अभय जिस लड़की से शादी कर रहा था सुजाता उसे अच्छी तरह से जानती थी| सलोनी थी ही इतनी सुन्दर की ऑफिस का हर लड़का उस पर मरता था| उसका दूध जैसा सफ़ेद रंग हर लड़की की जलन का कारण था| वह जितनी सुन्दर थी उतनी ही स्टाइलिश भी थी| अभय क्यों उसे छोड़कर सुजाता के पास आयेगा जिसके पास ना रूप है ना रंग| उसके पास सिर्फ अच्छा दिमाग था जिससे ज्यादातर लड़कों को कुछ लेना-देना नहीं होता|
जब अभय ने अपनी सगाई की खबर देने के लिये सुजाता को फोन किया तो वह ख़ामोशी से अभय की बात सुनती रही, उसके गालों पर आंसुओं की दो लकीरें बन गयी थी| उसे पहले से ही पता था की एक दिन ऐसा होने वाला था| लेकिन फिर भी वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पा रही थी| ना जाने अभय की आवाज़ सुनते ही उसे क्या हो जाता था| उसने सगाई में जाने के लिये अभय को कोई ज़वाब नहीं दिया|
और फिर उनकी बातचीत एकदम बंद हो गयी| ना तो सुजाता ने ही कभी अभय को संपर्क करने की कोशिश की और ना ही अभय ने दुबारा उसे फोन किया| वो शायद अपनी दुनिया में मग्न हो चुका था सुजाता की फ़िक्र छोड़कर| सुजाता ने भी कुछ ऐसा ही किया, उसने तो अपने फोन से अभय का नंबर भी निकाल दिया था ताकि वह भूले से भी उसको फोन ना कर पाये|
सुजाता ने अपने आप को धीरे-धीरे संभाला| उसके लिये ये सब एकदम नयी बात थी क्योंकि इससे पहले उसे कुछ खबर ही नहीं थी की प्यार होता क्या है, उसका एहसास क्या होता है और जब किसी से प्यार हो जाता है तो उसे जाहिर करने में कितनी तकलीफ़ होती है| उसे पता था की इसमें अभय की कोई गलती नहीं थी क्योंकि खुद उसे ही काफ़ी देर बाद पता चला की वह अभय से प्यार करने लगी थी| उसे बुरा सिर्फ अभय की उन बातों का लगा था जिसने उसे उन लड़कियों के साथ खड़ा कर दिया था जो अभय के करीब सिर्फ उसकी सुन्दरता को देखकर आती थी| उनका प्यार से कोई लेना देना नहीं था| अभय ने उसके प्यार को इतना नीचे गिरा दिया था|
लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| जो होना था हो चुका था| अभय उसकी ज़िन्दगी से जा चुका था हमेशा के लिये| और वह खुद भी नहीं चाहती थी की वह वापिस लौटकर आये क्योंकि अगर वह वापिस आ भी गया तो भी वह कभी भी उसकी भावनाओं को नहीं समझ पायेगा| लेकिन उसने कभी भी अभय से नफरत नहीं की उसे छोड़ देने के लिए क्योंकि वे कभी साथ थे ही नहीं| उनका रिश्ता कभी बना ही नहीं था| और सुजाता ने फैसला किया की अभय के साथ बिताए पलों को किसी कड़वी याद की तरह रखने की बज़ाय वह उन्हें एक मीठी याद की तरह सजोकर रखेगी क्योंकि यही वो पल थे जब उसने प्यार का मतलब जाना था, उसे महसूस किया था|
लेकिन सिर्फ सोच लेने से अगर ऐसा हो जाता तो हर वो इन्सान जिसका दिल टूटता है बड़ी ही आसानी से सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाता| यह उतना आसान नहीं होता जीतना की लगता है| सुजाता को हमेशा ही यही लगता था की एक दिन अभय को समझ आ ही जायेगा की वह उससे कितना प्यार करती है और उस दिन वह सुन्दरता की मोह माया से निकलकर उसके पास चला आयेगा| सुजाता के लिए हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता था की शायद आज अभय का फोन आ जाये लेकिन उसकी हर रात आंसुओं के साथ गुजरती थी| उसका ध्यान हर चीज़ से हटने लगा था| उसे बस अभय चाहिए था| वह रोती, मिन्नतें करती की क्यों नहीं अभय उसे मिल सकता है| कई बार उसके लिए यह सब बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता था|
सुजाता ने अपने आप को अभय के मोह में इस कदर बांध लिया था की वह वहाँ से बाहर ही नहीं निकलना चाहती थी| अभय के जाने के बाद बिखरी अपनी दुनिया को उसने वापिस समेटना तो शुरू कर दिया था लेकिन फिर भी वह उसे भूलना नहीं चाहती थी| वह चाहे कितना भी दिखावा करे उसे भूल जाने का लेकिन सच्चाई यही थी की वह उसे भूल नहीं पा रही थी| लेकन धीरे-धीरे उसने अभय को अपने दिल के एक कोने में समेट दिया था| ऐसा कोना जिस पर वह कभी निगाह नहीं डालन चाहती थी|
और इसी बीच तीन साल बीत गये| लेकिन सुजाता अभय को भूली नहीं थी| पता नहीं क्यों वह उसके वापिस आ जाने की उम्मीद पर जी रही थी जबकि उसे पता था की ऐसा कभी नहीं होगा| वह इतनी बेवकूफ़ कैसे हो सकती थी|
लेकिन जो कुछ भी हो सुजाता का दिल अब धड़कने लगा था| वह अब उस इन्सान के सपने देखने लगी थी जो सच में उसे प्यार करेगा| उसे नहीं पता था की उसे किस की चाहत है, वह कौन है, लेकिन उसे उस एक के मिल जाने का बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार था|
इस दौरान सुजाता ने दूसरी जगह नौकरी कर ली|
********************
‘क्या तुम मेरे लिए एक काम करोगी?’ सुजाता ने देखा की कंपनी में नए लोगों की भर्ती करने का जिम्मा रखने वाली विना उसके ऑफिस में खड़ी थी|
‘क्या हुआ?’
‘वो मुझे विक्रम सर् के लिए सेक्रेटरी को रखना था लेकिन अभी तक कोई नहीं मिला है| और आज वो वापिस लौट रहे हैं| क्या तुम कुछ दिनों के लिये यह काम संभाल लोगी?’
‘लेकिन मैं ही क्यों? ऑफिस में और भी बहुत लोग हैं?’
‘हाँ, है तो लेकिन कोई भी विक्रम सर् के डर की वजह से वहाँ जाना नहीं चाहता है| तुम्हें तो पता ही है वे कितना डांटते है| और तुम उनसे इतना नहीं डरती हो| और तुम्हें शोर्ट हैण्ड भी आती है|’ विना जल्दी-जल्दी इतना सब बोल गयी| और रुकने के बाद उसने एक गहरी साँस ली| ‘देखो प्लीज मेरा ये काम कर दो वर्ना मेरी नौकरी तो गयी|’
‘लेकिन तुम्हें पता है मेरे पास कितना काम है| और ये डेडलाइन भी तो है|’
‘देखो तुम्हें जो मदद चाहिए में करुँगी लेकिन मेरा ये काम कर दो| तुम कहोगी तो तुम्हारा प्रोजेक्ट मैं बना दूँगी लेकिन प्लीज यह कर दो| सिर्फ कुछ दिनों की बात है, एक-दो दिन में इंटरव्यू हैं| सर् के लिये कोई ना कोई ज़रूर मिल जायेगा||’
‘नहीं उसकी कोई जरुरत नहीं है| मैं खुद अपना काम कर लूँगी|’
‘ठीक है तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना है सिर्फ सर् जो कुछ भी कहते हैं उसे नोट करना है| और अगर उनके लिए कोई फोन आयेगा तो तुम्हें उन्हें भी संभालना पड़ेगा ताकि मुलाकात का वक्त दिया जा सके| मैं तुम्हें उनकी डायरी दे देती हूँ|’
सुजाता मना नहीं कर पायी| उसे नहीं पता था की कोई भी विक्रम सर् के साथ काम करने से इतना डरता क्यों था| हाँ वे थोड़ा सख्त थे लेकिन काम में मामले में तो इतनी सख्ती चलती है| वे हमेशा काम वक्त पर चाहते थे, और वे खुद भी समय के बहुत पाबंद थे| हाँ वे अपनी उम्र के लिहाज़ से थोड़ा ज्यादा ही गंभीर लगते थे| वे पैंतीस के आस-पास के होंगे लेकिन किसी साठ साल के आदमी की तरह व्यवहार करते थे| वे ज्यादा सुन्दर तो नहीं थे लेकिन देखने में आकर्षक थे| और उनका छह फुट का कद उन्हें और ज्यादा आकर्षक बना देता था|
विना ने सुजाता को एक डायरी दी जिसमें हर रोज़ होने वाली मीटिंग और मुलाकातों का ब्यौरा दर्ज़ था और मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गयी| सुजाता को पता था की उसने कितनी बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली थी| वह पिछले एक साल से इस ऑफिस में थी और इस एक साल के दौरान ही उन्होंने पांच सेक्रेटरी बदल दी थी| उन्हें किसी का काम करने का तरीका ही पसंद नहीं आता था| उसने सुना था जब से उनके पुराने सेक्रेटरी जो उनके साथ पिछले दस सालों से काम कर रहे थे नौकरी छोड़कर गये हैं तब से उन्होंने कई सेक्रेटरी बदल ली थी| इसलिए उनके ऑफिस में कोई नहीं जाना चाहता था क्योंकि अगर वे उस पर नाराज़ हो गये तो समझ लो की उनकी नौकरी गयी| लेकिन सुजाता को कभी उनसे डर नहीं लगा| वे अगर भूत भी होते तो भी वह उनसे नहीं डरती|
अगले दिन सुजाता वक्त से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी| वैसे वह हमेशा ही वक्त से पहले ही ऑफिस पहुँच जाया करती थी| लेकिन आज वह और पंद्रह मिनट पहले पहुँच गयी थी| उसने फटाफट डायरी खोली और उस पर निगाह मारी| दिन भर का कार्यक्रम उसमें था| सुजाता ने पूरे हफ्ते का कार्यक्रम पड़ डाला| दस बजते ही वह विक्रम के आने का इंतज़ार करने लगी| यह कंपनी विक्रम के पिता की थी और वह कॉलेज की पढाई पूरी करते ही इससे जुड़ गया था| बीच में वह आगे की पढाई करने के लिए अमेरिका चला गया| वहाँ से लौटने के बाद ज्यादातर काम का जिम्मा उसके सिर आ गया| इसलिए कुछ और करने के लिए उसके पास वक्त ही नहीं रहा| कभी विक्रम की एक गर्लफ्रेंड हुआ करती थी जिसे वह बहुत चाहता था और शायद उससे शादी भी कर लेता लेकिन उसकी व्यस्तता के चलते वह विक्रम को छोड़कर चली गयी| उसके बाद विक्रम ने अपने आप को काम में एकदम डुबो लिया| उसकी हर बात में सिर्फ काम होता था| इधर-उधर की बातें करना या दोस्तों के साथ टाइम-पास करना जैसे वह भूल ही गया था| वह कभी कभार ही अपने दोस्तों से मिलता था| अपने पैसे और शोहरत की वजह से उसके आस-पास लड़कियों की भी कमी नहीं थी लेकिन उनमें भी वह धीरे-धीरे दिलचस्पी खोता जा रहा था|
जब अभय ने अपनी सगाई की खबर देने के लिये सुजाता को फोन किया तो वह ख़ामोशी से अभय की बात सुनती रही, उसके गालों पर आंसुओं की दो लकीरें बन गयी थी| उसे पहले से ही पता था की एक दिन ऐसा होने वाला था| लेकिन फिर भी वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पा रही थी| ना जाने अभय की आवाज़ सुनते ही उसे क्या हो जाता था| उसने सगाई में जाने के लिये अभय को कोई ज़वाब नहीं दिया|
और फिर उनकी बातचीत एकदम बंद हो गयी| ना तो सुजाता ने ही कभी अभय को संपर्क करने की कोशिश की और ना ही अभय ने दुबारा उसे फोन किया| वो शायद अपनी दुनिया में मग्न हो चुका था सुजाता की फ़िक्र छोड़कर| सुजाता ने भी कुछ ऐसा ही किया, उसने तो अपने फोन से अभय का नंबर भी निकाल दिया था ताकि वह भूले से भी उसको फोन ना कर पाये|
सुजाता ने अपने आप को धीरे-धीरे संभाला| उसके लिये ये सब एकदम नयी बात थी क्योंकि इससे पहले उसे कुछ खबर ही नहीं थी की प्यार होता क्या है, उसका एहसास क्या होता है और जब किसी से प्यार हो जाता है तो उसे जाहिर करने में कितनी तकलीफ़ होती है| उसे पता था की इसमें अभय की कोई गलती नहीं थी क्योंकि खुद उसे ही काफ़ी देर बाद पता चला की वह अभय से प्यार करने लगी थी| उसे बुरा सिर्फ अभय की उन बातों का लगा था जिसने उसे उन लड़कियों के साथ खड़ा कर दिया था जो अभय के करीब सिर्फ उसकी सुन्दरता को देखकर आती थी| उनका प्यार से कोई लेना देना नहीं था| अभय ने उसके प्यार को इतना नीचे गिरा दिया था|
लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| जो होना था हो चुका था| अभय उसकी ज़िन्दगी से जा चुका था हमेशा के लिये| और वह खुद भी नहीं चाहती थी की वह वापिस लौटकर आये क्योंकि अगर वह वापिस आ भी गया तो भी वह कभी भी उसकी भावनाओं को नहीं समझ पायेगा| लेकिन उसने कभी भी अभय से नफरत नहीं की उसे छोड़ देने के लिए क्योंकि वे कभी साथ थे ही नहीं| उनका रिश्ता कभी बना ही नहीं था| और सुजाता ने फैसला किया की अभय के साथ बिताए पलों को किसी कड़वी याद की तरह रखने की बज़ाय वह उन्हें एक मीठी याद की तरह सजोकर रखेगी क्योंकि यही वो पल थे जब उसने प्यार का मतलब जाना था, उसे महसूस किया था|
लेकिन सिर्फ सोच लेने से अगर ऐसा हो जाता तो हर वो इन्सान जिसका दिल टूटता है बड़ी ही आसानी से सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाता| यह उतना आसान नहीं होता जीतना की लगता है| सुजाता को हमेशा ही यही लगता था की एक दिन अभय को समझ आ ही जायेगा की वह उससे कितना प्यार करती है और उस दिन वह सुन्दरता की मोह माया से निकलकर उसके पास चला आयेगा| सुजाता के लिए हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता था की शायद आज अभय का फोन आ जाये लेकिन उसकी हर रात आंसुओं के साथ गुजरती थी| उसका ध्यान हर चीज़ से हटने लगा था| उसे बस अभय चाहिए था| वह रोती, मिन्नतें करती की क्यों नहीं अभय उसे मिल सकता है| कई बार उसके लिए यह सब बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता था|
सुजाता ने अपने आप को अभय के मोह में इस कदर बांध लिया था की वह वहाँ से बाहर ही नहीं निकलना चाहती थी| अभय के जाने के बाद बिखरी अपनी दुनिया को उसने वापिस समेटना तो शुरू कर दिया था लेकिन फिर भी वह उसे भूलना नहीं चाहती थी| वह चाहे कितना भी दिखावा करे उसे भूल जाने का लेकिन सच्चाई यही थी की वह उसे भूल नहीं पा रही थी| लेकन धीरे-धीरे उसने अभय को अपने दिल के एक कोने में समेट दिया था| ऐसा कोना जिस पर वह कभी निगाह नहीं डालन चाहती थी|
और इसी बीच तीन साल बीत गये| लेकिन सुजाता अभय को भूली नहीं थी| पता नहीं क्यों वह उसके वापिस आ जाने की उम्मीद पर जी रही थी जबकि उसे पता था की ऐसा कभी नहीं होगा| वह इतनी बेवकूफ़ कैसे हो सकती थी|
लेकिन जो कुछ भी हो सुजाता का दिल अब धड़कने लगा था| वह अब उस इन्सान के सपने देखने लगी थी जो सच में उसे प्यार करेगा| उसे नहीं पता था की उसे किस की चाहत है, वह कौन है, लेकिन उसे उस एक के मिल जाने का बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार था|
इस दौरान सुजाता ने दूसरी जगह नौकरी कर ली|
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‘क्या तुम मेरे लिए एक काम करोगी?’ सुजाता ने देखा की कंपनी में नए लोगों की भर्ती करने का जिम्मा रखने वाली विना उसके ऑफिस में खड़ी थी|
‘क्या हुआ?’
‘वो मुझे विक्रम सर् के लिए सेक्रेटरी को रखना था लेकिन अभी तक कोई नहीं मिला है| और आज वो वापिस लौट रहे हैं| क्या तुम कुछ दिनों के लिये यह काम संभाल लोगी?’
‘लेकिन मैं ही क्यों? ऑफिस में और भी बहुत लोग हैं?’
‘हाँ, है तो लेकिन कोई भी विक्रम सर् के डर की वजह से वहाँ जाना नहीं चाहता है| तुम्हें तो पता ही है वे कितना डांटते है| और तुम उनसे इतना नहीं डरती हो| और तुम्हें शोर्ट हैण्ड भी आती है|’ विना जल्दी-जल्दी इतना सब बोल गयी| और रुकने के बाद उसने एक गहरी साँस ली| ‘देखो प्लीज मेरा ये काम कर दो वर्ना मेरी नौकरी तो गयी|’
‘लेकिन तुम्हें पता है मेरे पास कितना काम है| और ये डेडलाइन भी तो है|’
‘देखो तुम्हें जो मदद चाहिए में करुँगी लेकिन मेरा ये काम कर दो| तुम कहोगी तो तुम्हारा प्रोजेक्ट मैं बना दूँगी लेकिन प्लीज यह कर दो| सिर्फ कुछ दिनों की बात है, एक-दो दिन में इंटरव्यू हैं| सर् के लिये कोई ना कोई ज़रूर मिल जायेगा||’
‘नहीं उसकी कोई जरुरत नहीं है| मैं खुद अपना काम कर लूँगी|’
‘ठीक है तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना है सिर्फ सर् जो कुछ भी कहते हैं उसे नोट करना है| और अगर उनके लिए कोई फोन आयेगा तो तुम्हें उन्हें भी संभालना पड़ेगा ताकि मुलाकात का वक्त दिया जा सके| मैं तुम्हें उनकी डायरी दे देती हूँ|’
सुजाता मना नहीं कर पायी| उसे नहीं पता था की कोई भी विक्रम सर् के साथ काम करने से इतना डरता क्यों था| हाँ वे थोड़ा सख्त थे लेकिन काम में मामले में तो इतनी सख्ती चलती है| वे हमेशा काम वक्त पर चाहते थे, और वे खुद भी समय के बहुत पाबंद थे| हाँ वे अपनी उम्र के लिहाज़ से थोड़ा ज्यादा ही गंभीर लगते थे| वे पैंतीस के आस-पास के होंगे लेकिन किसी साठ साल के आदमी की तरह व्यवहार करते थे| वे ज्यादा सुन्दर तो नहीं थे लेकिन देखने में आकर्षक थे| और उनका छह फुट का कद उन्हें और ज्यादा आकर्षक बना देता था|
विना ने सुजाता को एक डायरी दी जिसमें हर रोज़ होने वाली मीटिंग और मुलाकातों का ब्यौरा दर्ज़ था और मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गयी| सुजाता को पता था की उसने कितनी बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली थी| वह पिछले एक साल से इस ऑफिस में थी और इस एक साल के दौरान ही उन्होंने पांच सेक्रेटरी बदल दी थी| उन्हें किसी का काम करने का तरीका ही पसंद नहीं आता था| उसने सुना था जब से उनके पुराने सेक्रेटरी जो उनके साथ पिछले दस सालों से काम कर रहे थे नौकरी छोड़कर गये हैं तब से उन्होंने कई सेक्रेटरी बदल ली थी| इसलिए उनके ऑफिस में कोई नहीं जाना चाहता था क्योंकि अगर वे उस पर नाराज़ हो गये तो समझ लो की उनकी नौकरी गयी| लेकिन सुजाता को कभी उनसे डर नहीं लगा| वे अगर भूत भी होते तो भी वह उनसे नहीं डरती|
अगले दिन सुजाता वक्त से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी| वैसे वह हमेशा ही वक्त से पहले ही ऑफिस पहुँच जाया करती थी| लेकिन आज वह और पंद्रह मिनट पहले पहुँच गयी थी| उसने फटाफट डायरी खोली और उस पर निगाह मारी| दिन भर का कार्यक्रम उसमें था| सुजाता ने पूरे हफ्ते का कार्यक्रम पड़ डाला| दस बजते ही वह विक्रम के आने का इंतज़ार करने लगी| यह कंपनी विक्रम के पिता की थी और वह कॉलेज की पढाई पूरी करते ही इससे जुड़ गया था| बीच में वह आगे की पढाई करने के लिए अमेरिका चला गया| वहाँ से लौटने के बाद ज्यादातर काम का जिम्मा उसके सिर आ गया| इसलिए कुछ और करने के लिए उसके पास वक्त ही नहीं रहा| कभी विक्रम की एक गर्लफ्रेंड हुआ करती थी जिसे वह बहुत चाहता था और शायद उससे शादी भी कर लेता लेकिन उसकी व्यस्तता के चलते वह विक्रम को छोड़कर चली गयी| उसके बाद विक्रम ने अपने आप को काम में एकदम डुबो लिया| उसकी हर बात में सिर्फ काम होता था| इधर-उधर की बातें करना या दोस्तों के साथ टाइम-पास करना जैसे वह भूल ही गया था| वह कभी कभार ही अपने दोस्तों से मिलता था| अपने पैसे और शोहरत की वजह से उसके आस-पास लड़कियों की भी कमी नहीं थी लेकिन उनमें भी वह धीरे-धीरे दिलचस्पी खोता जा रहा था|