उस पूरे हफ्ते बरसात युहिं चलती रही और अभय सुजाता को ऐसे ही मेट्रो स्टेशन पर
छोड़ता रहा| एक शाम को जब वे आफिस से निकले तो अभय ने सुजाता से पास के कॉफ़ी शाप
में कॉफ़ी पीने के लिये चलने के लिये पूछा| सुजाता सिर्फ इसलिए उसके साथ चली गयी
क्योंकि अभय ने उसकी इतनी मदद की थी| वे लोग वहाँ पर सिर्फ बीस मिनट ही बैठे होंगे
लेकिन वो पहली बार था जब उन लोगों ने खुलकर थोड़ी बात की थी|
सुजाता ने पहले कभी भी किसी से खुलकर इस तरह बात नहीं की थी| उसके पास किसी से
बात करने का वक्त ही नहीं था| स्कुल और कालेज में वह हमेशा ही किताबों के ढेर के
पीछे छुपी रहती थी| कालेज में उसके साथ पड़ने वाले इसलिए उसका नाम मालूम था क्योंकि
वह हमेशा अव्वल आती थी| लेकिन उसके दोस्त बहुत ही कम थे| वही जो पड़ना ज्यादा और मस्ती करना कम पसंद करते थे| ना तो वह किसी के साथ बाहर जाती थी और ना ही कोई उसे ले
जाना पसंद करता था| लड़कियाँ ही उससे दोस्ती रखना पसंद नहीं करती थी तो लड़कों की तो
बात ही छोड़ दो| उसकी ज़िन्दगी में कोई ऐसा नहीं था जिसे वह दोस्त कह सके, अपना
सबसे अच्छा दोस्त|
इसलिए आज जब वह अभय के साथ इस तरह काफ़ी शॉप में अकेले आयी थी तो उसे बड़ा ही
अज़ीब लग रहा था| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह उससे क्या बात करे| उसे पता ही नहीं
था की बात कैसे की जाती है| वह बातचीत करने में उतनी ही बुरी थी जितना वह पढाई में
अच्छी थी|
अभय ने ही उनके लिये कॉफ़ी का ऑडर दिया| कुछ देर तक दोनों ख़ामोशी से कॉफ़ी पीते
रहें| दोनों में कुछ खास बातचीत नहीं हुई| कॉफ़ी खत्म होने पर अभय ने सुजाता को
मेट्रो स्टेशन छोड़ा और अपने घर के लिये निकल पड़ा|
घर लौटते हुए सुजाता को यह यकीन हो चुका था की शायद अभय उससे दुबारा बात करना
पसंद ना करे| अगर वह ऐसा करता है भी तो भी सुजाता को उसका बुरा नहीं लगेगा क्योंकि
उसे लोगों के ऐसे व्यवहार की आदत हो चुकी थी जो उसे बोर कहते थे|
अगले दिन जब सुजाता ऑफिस पहुँची तो अभय उसे लिफ्ट में ही मिल गया| उसने
मुस्कुराकर उसे हाय कहा| सुजाता ने भी उसे मुस्कुराकर ज़वाब दिया| उस समय सुजाता को
लगा की शायद उसे उसका पहला दोस्त मिल गया था| क्योंकि पहली बार कोई उसके रूप को
नहीं बल्कि उसकी काबिलियत को पसंद कर रहा था| लेकिन एक बात थी जो सुजाता को समझ
नहीं आ रही थी की अभय जैसा सुन्दर लड़का, ऑफिस में कई दूसरी खुबसूरत लड़कियों के
होने के बावज़ूद उसी से दोस्ती क्यों कर रहा था?
इसलिए तीन महीनें गुज़र जाने के बावजूद भी सुजाता अभय के साथ बहुत ही कम बात
करती थी जबकि अभय ने उसे अपने बारे में उसे सब कुछ बता दिया था, यहाँ तक की अपनी
पुरानी तीन गर्लफ्रेंड के बारे में भी जिनके बारे में उसकी पिछली गर्लफ्रेंड को भी
नहीं पता था| लेकिन सुजाता ऐसी ही थी उसे काफ़ी वक्त लगता था लोगों के साथ घुलने
मिलने में, उनके बातचीत करने में, एक तरह से उन पर विश्वास करने में|
कई महीनों तक उनकी बातचीत सिर्फ हॉय-हैलो तक ही सीमित रही| सुजाता ऑफिस आती,
अपना काम करती और शाम को अकेले घर के लिये निकल पड़ती| वो अकेले ही खुश थी| उसे
जैसे किसी की जरुरत ही नहीं थी|
लेकिन अभय उसे अकेला रहने ही नहीं देता था| जब भी उसके पास वक्त होता वह सुजाता के पास आकार बैठ जाता
और उससे खूब हंसी मज़ाक करता| सुजाता को भी यह
सब बहुत अच्छा लगने लगा था| जब भी वह अभय के साथ होती हमेशा ही खूब हंसती,
दिल खोलकर|
और कुछ महीनों बाद ही अलग-अलग डिपार्टमेंट में होने के बावजूद वे लोग दिन का
काफ़ी वक्त साथ बिताने लगे थे| साथ आना, साथ लंच करना और साथ ही ऑफिस से निकलना| और
रोज़ ही अभय सुजाता को मेट्रो स्टेशन छोड़ता था| यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन
चुका था| एक साल तक उन दोनों ही ज़िन्दगी यूँ ही चलती रही| वे आफिस में ही एक दूसरे से मिलते, हँसी मजाक
करते, एक दूसरे की मदद करते, और फिर शाम होते ही अपने-अपने घर के लिये निकल पड़ते|
अचानक एक दिन अभय ने सुजाता को अपने नौकरी छोडने की बात बताई| जब अभय ने
सुजाता को इस बारे में बताया तो सुजाता को कुछ अच्छा नहीं लगा| उसे पहले यही लगा
की क्योंकि अभय उसका अच्छा दोस्त है इसलिए उसे बुरा महसूस हो रहा है| उसे लग रहा
था की अभय के बिना वह ऑफिस में वक्त कैसे गुज़ार पायेगी क्योंकि वही था जो उसकी दिन
भर की बोरियत को दूर किया करता था और अपनी बातों से उसे हंसाता था| सुजाता को लगा
की शायद उसे उसकी आदत पड़ गयी थी| उसने तो यही सोचा था| लेकिन इसका कारण कुछ और ही
था जिसका पता सुजाता को अभय के चले जाने के बाद लगा|
जैसे-जैसे अभय के जाने का दिन नज़दीक आ रहा था वैसे-वैसे सुजाता की बैचेनी भी
बढ़ती जा रही थी| उसे नहीं पता था की उसे क्या हो रहा था| उसे यह एहसास तो था की एक
ना एक दिन वे दोनों अलग-अलग जगह पर काम कर रहे होंगे लेकिन उसे खुद भी नहीं पता था
की वह अभय की कमी को इतना महसूस करेगी| दोनों हमेशा की तरह ही लंच के लिये मिलते,
लेकिन सुजाता तो जैसे एकदम खामोश सी हो गयी थी| अभय का ध्यान भी इस तरफ गया था
लेकिन उसने सोचा की शायद वह किसी और बात की वजह से उदास थी| उसे लगा की सबकुछ ठीक
हो जाने पर सुजाता खुद ही उसे इस बात के बारे में बता देगी| उसे बिल्कुल भी अंदाजा
नहीं था की उसकी उदासी का कारण वह खुद था|
जितना भी वक्त सुजाता ने अभय के साथ बिताया उसे यही लगता था की अभय उसका सिर्फ
एक अच्छा दोस्त है| इससे ज़्यादा ना तो उसने कभी कुछ सोचा और ना ही कभी महसूस
किया| लेकिन फिर भी अभय के चले जाने की बात सुनकर उसके दिल में एक अजीब बैचेनी थी|
इसका कारण था शायद उसे अभय दोस्त से ज़्यादा अच्छा लगने लगा था| लेकिन उसने
कभी भी इस बारे में नहीं सोचा ही था| बल्कि उसने कभी किसी से प्यार करने के बारे में ही नहीं सोचा था| जिंदगी की जद्दोजहद में उसका ध्यान कभी भी इस तरफ गया ही नहीं
था| स्कूल में, कॉलेज में हर जगह वह लड़कियों को अपने बॉयफ्रेंड
के साथ घुमते देखती थी लेकिन उसके दिमाग में कभी भी यह ख्याल नहीं आया था की उसे
भी कुछ ऐसा करना चाहिए|
और उसे यह भी पता था की अभय और उसके बीच दोस्ती के रिश्ते से ज्यादा और कुछ
नहीं हो सकता था| लेकिन अगर ऐसा था तो फिर वह अभय के चले जाने की बात सुनकर इतनी
बैचेन क्यों हो गयी थी| क्या उसे अभय एक दोस्त से ज़्यादा पसंद आने लगा था? शायद
हाँ|
लेकिन सुजाता को पता था की अभय ऐसा नहीं सोचता था|
इसलिए उसने कभी भी अभय पर इस बात को ज़ाहिर नहीं होने दिया| अभय के जाने से पहले वह
जितना शांत रह सकती थी रही| उसने एक तरह से इस बात को स्वीकार कर लिया था की उसके
और अभय के बीच में कभी कुछ नहीं हो सकता था| इसलिए यही अच्छा होगा की अभय के लिये
अपनी मन की भावनाओं को वह यहीं पर ही खत्म कर दे क्योंकि जितना ज़्यादा वह इसके
बारे में सोचेगी उतनी ज़्यादा उसे तकलीफ़ होगी|
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