्या वह अभय को उन लड़कियों से कम प्यार करती क्योंकि वह खुबसूरत नहीं है और उनकी तरह बनठन कर नहीं रहती है? क्या प्यार करने के लिए सिर्फ सुन्दर चेहरे और शरीर की ही जरुरत होती है? क्या मन की भावनाओं का इससे कोई लेना देना नहीं है?

उसे समझ आ रहा था की अभय जैसा लड़का उसे कभी पसंद कर ही नहीं सकता है| शायद उसके साथ होने और उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाने में उसे शर्मिंदगी महसूस होगी| उसे कोई अपने जैसी ही पसंद आयेगी जो उसके जितनी ही गोरी हो, और उस जितनी ही सुन्दर हो| और सिर्फ अभय ही नहीं बल्कि और लोग भी उसके जैसी लड़की को अभय के साथ देखकर पहला सवाल यही करेंगे - क्या इसे कोई और नहीं मिली? हमारे समाज में शादी के वक्त लड़की का सिर्फ एक गुण होता है और वह है उसकी सुन्दरता| अगर लड़की सुन्दर नहीं है तो उसके दुसरें गुणों का कोई मोल नहीं है|

और आज अभय को शायद और ज्यादा घमंड हो गया होगा की देखो सुजाता जैसी अक्लमंद लडकियाँ भी उसके पीछे दीवानी हुई फिरती है| अभय की बातों में उसका यह घमंड साफ झलक रहा था|

सुजाता चुपचाप उसे सुनती रही| और एक घंटे बाद वह वापिस घर लौट आयी| शायद अभय को वह जैसा समझ रही थी वह वैसा नहीं था| अगर वह साफ मना कर देता यह कहकर की उसे उससे प्यार नहीं है तो भी सुजाता को इतना बुरा नहीं लगता जितना उसे उसकी ऐसी बातें सुनकर लग रहा था| वह अभय को जितना संवेदनशील और अक्लमंद समझती थी आज उसे उसकी सोच उतनी ही असंवेदनशील और घटिया लग रही थी| उसे अपने दिल के टूट जाने का इतना दुःख नहीं था जितना दुःख उसे इस बात का हो रहा था की अभय के लिए उसकी भावनाओं का कोई मतलब नहीं है| एक दोस्त की खातिर ही सही वह वह उसका दर्द थोड़ा कम कर सकता था लेकिन उसे तो इस बात में आनंद आ रहा था की उसके पीछे भागने वाली लडकियों में सुजाता का भी नाम जुड़ गया था| और उसे इस बात का एहसास तब हुआ जब उसे पता चला वह किस से शादी कर रहा था| उसने अभय के बारे में जैसा सोचा था वह वैसा ही निकला| यही उनकी आखिरी बातचीत भी थी|


continue.....................

Saturday, 8 August 2015

सुजाता की कहानी-3



उस पूरे हफ्ते बरसात युहिं चलती रही और अभय सुजाता को ऐसे ही मेट्रो स्टेशन पर छोड़ता रहा| एक शाम को जब वे आफिस से निकले तो अभय ने सुजाता से पास के कॉफ़ी शाप में कॉफ़ी पीने के लिये चलने के लिये पूछा| सुजाता सिर्फ इसलिए उसके साथ चली गयी क्योंकि अभय ने उसकी इतनी मदद की थी| वे लोग वहाँ पर सिर्फ बीस मिनट ही बैठे होंगे लेकिन वो पहली बार था जब उन लोगों ने खुलकर थोड़ी बात की थी|

सुजाता ने पहले कभी भी किसी से खुलकर इस तरह बात नहीं की थी| उसके पास किसी से बात करने का वक्त ही नहीं था| स्कुल और कालेज में वह हमेशा ही किताबों के ढेर के पीछे छुपी रहती थी| कालेज में उसके साथ पड़ने वाले इसलिए उसका नाम मालूम था क्योंकि वह हमेशा अव्वल आती थी| लेकिन उसके दोस्त बहुत ही कम थे| वही जो पड़ना ज्यादा और मस्ती करना कम पसंद करते थे| ना तो वह किसी के साथ बाहर जाती थी और ना ही कोई उसे ले जाना पसंद करता था| लड़कियाँ ही उससे दोस्ती रखना पसंद नहीं करती थी तो लड़कों की तो बात ही छोड़ दो| उसकी ज़िन्दगी में कोई ऐसा नहीं था जिसे वह दोस्त कह सके, अपना सबसे अच्छा दोस्त|

इसलिए आज जब वह अभय के साथ इस तरह काफ़ी शॉप में अकेले आयी थी तो उसे बड़ा ही अज़ीब लग रहा था| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह उससे क्या बात करे| उसे पता ही नहीं था की बात कैसे की जाती है| वह बातचीत करने में उतनी ही बुरी थी जितना वह पढाई में अच्छी थी|

अभय ने ही उनके लिये कॉफ़ी का ऑडर दिया| कुछ देर तक दोनों ख़ामोशी से कॉफ़ी पीते रहें| दोनों में कुछ खास बातचीत नहीं हुई| कॉफ़ी खत्म होने पर अभय ने सुजाता को मेट्रो स्टेशन छोड़ा और अपने घर के लिये निकल पड़ा|
घर लौटते हुए सुजाता को यह यकीन हो चुका था की शायद अभय उससे दुबारा बात करना पसंद ना करे| अगर वह ऐसा करता है भी तो भी सुजाता को उसका बुरा नहीं लगेगा क्योंकि उसे लोगों के ऐसे व्यवहार की आदत हो चुकी थी जो उसे बोर कहते थे|

अगले दिन जब सुजाता ऑफिस पहुँची तो अभय उसे लिफ्ट में ही मिल गया| उसने मुस्कुराकर उसे हाय कहा| सुजाता ने भी उसे मुस्कुराकर ज़वाब दिया| उस समय सुजाता को लगा की शायद उसे उसका पहला दोस्त मिल गया था| क्योंकि पहली बार कोई उसके रूप को नहीं बल्कि उसकी काबिलियत को पसंद कर रहा था| लेकिन एक बात थी जो सुजाता को समझ नहीं आ रही थी की अभय जैसा सुन्दर लड़का, ऑफिस में कई दूसरी खुबसूरत लड़कियों के होने के बावज़ूद उसी से दोस्ती क्यों कर रहा था?

इसलिए तीन महीनें गुज़र जाने के बावजूद भी सुजाता अभय के साथ बहुत ही कम बात करती थी जबकि अभय ने उसे अपने बारे में उसे सब कुछ बता दिया था, यहाँ तक की अपनी पुरानी तीन गर्लफ्रेंड के बारे में भी जिनके बारे में उसकी पिछली गर्लफ्रेंड को भी नहीं पता था| लेकिन सुजाता ऐसी ही थी उसे काफ़ी वक्त लगता था लोगों के साथ घुलने मिलने में, उनके बातचीत करने में, एक तरह से उन पर विश्वास करने में|

कई महीनों तक उनकी बातचीत सिर्फ हॉय-हैलो तक ही सीमित रही| सुजाता ऑफिस आती, अपना काम करती और शाम को अकेले घर के लिये निकल पड़ती| वो अकेले ही खुश थी| उसे जैसे किसी की जरुरत ही नहीं थी|

लेकिन अभय उसे अकेला रहने ही नहीं देता था| जब भी उसके पास वक्त होता वह सुजाता के पास आकार बैठ जाता और उससे खूब हंसी मज़ाक करता| सुजाता को भी यह सब बहुत अच्छा लगने लगा था| जब भी वह अभय के साथ होती हमेशा ही खूब हंसती, दिल खोलकर|

और कुछ महीनों बाद ही अलग-अलग डिपार्टमेंट में होने के बावजूद वे लोग दिन का काफ़ी वक्त साथ बिताने लगे थे| साथ आना, साथ लंच करना और साथ ही ऑफिस से निकलना| और रोज़ ही अभय सुजाता को मेट्रो स्टेशन छोड़ता था| यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था| एक साल तक उन दोनों ही ज़िन्दगी यूँ ही चलती रही| वे आफिस में ही एक दूसरे से मिलते, हँसी मजाक करते, एक दूसरे की मदद करते, और फिर शाम होते ही अपने-अपने घर के लिये निकल पड़ते|

अचानक एक दिन अभय ने सुजाता को अपने नौकरी छोडने की बात बताई| जब अभय ने सुजाता को इस बारे में बताया तो सुजाता को कुछ अच्छा नहीं लगा| उसे पहले यही लगा की क्योंकि अभय उसका अच्छा दोस्त है इसलिए उसे बुरा महसूस हो रहा है| उसे लग रहा था की अभय के बिना वह ऑफिस में वक्त कैसे गुज़ार पायेगी क्योंकि वही था जो उसकी दिन भर की बोरियत को दूर किया करता था और अपनी बातों से उसे हंसाता था| सुजाता को लगा की शायद उसे उसकी आदत पड़ गयी थी| उसने तो यही सोचा था| लेकिन इसका कारण कुछ और ही था जिसका पता सुजाता को अभय के चले जाने के बाद लगा|

जैसे-जैसे अभय के जाने का दिन नज़दीक आ रहा था वैसे-वैसे सुजाता की बैचेनी भी बढ़ती जा रही थी| उसे नहीं पता था की उसे क्या हो रहा था| उसे यह एहसास तो था की एक ना एक दिन वे दोनों अलग-अलग जगह पर काम कर रहे होंगे लेकिन उसे खुद भी नहीं पता था की वह अभय की कमी को इतना महसूस करेगी| दोनों हमेशा की तरह ही लंच के लिये मिलते, लेकिन सुजाता तो जैसे एकदम खामोश सी हो गयी थी| अभय का ध्यान भी इस तरफ गया था लेकिन उसने सोचा की शायद वह किसी और बात की वजह से उदास थी| उसे लगा की सबकुछ ठीक हो जाने पर सुजाता खुद ही उसे इस बात के बारे में बता देगी| उसे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था की उसकी उदासी का कारण वह खुद था|

जितना भी वक्त सुजाता ने अभय के साथ बिताया उसे यही लगता था की अभय उसका सिर्फ एक अच्छा दोस्त है| इससे ज़्यादा ना तो उसने कभी कुछ सोचा और ना ही कभी महसूस किया| लेकिन फिर भी अभय के चले जाने की बात सुनकर उसके दिल में एक अजीब बैचेनी थी|

इसका कारण था शायद उसे अभय दोस्त से ज़्यादा अच्छा लगने लगा था| लेकिन उसने कभी भी इस बारे में नहीं सोचा ही था| बल्कि उसने कभी किसी से प्यार करने के बारे में ही नहीं सोचा था| जिंदगी की जद्दोजहद में उसका ध्यान कभी भी इस तरफ गया ही नहीं था| स्कूल में, कॉलेज में हर जगह वह लड़कियों को अपने बॉयफ्रेंड के साथ घुमते देखती थी लेकिन उसके दिमाग में कभी भी यह ख्याल नहीं आया था की उसे भी कुछ ऐसा करना चाहिए|

और उसे यह भी पता था की अभय और उसके बीच दोस्ती के रिश्ते से ज्यादा और कुछ नहीं हो सकता था| लेकिन अगर ऐसा था तो फिर वह अभय के चले जाने की बात सुनकर इतनी बैचेन क्यों हो गयी थी| क्या उसे अभय एक दोस्त से ज़्यादा पसंद आने लगा था? शायद हाँ|

लेकिन सुजाता को पता था की अभय ऐसा नहीं सोचता था| इसलिए उसने कभी भी अभय पर इस बात को ज़ाहिर नहीं होने दिया| अभय के जाने से पहले वह जितना शांत रह सकती थी रही| उसने एक तरह से इस बात को स्वीकार कर लिया था की उसके और अभय के बीच में कभी कुछ नहीं हो सकता था| इसलिए यही अच्छा होगा की अभय के लिये अपनी मन की भावनाओं को वह यहीं पर ही खत्म कर दे क्योंकि जितना ज़्यादा वह इसके बारे में सोचेगी उतनी ज़्यादा उसे तकलीफ़ होगी| 

Wednesday, 5 August 2015

सुजाता की कहानी-2

छुट्टी होने पर सुजाता जब ऑफिस की बिल्डिंग से बाहर निकली तो अभय अपनी बाईक पर बैठा बाकि के ट्रेनी को बाय कर रहा था| सुजाता ने उसकी तरफ हलके से मुस्कुरा कर बाय कहा और बाहर के गेट की तरफ बढ़ गयी| वह गेट से बाहर निकल कर पास के ही मेट्रो स्टेशन की तरफ पैदल ही चल दी|

सुजाता|

सुजाता ने पीछे मुड़कर देखा तो पीछे अभय अपनी बाईक लेकर खड़ा हुआ था|

कहाँ जा रही हो|

बस मेट्रो स्टेशन तक|

चलो मैं छोड़ देता हूँ| मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ|

नहीं मैं खुद चली जाऊँगी| यहीं पास में ही तो जाना है|

तो इसमे परेशानी क्या है| मुझे भी उसी तरफ जाना है तो मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ| बस एक मिनट लगेगा|

नहीं मैं खुद चली जाऊँगी| सच में|

तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है|

नहीं, ऐसा कुछ नहीं है| स्टेशन पास ही में है और मुझे पैदल चलना पसंद है|

ठीक है तो फिर मैं चलता हूँ, अभय ने मायूस-सी आवाज़ में जवाब दिया| उसने अपनी बाईक स्टार्ट की और चला गया|

सुजाता भी पांच मिनट में मेट्रो स्टेशन पहुँच गयी|

अगले दिन वे लोग उसी कमरे में बैठे थे जहाँ पर उनकी प्रेजेंटेशन हुई थी| उनका टीम लीडर आया और उसने उन से सवाल पूछने शुरू किये| वे सब काफ़ी डरे हुए थे, सिर्फ एक सुजाता ही थी जो शांत लग रही थी|
उसके बाद उनकी एक और प्रेजेंटेशन हुई और वे वापिस अपने- अपने क्यूबिकल में चले गये| उनका ये दिन भी पहले दिन की ही तरह बिता|

पूरे हफ्ते की ट्रेनिंग के दौरान सुजाता और अभय दिन में सिर्फ तीन बार ही एक दूसरे से मिलते, सुबह आफिस में आते वक्त, दिन में लंच पर और शाम को आफिस से निकलते हुए| उनके बीच बस हाय-हेलो होती और फिर वे दुबारा अपने काम पर लग जाते| उनकी सिर्फ कुछ पलों की मुलाकातों के दौरान सुजाता ने सोचा भी नहीं था की उनकी दोस्ती इतनी गहरी हो जायेगी| बल्कि उसने कभी यह भी नहीं सोचा था की उसके जैसी कम बोलने वाली और शांत रहने वाली लड़की कभी अभय जैसे शरारती और इतने स्टाइलिश लड़के की दोस्त बन जायेगी|

एक हफ्ते की ट्रेनिंग के बाद उनके फिर से पर्सनल इंटरव्यू हुए| जिसमें सिर्फ चार लोगों का सलेक्शन हुआ- अभय, सुजाता, आकाश और चौथा जो की तीसरे ग्रुप में था| चारों को उनके अलग-अलग डिपार्टमेंट में भेज दिया गया| सुजाता फाइनेंस में और अभय टेक्निकल में|

उनकी पहले तीन महीनों की ट्रेनिंग के दौरान भी उनका मिलना सिर्फ हाय-हेलो तक ही सीमित था| वे दोनों कई बार साथ आफिस से निकले, लिफ्ट में साथ थे और बिल्डिंग के गेट से भी साथ निकले लेकिन अभय ने फिर दुबारा सुजाता को बाईक पर छोड़ देने का ऑफर नहीं दिया| वह उसे बाय बोलता और चुपचाप निकल जाता| शायद उसे भी पता था की उनकी दोस्ती नहीं हो सकती थी|

लेकिन उन दोनों की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था| ये उनकी किस्मत ही थी की एक दूसरे से इतनी दूरी रखने के बावजूद वे एक दूसरे के इतने अच्छे दोस्त बन गये|

वे भी बारिश के दिन ही थे| सुजाता छह बजते ही आफिस से निकल गयी| बाहर झमाझम बारिश हो रही थी| सुजाता ने रिक्शा लिया और फटाफट मेट्रो स्टेशन पहुँच गयी लेकिन यह क्या स्टेशन के बाहर काफ़ी भीड़ जमा थी| पूछने पर पता चला की मेट्रो बंद थी और कुछ आसार नज़र नहीं आते की वह जल्दी चलेगी भी| बारिश इतनी तेज़ थी की वह कहीं और भी नहीं जा सकती थी| पूरी सड़क भी पानी में डूबी हुई थी और सड़क पर दूर तक गाड़ियों की लंबी कतारें लगी हुई थी| सुजाता वहीं स्टेशन के बाहर खड़ी ऑटो का इन्जार करने लगी| एक घंटा बीत गया लेकिन कोई भी ऑटो वाला चलने को तैयार नहीं था| सुजाता बुरी तरह भीगी हुई थी और लेट हो जाने की वज़ह से काफ़ी परेशान भी लग रही थी|

तुम यहाँ क्या कर रही हो, चिरपरिचित आवाज़ ने सुजाता को पुकारा|

सुजाता ने देखा की अभय अपनी बाईक पर बैठा सड़क की साईड से उसे पुकार रहा था| उसके पैर घुटनों तक पानी में डूबे हुए थे|

वो मेट्रो बंद है और कोई ऑटो भी नहीं मिल रहा है|

अभय ने भीगी पूरी तरह से भीगी हुई सुजाता को एक बार देखा और ट्रेफिक के बीच से वापिस अपनी बाईक को पीछे खाली सड़क की तरफ घुमा लिया|

चलो जल्दी से बैठो, उसने सुजाता से कहा|

लेकिन?

देखो मैं जैसा कहता हूँ करो वर्ना तुम यहाँ से बाहर नहीं निकल पाओगी| अब जल्दी से बैठ जाओ|

लेकिन मैं कभी पहले बाईक पर नहीं बैठी हूँ, सुजाता ने आशंका व्यक्त की|

उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, बाईक मैं चला रहा हूँ| तुम मेरी तरह अपने पैर दोनों तरफ कर के बैठना तो तुम्हें डर नहीं लगेगा| और अपना ये बैग मुझे दे दो|

सुजाता ने बैग अभय को दे दिया और डरते-डरते अभय के पीछे वाली सीट पर बैठ गयी|

ठीक है अब मैं चलूँ, अभय ने एक बार सुजाता ने पूछा|

हाँ, सुजाता ने धीरे से कहा| वह बैठ तो गयी थी लेकिन उसे काफ़ी डर लग रहा था|

अपनी सीट को ध्यान से पकड़कर बैठना, और अभय ने बाईक स्टार्ट कर दी|

सुजाता का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था| उसकी आँखे बंद थी और उसने अपनी सीट को कसकर पकड़ रखा था| वह पहले कभी इस तरह किसी के साथ बाईक पर नहीं बैठी थी| अभय भी सुजाता के डर को देखते हुए आराम से ही बाईक चला रहा था|

देखो यहाँ लंबा जाम लगा है इसलिए मैं तुम्हें दूसरे रास्ते से ले जा रहा हूँ| ठीक है ना|

सुजाता ने फिर धीरे से हाँ कहा|

तो कहाँ छोड़ दूँ तुम्हें|

राजीव चौक, वहाँ से शायद मुझे मेट्रो मिल जाये|
आधे घंटे के सफर में सुजाता अपनी साँस रोके बैठी रही और अभय बाईक चलाता रहा| बारिश की तेज़ बूंदे उसके मुहँ पर पड़ रही थी| तेज़ हवा और बारिश की बूंदों से बचने के लिये उसने अपना मुहँ अभय के पीछे छुपा रखा था| वह कभी भी किसी लड़के के इतना करीब नहीं आयी थी|

राजीव चौक पर पहुँच कर सुजाता ने चैन की साँस ली|

अगर यहाँ भी मेट्रो नहीं चल रही होगी तो?’ अभय ने उससे कहा|

सुजाता ने कोई ज़वाब नहीं दिया| उसे पहले ही काफ़ी देर हो चुकी थी, अब अगर उसे और इंतज़ार करना पड़ा तो?

तुम ऐसा करो एक बार देख आओ| मैं तुम्हारा यहीं पर इंतज़ार करता हूँ|

सुजाता अंदर गयी और कुछ देर बाद वापिस आयी|

मेट्रो चल रही है, उसने कहा|

तो फिर ठीक है, मैं अब चलता हूँ| अपना ध्यान रखना, अभय ने अपना अपना हेलमेट पहनते हुए कहा|

सुजाता ने उसे मदद के लिये धन्यवाद कहा और वापिस मेट्रो स्टेशन के अंदर चली गयी| अभय भी अपने घर की तरफ बढ़ चला|


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