Sunday, 22 November 2015

सुजाता की कहानी- अंत

विक्रम अपने दिल की बातें उसे बताये जा रहा था और सुजाता चुपचाप उसे सुने जा रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह विक्रम को रोके या पूरी बात कह लेने दे| उसने हमेशा से ही इस दिन का इंतज़ार किया था जब कोई उससे कहता की वह उससे प्यार करता है| लेकिन आज ना जाने सुजाता को क्या हो गया था| विक्रम जैसा इन्सान जिसके बारे में उसने सपने में भी नहीं सोचा था उससे कह रहा था की वह उससे प्यार करता है फिर भी वह खामोश बैठी थी, उसके चेहरे पर ख़ुशी का कोई नामोनिशान नहीं था|

विक्रम ने देखा की सुजाता की आँखे भर आई थी और उसकी आँखों से दो आंसू उसके गालों पर लुढ़कने को तैयार थे| विक्रम भी चुप हो गया| उसे लगा की उसकी बातों को सुनकर शायद सुजाता को अच्छा नहीं लगा|

“मुझे लगता है अब हमें चलना चाहिये|” विक्रम ने उठते हुए कहा|

लेकिन सुजाता खामोश अपनी कुर्सी पर बैठी रही| विक्रम भी वापिस बैठ गया|

“सुजाता मैं तुम्हें किसी तरह का दुःख नहीं पहुँचाना चाहता था| अगर तुम्हें मेरी किसी भी बात से चोट पहुँची है तो मैं तुमसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ|”

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है|” सुजाता ने अपनी आँखे पोंछते हुए कहा| “आप जानते हैं आज तक किसी ने मुझ से इस तरह की बातें नहीं कही| और आप....आप मुझ से प्यार करेंगे ऐसा मैंने सोचा भी नहीं था| आप जैसा इन्सान किसी किस्मत वाले को ही मिल सकता है|”

“लेकिन मुझे लगता है की अगर तुम मुझे मिल जाओ तो मैं इन दुनिया में सबसे ज्यादा किस्मत वाला इन्सान होऊंगा|”

सुजाता कुछ देर तक विक्रम का चेहरा निहारती रही| उसने आज तक इस तरह विक्रम की आँखों में नहीं देखा था| ‘क्या सच में ऐसा हो सकता है? क्या सच में विक्रम मुझ से इतना प्यार करता है?’ उसके दिलो-दिमाग में बस यही सवाल घूम रहे थे|

“आपको पता है प्यार की सबसे अजीब बात क्या है?” सुजाता ने विक्रम के चेहरे पर से नज़रे हटाते हुए कहा|

“क्या?”

“यही की जिसे हम चाहते है वह हमें नहीं चाहता और जो हमसे प्यार करता है हमें उसके प्यार की कोई परवाह नहीं होती है| प्यार की चाहत में हम ऐसे इन्सान के पीछे भागते रहते हैं जिसका हमें पता होता है की वह हमें नहीं मिलेगा लेकिन फिर भी हम उससे उसी प्यार की उम्मीद करते हैं जैसा हम उसे करते हैं यह सब जानते हुए भी ऐसा कभी नहीं होगा| और हम उस इन्सान का प्यार ठुकरा देते हैं जो सच में हमें प्यार करता है|

“तो क्या तुम किसी और से प्यार करती हो?”

“प्यार? मुझे शायद ऐसा लगा था की मैं उससे प्यार करती हूँ लेकिन वह जो कुछ भी था बस प्यार नहीं था| प्यार का मतलब होता है किसी भी चीज़ की उम्मीद ना करना लेकिन हम असल में उसे इतना स्वार्थी बना देते हैं की हमें पता ही नहीं चलता की कब हमरा प्यार प्यार न रह कर एक जरुरत बन जाता है| और हम प्यार करने की बजाय उम्मीदों में फंस कर रह जाते हैं| और जब हमारी उम्मीद पूरी नहीं होती तो हम बदला लेने पर उतर आते हैं|”

“क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ|”

“मैं इतना आगे निकल आई हूँ लगता है मैं खुद अपनी मदद नहीं कर सकती हूँ| अगर आप को पता चलेगा की मैं क्या कर रही हूँ तो शायद आप मुझ वैसे पसंद न करे जैसा आप अभी करते हैं|”

“लेकिन....|”

“मुझे लगता है मुझे अब चलना चाहिए|” सुजाता ने उठते हुए कहा|

“मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ|”

सुजाता विक्रम की तरफ देख कर मुस्कुराई| उसे इस दिन का न जाने कब से इंतज़ार था जब कोई उससे कहता की वह उससे प्यार करता है, उसकी जरूरतों का ख्याल रखता, उसे घर छोड़कर आता| लेकिन सुजाता ने एक गलती की, उसने एक गलत इन्सान से इन सब की उम्मीद की| और आज जो कुछ सुजाता कर रही थी इसी गलती का नतीजा था|

सुजाता जब होटल से बाहर निकली तो आठ बजने को थे| उसका फोन बजा| दूसरी तरफ अभय था| सुजाता ने फोन उठाया तो अभय ने उसे बताया की उसने सलोनी को तलाक़ के कागज दे दिए हैं और कुछ दिनों बाद वे दोनों साथ रह सकते हैं| अभय की बात सुनकर सुजाता ने फोन काट दिया| उसका मकसद पूरा हो रहा था|

वही विक्रम अभी भी अपनी जगह पर ही बैठा हुआ था| सुजाता ने उसे क्या कहा और क्या नहीं उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था| उसने उसे ना तो हाँ कहा था और ना ही ना| वह कुछ देर वहाँ पर रुका और फिर अपने घर की तरफ चल दिया|

जब सुजाता घर पहुँची तो वह पहले वाली सुजाता नहीं रह गयी थी| वह उस सुजाता जैसी तो बिल्कुल नहीं थी जो चार साल पहले थी, भोली, मासूम| आज उसकी सारी मासूमियत जा चुकी थी| आज वह बदला लेने वाली सुजाता बन चुकी थी जो बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी| आज सुजाता को समझ आ रहा था की उसने कभी भी अभय से प्यार किया ही नहीं था| वह तो अभय को पाने की एक चाहत भर थी| अगर वह सच में अभय से प्यार करती तो इस तरह उसका घर नहीं बर्बाद करती| लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| उसे जो करना था वह कर चुकी थी| अब उसे बस उस दिन का इंतज़ार था जब अभय उसके पास आयेगा और वह उसे उसी तरह से अपनी जिंदगी से निकाल देगी जैसे अभय ने तीन साल पहले उसे अपनी जिंदगी से निकाला था|

सुजाता यह सब सोच ही रही थी की उसके घर की घंटी बजी| वह उठकर देखने नहीं गयी की दरवाजे पर कौन था| उसे लगा जो कोई भी होगा थोड़ी देर बाद चला जायेगा| लेकिन दस मिनट बाद घंटी फिर बजी| सुजाता ने घड़ी की तरफ देखा रात के दस बज रहे थे| इस वक्त शायद हो कोई उससे मिलने आता था| जब उसने दरवाज़ा खोला तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था विक्रम उसके सामने खड़ा था| वह थोड़ा परेशान लग रहा था|

“मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था| मैं बस तुमसे इतना कहना चाहता हूँ की मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और हमेशा ही तुमसे प्यार करता रहूँगा|”

विक्रम की बात सुनकर सुजाता की आँखों से आंसू बहने लगे| उसे लगा उसके शरीर में जान ही नहीं बची थी की वह अपने पैरों पर खड़ी रह पाये| वह गिरने ही वाली थी की विक्रम ने उसे अपनी बाँहों में थाम लिया| सुजाता कुछ देर उसके सीने से लगी यूँ ही सिसकती रही|

विक्रम की बाँहों में आकर आज उसे समझ आ रहा था की प्यार होता क्या है| आज इस पल वह अभय, सलोनी, अपना बदला सब को भूल चुकी थी| उसे याद था तो बस विक्रम जिसके सीने से वह लिपटी हुई थी, जिसके तेज़ धड़कते दिल की आवाज वह सुन सकती थी| उसे इसी मरहम की जरुरत थी जिसके लिए वह पिछले तीन साल से तड़प रही थी| उसे पता ही नहीं था की उसके बदले की आग अभय से बदला लेकर नहीं बल्कि विक्रम के प्यार से बुझेगी|

सुजाता रातभर विक्रम की बाँहों में ही बैठी रही| सुबह होने को थी लेकिन उन दोनों ने एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं कहा था| शायद उन्हें अपना प्यार जताने के लिए शब्दों की जरुरत ही नहीं थी|

सुजाता ने घड़ी की तरफ देखा सुबह के चार बजे थे| विक्रम की आँखे बंद थी और उसने सोफे पर अपना सिर टिकाया हुआ था| शायद वह हल्की नींद में था| सुजाता ने जब उसका हाथ हिलाया तो वह उठ गया|

“एक काम है जो मुझे पूरा करना है| क्या आप मेरे साथ चलेंगे?” सुजाता ने विक्रम से कहा|

“हाँ|”

और वे दोनों सलोनी के घर की तरफ बढ़ चले| सुजाता ने फोन करके अभय को भी वही पर आने के लिए कहा|

जब वे दोनों सलोनी के घर पहुँचे तो दो अनजान लोगों को इतनी सुबह अपने घर देखकर वह हैरान थी| सुजाता को वह पहली बार देख रही थी| अभय ने कभी भी सलोनी से सुजाता के बारे में बात नहीं की थी| जितनी हैरान सलोनी थी उतना ही हैरान अभय भी था| उसे समझ नहीं आ रहा था की सुजाता ने उसे इस तरह सलोनी के घर क्यों बुलाया था और वो भी तब जब वह उससे शादी करने को तैयार था|

“सलोनी मुझे पता है अभी जो कुछ भी मैं कहने जा रही हूँ उसे सुनकर शायद तुम्हें हैरानी हो क्योंकि जो कुछ भी हुआ उसमे तुम्हारी कोई गलती नहीं थी| बल्कि इसमे किसी की भी कोई गलती नहीं थी जो कुछ भी हुआ वो सब मेरी वजह से हुआ| मैं ही हूँ जिसकी वजह से अभय तुम्हें तलाक देने वाला है| मैंने ही उसे ऐसा करने के लिए भड़काया था|”

अभय और सलोनी दोनों अपना मुहँ खोले हैरानी से उसे देख रहे थे|

“सुजाता ये तुम क्या कह रही हो| तुमने मुझे किसी भी चीज के लिए नहीं भड़काया| मैं खुद सलोनी को तलाक दे रहा हूँ|”

“ऐसा तुम्हें लगता है अभय| मैं तुमसे कभी शादी नहीं करने वाली थी| मैं बस इतना चाहती थी की तुम्हारा और सलोनी का रिश्ता टूट जाये|”

“लेकिन तुम ऐसा क्यों चाहती थी? और हमारा रिश्ता तो पहले से ही टूट चुका था|”

“तुम चाहते तो अपने रिश्ते को बचा सकते थे और तुम ऐसा कर भी रहे थे लेकिन मैंने तुम्हारे दिमाग में सलोनी को तलाक देने की बात डाली| अगर मैं तुमसे ये न कहती की मैं तुमसे प्यार करती हूँ और तुमसे शादी करुँगी क्या तब भी तुम सलोनी को तलाक देते?”

अभय के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था| शायद सुजाता ठीक कह रही थी| अगर सुजाता ने उससे शादी करने के लिए हाँ नहीं कहा होता तो शायद वह सलोनी को तलाक देने की सोचता भी नहीं| सुजाता के आने से पहले वह अपना रिश्ता बचाये रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा था|

“लेकिन तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मैं तो तुम्हें अपना अच्छा दोस्त समझता था?”

“तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यही थी की तुम मुझे अपना दोस्त समझते थे जबकि मैंने तुम्हें अपना दोस्त माना ही नहीं था| तुम शायद भूल गये मैं हमेशा से तुमसे प्यार करती थी या शायद मैं ऐसा समझती थी की मैं तुमसे प्यार करती हूँ| और जब तुमने सलोनी से शादी की तो मुझे लगा की तुमने मुझे ठुकरा कर सलोनी से शादी की है|”

“लेकिन ऐसा कभी भी नहीं था| मैंने कभी भी तुमसे प्यार नहीं किया और मैंने कभी भी तुमसे ऐसा नहीं कहा| अगर तुम आज भी मुझसे पूछोगी तो मैं यही कहूँगा| मैं आज भी तुमसे प्यार नहीं करता| मेरी जिंदगी में सिर्फ सलोनी है जिससे मैंने प्यार किया था|

सलोनी अभय की तरफ देख रही थी| उसकी आँखे भर आई थी|

“मुझे पता है| मैं पिछले तीन सालों से इसी गलतफहमी में जी रही थी| लेकिन आज मुझे समझ आ चुका है| इसलिए मैंने तुम्हें यहाँ पर बुलाया है यह सब बताने के लिए की तुम सलोनी के साथ अपना रिश्ता मत तोड़ो| और सलोनी मैं तुमसे भी यही कहूँगी की चाहे जो भी नाराजगी हो अभय तुमसे से बहुत प्यार करता है|

सुजाता और विक्रम दोनों सलोनी के घर से बाहर निकले तो सूरज निकल आया था| सुजाता के लिए आज का दिन एक नई शुरुआत लेकर आया था| अब उसके सीने में कोई गम नहीं बचा था| जो कुछ भी था उसे विक्रम के प्यार ने साफ कर दिया था| विक्रम ने उसे ऐसा काम करने से बचा लिया था अगर वह हो जाता तो वह जिंदगी भर अपने आप से ही नज़रे नहीं मिला पाती| आज खुद को वह वही पुरानी वाली सुजाता महसूस कर रही थी|

बाहर ठंडी हवा चल रही थी| विक्रम प्यार से सुजाता की तरफ देख रहा था|

“आप मुझ से इस बात से नाराज तो नहीं|” सुजाता ने धीरे से उससे पूछा| लेकिन विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया| उसने सुजाता को अपनी तरफ खिंचा और प्यार से उसे चूम लिया| सुजाता के लिए यही काफी था|

Saturday, 21 November 2015

सुजाता की कहानी-11

विक्रम जब अपनी सुबह की मीटिंग खत्म करके तीन बजे ऑफिस पहुँचा तो सुजाता उसके सामने खड़ी शाम को होने वाली मीटिंग के बारे में बता रही थी| लेकिन विक्रम ने उसकी कही एक बात को भी नहीं सुना था| वह सिर्फ यही सोच रहा था की किस तरह सुजाता से बात की जाये| उसने रातभर उन बातों को मन में दोहराया था जिसे वह सुजाता को कहने वाला था| लेकिन ना जाने क्या बात थी की वह कुछ बोल नहीं पा रहा था| उसे शायद सुजाता को बाहर ले जाना पड़ेगा ताकि वह अकेले में उससे बात कर सके|

“आज शाम तुम क्या कर रही हो|” विक्रम ने सुजाता को बीच में ही टोकते हुए कहा|

“जी कुछ नहीं|” हालाँकि सुजाता को शाम को अभय से मिलना था लेकिन उसने विक्रम को नहीं बताया की उसे किसी से मिलने जाना था|

“शाम को छह बजे एक मीटिंग है क्या तुम मेरे साथ चल पाओगी?” विक्रम ने बिना उसकी तरफ देखे सुजाता से पूछा|

सुजाता को इससे कोई परेशानी नहीं थी| अभय से मिलना आज उसके लिए ज़रूरी नहीं था| वह सिर्फ एक कारण से उसे मिलती थी और वह था उसे दर्द में देखना| वह किसी को समझा नहीं सकती थी की अभय को इस तरह से तड़पते हुए देखकर उसे कितनी खुशी मिलती थी| और आज हालात ऐसे हो गये थे की अभय वक्त से पहले ही आकर उसका इंतज़ार करता था और उसे घर जाने की जल्दी भी नहीं रहती थी| आज वह जितना ज्यादा हो सके उतना वक्त सुजाता के साथ बिताना चाहता था|

“ठीक है|” सुजाता ने कहा| वह मन ही मन खुश हो रही थी यह सोचकर की अभय एक दिन उससे नहीं मिलेगा तो कितना परेशान होगा|

“ठीक है तुम तैयार रहना हम छह बजे यहाँ से निकलेंगे|”

सुजाता जब उसके कमरे से बाहर चली गयी तो विक्रम ने राहत की साँस ली जैसे उसने आधी लड़ाई जीत ली हो| अब बस सुजाता से बात करना बाकि बचा था और आज शाम को हर हालत में वह सुजाता से बात करके रहेगा उसने सोच लिया था|

विक्रम खुश भी था और थोड़ा बैचेन भी| उसने कभी किसी लड़की से इस तरह की बातें नहीं की थी| उसकी पहली और आखिरी गर्लफ्रेंड रुपाली जिसके साथ उसने आठ साल गुजारे थे उसे कॉलेज में मिली थी| वहाँ पर भी रुपाली ही थी जिसने विक्रम से अपने दिल की बात पहले कही थी| उसके चले जाने के बाद कभी भी किसी और लड़की से उसकी इतनी नजदीकी नहीं रही| और यहाँ पर एक बात और थी जो उसे डरा रही थी| सुजाता और लड़कियों की तरह नहीं थी जो हमेशा ही उसकी बाँहों में आने को तैयार रहती थी| वह उनसे एकदम अलग थी| विक्रम के स्टेटस और पर्सनालिटी का आज तक उस पर असर नहीं पड़ा था|

लेकिन यहाँ पर सुजाता और विक्रम दोनों ही गलत थे| विक्रम यह सोचता था की वह आज तक सुजाता पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाया था वही सुजाता को लगता था की विक्रम जैसा कामयाब और सुन्दर आदमी उसकी तरफ क्यों देखेगा जब उसके पीछे हजारों सुन्दर लडकियाँ पड़ी हुई थी| यहाँ तक की ऑफिस की लड़कियाँ भी विक्रम का ध्यान अपनी और आकर्षित करने की हमेशा ही कोशिश करती रहती थी| लेकिन सुजाता को विक्रम के साथ उस तरह का रिश्ता रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी जैसा की वो लडकियाँ चाहती थी| उसके लिये विक्रम चाँद की तरह था जिसे वह देख सकती थी, उसकी तारीफ कर सकती थी लेकिन उसके नज़दीक जाने या उसे पाने की कभी सोच भी नहीं सकती थी| इसलिए उसने हमेशा ही विक्रम से एक दूरी बनाये रखी थी| वे दोनों कई बार अकेले साथ बाहर मीटिंग के लिए जा चुके थे लेकिन न तो विक्रम ने ही उससे कभी ऑफिस के काम के अलावा किसी और बारे में बात की और ना ही कभी सुजाता ने उससे कोई बाहर की बात की| सुजता उससे तभी बात करती जब विक्रम उससे कुछ पूछता था और वह उसका जवाब देती थी|

सुजाता ने जब फोन पर अभय को बताया की आज वह उससे नहीं मिल पायेगी तो उसकी आवाज में मायूसी-सी आ गयी थी| उन्हें मिले अभी दो महीने ही हुए थे और अभय को लगने लगा था जैसे वह सुजाता के बगैर जी नहीं सकता था| वह जितनी जल्दी हो सके सलोनी से छुटकारा पाकर सुजाता से शादी कर लेना चाहता था| वह इस कदर सुजाता की बातों में आ गया था की उसे अब इस बात की परवाह भी नहीं थी की सलोनी उन दोनों की बेटी को हमेशा के लिए उससे दूर ले जाएगी| उसे लग रहा था की वह अब सुजाता के साथ नई शांति भरी जिंदगी गुजार सकेगा| उसे इस बात का अंदाज़ा तक नहीं था की सुजाता उसके साथ क्या करने वाली थी|

अभय से बात करके सुजाता और भी खुश थी| जैसा उसने सोचा था और जैसा वह चाह रही थी बिल्कुल वैसा ही हो रहा था| पिछले तीन साल से वह जिस आग में जल रही थी आज अभय की वैसी ही हालत देखकर उसके मन को शांति मिल रही थी|

विक्रम और सुजाता जब छह बजे ऑफिस से निकले तब भी सुजाता का चेहरा चमक रहा था| लेकिन जितना खुश सुजाता लग रही थी उतनी ही ज्यादा विक्रम की बैचेनी बढ़ती जा रही थी| विक्रम सुजाता को उसी फाइव स्टार होटल में ले गया था जहाँ वे अक्सर जाया करते थे| वे दोनों चुपचाप हमेशा की तरह उसी टेबल पर बैठे थे जिस पर वे अक्सर बैठा करते थे| सुजाता को लगा था की वे किसी का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन विक्रम को पता था की ऐसा कुछ नहीं था| उसका दिल जोरों से धड़क रहा था| उन्हें वहाँ बैठे-बैठे एक घंटा होने वाला था लेकिन विक्रम ने उससे कुछ नहीं कहा| दोनों चुपचाप अपनी कॉफ़ी पी रहे थे| सुजाता को इस तरह इंतज़ार करने की आदत पड़ गयी थी क्योंकि कई बार जिसके साथ मीटिंग होती थी वह आता ही नहीं था| और सुजाता को इस बात की भनक भी नहीं थी की विक्रम उसे बहाने से अपने साथ लेकर आता था ताकि वह कुछ अकेला वक्त उसके साथ गुजार सके| आज भी विक्रम वही कर रहा था|

“सुजाता तुम्हें पता है मैं तुम्हें अपने साथ आज यहाँ क्यों लेकर आया हूँ?”

“मीटिंग के लिए?”

“नहीं| मैं तुमसे कुछ और बात करना चाहता हूँ|”

सुजाता ने अपना कॉफ़ी का कप वापिस टेबल पर रख दिया| उसे लगा शायद विक्रम उससे ऑफिस के काम के बारे में कुछ बात करना चाहता है| आगे जो कुछ भी होने वाला था उसने सपने में भी नहीं सोचा था|

“देखो मुझे पता है.....” विक्रम बोलते-बोलते रुक गया| शायद वह सही शब्द खोजने की कोशिश कर रहा था| “आज कोई मीटिंग नहीं है| मैं तुम्हें अपने साथ लेकर आया हूँ क्योंकि मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी|”

सुजाता ने कोई जवाब नहीं दिया वह चुपचाप विक्रम की बातों को सुन रही थी|

“मैं जो कुछ भी कहने जा रहा हूँ उसका ऑफिस या ऑफिस के काम से कोई लेना देना नहीं है| मुझे पता है तुम सोच रही होगी ऐसी कौन सी बात है जो मैं तुमसे करने वाला हूँ| लेकिन मुझे गलत मत समझना क्योंकि मुझे नहीं पता की मैं किस तरह से तुम से यह बात करूँ|

अब सुजाता भी थोड़ा घबराने लगी थी| ना जाने विक्रम उससे क्या कहने वाला था|

“मैंने एक दिन तुम्हें किसी के साथ एक रेस्टोरेंट में देखा था........किसी लडके साथ...|” विक्रम बोलते-बोलते हिचकिचा रहा था|

विक्रम की बात सुनकर सुजाता के चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था की विक्रम उससे यह सब क्यों पूछ रहा था|

“वैसे मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है की तुम किस से मिलती हो और किस से नहीं और ना मैं कोई हूँ तुम्हें रोकने वाला...मैं बस....मैं बस इतना जानना चाहता था की क्या....क्या तुम किस को पसंद करती हो...मेरा मतलब है क्या तुम किसी के साथ किसी रिलेशनशिप में हो|”

सुजाता को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था जो कुछ भी वह विक्रम के मुहँ से सुन रही थी| ऑफिस का अगर कोई और लड़का होता तो वह यकीन कर भी सकती थी लेकिन विक्रम....विक्रम उसकी पहुँच से बहुत दूर था|

“देखो तुम मुझे गलत मत समझना मैं सिर्फ बात करना चाहता हूँ| अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा है तो तुम मना कर सकती हो मैं तुमसे दुबारा इस बारे में बात नहीं करूँगा|”

सुजाता को मानो करंट लग गया हो| वह अपनी कुर्सी पर पत्थर की तरह बैठी हुई थी| उसे लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रही थी|

“सुजाता तुम सुन रही हो ना....सुजाता|”

सुजाता ने विक्रम की तरफ देखा| वह पहली बार उसके मुहँ से अपना नाम इतनी बार सुन रही थी|

“मैं....|” सुजाता ने धीरे से कहा| उसके मुहँ से आगे कोई शब्द नहीं निकला|

“देखो मैं जनता हूँ की मेरे इस तरह अचानक तुमसे ये सब बातें पुछने पर तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है| लेकिन यह सब जाने बगैर मैं तुमसे वो सब बातें नहीं कर सकता हूँ जो की मैं करना चाहता हूँ| मैं बस यह जानना चाहता हूँ क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई और है|”

“नहीं|” सुजाता ने धीरे से कहा| वह वहाँ से चले जाना चाहती थी| लेकिन फिर भी ना जाने क्यों वहाँ बैठे भी रहना चाहती थी| विक्रम जैसे व्यक्ति से इस तरह की बातों की उम्मीद उसे कभी नहीं थी| वह और सुनना चाहती थी की आखिर वह उससे कहना क्या चाहता था|

“देखो मुझे पता है तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है क्योंकि मुझे भी तुमसे यह सब बातें करते हुए अजीब लग रहा है| आज तक हमारे बीच का रिश्ता सिर्फ एक बॉस और सेक्रेटरी का था लेकिन मुझे पता ही नहीं चला की कब तुम मुझे अच्छी लगने लगी| मैंने कई बार तुमसे इस बारे में बात करनी चाही लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हुई| और मुझे आज भी नहीं पता था की मैं तुमसे कैसे अपने दिल की बात कहूँ|” विक्रम के हर शब्द के साथ सुजाता की हैरानी बढ़ती जा रही थी| प्यार करना तो बहुत दूर की बात थी आज तक किसी ने उससे यह तक नहीं कहा था की वह उसे पसंद करता है| और जहाँ तक अभय की बात थी वह उसके पास इसलिए आया था क्योंकि सलोनी ने उसे ठुकरा दिया था| अगर उसके और सलोनी के बीच में सब कुछ ठीक चल रहा होता तो क्या वह उसे याद करता, शायद कभी नहीं|

Sunday, 11 October 2015

सुजाता की कहानी-10

सुजाता आईने के सामने बैठी थी और अपने बाल संवार रही थी| उसके चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान थी| यह मुस्कान उसकी जीत की थी| अभय से मिलने से पहले उसने सोचा भी नहीं था की वह इस तरह उसके सामने बिखर जायेगा| आज जो कुछ भी हुआ था उसकी उम्मीद से कुछ ज्यादा ही था| अगर उसे दुनिया की सारी धन-दौलत भी मिल जाती तो वह इतनी खुश नहीं होती जितना वह आज थी क्योंकि वह धन-दौलत अभय के सामने कुछ भी नहीं थी| लेकिन वह इसलिए खुश नहीं थी क्योंकि अभय सलोनी को उसके लिए छोड़ रहा था और उसके साथ शादी करने के लिए तैयार था| वह तो बस अभय को चोट पहुँचाना चाहती थी, उतनी ही जितनी उसे पहुँची थी जब अभय ने सलोनी के साथ शादी की थी| अभय से बात करके उसे समझ आ गया था की उन दोनों का रिश्ता टूटने की कगार पर पहुँच चुका था और सिर्फ अभय ही था जो इस रिश्ते को बचाने की कोशिश कर रहा था क्योंकि वह आज भी उससे उतना ही प्यार करता था जितना उस वक्त करता था जब उन दोनों की शादी हुई थी| सुजाता ने सोच लिया था की वह इस रिश्ते को पूरी तरह से बर्बाद कर देगी, इतना की अभय के पास कोई मौका ना बचे सलोनी के पास वापिस जाने का| और जब तक अभय को इस बात का एहसास होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी|

सलोनी आराम से अपने बिस्तर पर लेटी थी| पिछले चार सालों से जिस चैन की उसे तलाश थी आज वह उसे मिल गया था| लेटे-लेटे वह यही सोच रही थी की जब अभय सलोनी को पूरी तरह से छोड़कर उसके पास आयेगा तो वह उसी तरह उसे दुत्कार देगी जैसा अभय ने उसके साथ चार साल पहले किया था| शायद तब उसकी असली जीत होगी|

सलोनी ने कभी सोचा भी नहीं था की किसी से बदला लेने के लिए वह इस हद तक जा सकती थी| ऐसा नहीं था की किसी ने कभी उसे चोट नहीं पहुँचाई थी| लोगों ने कई बार उसके भोलेपन और सरलता का फायदा उठाया था लेकिन वह हमेशा ही उन्हें माफ़ करके आगे बढ़ जाया करती थी| लेकिन अपना दिल टूटने पर वह ऐसा नहीं कर पायी| वह हमेशा ही बदले की आग में जलती रही और यही सोचती रही की किस तरह वह अभय को उस दर्द का एहसास करवा सके जो उसने उसे पहुँचाया था| ऐसा सुजाता सोचती थी की अभय ने उसे सलोनी के लिए ठुकरा दिया था| लेकिन सच उससे एकदम अलग था| उनके बीच में कभी ऐसा रिश्ता ही नहीं था की ऐसा कहा जा सके की अभय ने सलोनी का दिल तोड़ा था| लेकिन सुजाता ने अपने दिल टूटने का कारण हमेशा ही अभय को माना था| वह सलोनी से भी उतनी ही नफरत करती थी जितनी की अभय से|

सुबह जब सुजाता ऑफिस पहुँची तब भी वह चहक रही थी| किसी ने इस बात पर ध्यान दिया हो या नहीं लेकिन विक्रम उसके चेहरे की रौनक देखकर समझ गया था की ज़रूर ही कुछ खास बात थी| उसने उसे इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था| लेकिन उनके बीच में कभी इस तरह का रिश्ता ही नहीं रहा की वह उससे पूछ सके की वह इतनी खुश क्यों थी| उसके मन में कई तरह के ख्याल आ रहे थे और उनमें से एक था, जो की हर उस आदमी के मन में आता है जो किसी से प्यार करता है, कही वह किसी और से प्यार तो नहीं करती| इस ख्याल से ही विक्रम का मन बैचेन हो उठा था| वह अपने ख्यालों में इतना खोया हुआ था की उसने सुजाता की कही गयी एक भी बात को नहीं सुना जो उसके सामने खड़ी आज के कार्यक्रम और मीटिंग के बारे में बता रही थी| विक्रम ने एक नज़र सुजाता के चश्मे लगे सांवले चेहरे पर मारी| सुजाता अपनी डायरी में से पढ़कर उसे आज होने वाली मीटिंग के बारे में बता रही थी| वह एकटक उसे देख रहा था जैसे उसके चेहरे से पढ़ने की कोशिश कर रहा हो यह जानने के लिए की वह इतना खुश क्यों थी| सुजाता ने कुछ देर बाद बोलना बंद किया| विक्रम ने अपने सामने रखी फ़ाइल को खोला और उसे पढ़ने का नाटक करने लगा| सुजाता भी मीटिंग के बारे में बता कर वापिस अपने डेस्क पर आ गयी|

विक्रम सुजाता को बहुत पसंद करता था| या फिर एक तरह से कहा जाये उससे प्यार करने लगा था| लेकिन उसके अन्दर कभी हिम्मत नहीं आई की वह सुजाता से इस बारे में बात कर सके| वैसे यह भी एक अजीब विडम्बना थी की वह शक्स जिससे ज्यादातर लोग डरते थे आज खुद डर रहा था अपने दिल की बात करने में| ऐसा नहीं था की उसने पहले कभी इस बारे में कोशिश नहीं की थी| कई बार वह क्लाइंट मीटिंग के बहाने सुजाता को अपने साथ लंच पर ले जाता था जबकि वहाँ पर किसी को नहीं आना होता था और वे दोनों अकेले लंच कर रहे होते थे| वह उससे अपने दिल की बात करना चाहता था लेकिन जब भी वह सुजाता की तरफ देखता था उसकी हिम्मत जवाब दे जाती थी| उसे पता था की उसके स्टेटस की वजह से सेकड़ों लडकियाँ उसके पीछे थी| शादी करना तो बहुत दूर की बात थी वे तो उसकी गर्लफ्रेंड बनकर ही खुश हो जाती| लेकिन जैसा असर वह दूसरों पर डालता था वैसा प्रभाव वह आज तक सुजाता पर नहीं डाल पाया था| सुजाता ने उसे कभी अपने बॉस से ज्यादा नहीं माना| वह तो कभी उसकी तरफ देखती भी नहीं थी|

विक्रम को लगा था की उसे धीरे-धीरे कोशिश करनी चाहिये लेकिन आज सुजाता की ख़ुशी देखकर उसे डर लगने लगा था| अपने ऑफिस के कमरे में बैठा वह यही सोच रहा था की कैसे वह इस बारे में पता लगाये| खुद वह सुजाता से सीधे-सीधे पूछ नहीं सकता था और ना ही ऑफिस में किसी से इस बारे में बात कर सकता था| लेकिन उसे कोई ना कोई तरीका निकालना ही होगा| सारा दिन वह इसी बारे में सोचता रहा| यहाँ तक की ऑफिस में होने वाली मीटिंग पर भी उसका ध्यान नहीं था| फिर उसने वह किया जो उसने भी सुजाता की तरह नहीं सोचा था वह कभी करेगा|

छह बजते ही सुजाता ऑफिस से निकल गयी| वह आज भी अभय से मिलने वाली थी| विक्रम भी चुपचाप उसके पीछे चल दिया| सुजाता ऑटो में थी और विक्रम अपनी कार में| सुजाता जब रेस्टोरेंट पहुँची तो अभय पहले से ही उसका इतंजार कर रहा था| विक्रम भी अपनी कार से उतरकर यह देखने के लिए चल दिया की सुजाता किससे मिलने जा रही थी| बार-बार उसका मन यह कह रहा था की यह उसकी कोई सहेली हो| लेकिन जिसका उसे डर था वही हुआ| अभय को सुजाता के साथ देखकर और उन दोनों के चेहरे की मुस्कान को देखकर विक्रम समझ गया था की उसका डर सही था| वह वापिस अपनी कार में आया और अपने घर की तरफ चल दिया|

विक्रम यही सोच रहा था की शायद उसने देर कर दी, शायद उसे सुजाता से पहले ही बात कर लेनी चाहिए थी| लेकिन अब क्या? उसे अब क्या करना चाहिए? क्या सुजाता से इस बारे बताना चाहिए? लेकिन अब देर हो चुकी थी| लेकिन शायद इतनी भी नहीं| क्या पता जैसा वह सोच रहा था वैसा ना हो? क्या पता वे दोनों सिर्फ दोस्त हो? उसे एक बार तो कोशिश करके देखना चाहिए| और बिना सुजाता से बात किये वह कैसे जान सकता है की वह किसी से और प्यार करती है| उसने सोच लिया था की वह कल ही सुजाता से बात करेगा चाहे कुछ भी हो जाये| वह ज़रूर उसे अपने दिल की बात बतायेगा फिर बाकि उसकी मर्जी चाहे वह हाँ कहे या ना| रातभर विक्रम अपने बिस्तर पर करवटें बदलता रहा| वह यही सोच रहा था की किस तरह उसे सुजाता से बात करनी चाहिए| उसे इस बात की फ़िक्र थी की कहीं वह बुरा ना मान जाये, लेकिन उससे भी ज्यादा उसे इस बात की फ़िक्र थी की वह उससे बात कर भी पायेगा या नहीं| मन ही मन उसने सैंकड़ों बार उन बातों को दोहराया था जिसे वह कल सुजाता को कहने वाला था| इतनी बैचेनी भरी रात उसने कभी नहीं बितायी थी| शायद तब भी नहीं जब छोटी उम्र में ही उसके हाथ में इतनी बड़ी कंपनी की बागडोर आ गयी थी या जब उसकी गर्लफ्रेंड उसे छोड़कर चली गयी थी|

Monday, 28 September 2015

सुजाता की कहानी-9


सुजाता तैयार थी| आज उसकी आँखों पर उसका चश्मा नहीं था बल्कि लेंस थे जिन्हें उसने कल ही ख़रीदा था| उसने अपना सबसे बढियावाला सूट पहना हुआ था और अपने लंबे बालों को खुला छोड़ दिया था, आँखों में काज़ल, और होंटों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक| अपने आप को वह पहले कभी इतनी सुन्दर नहीं लगी जितना वह आज लग रही थी| आज कुछ अलग ही बात थी| उसका चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक थी| इतनी खुश शायद वह पहले कभी नहीं हुई होगी, तब भी नहीं जब उसे नौकरी मिली थी|

सुजाता जब अभय की बताई हुई जगह पर पहुँची तो अभय उसका पहले से ही इंतज़ार कर रहा था| उसे देखते ही वह उठकर खड़ा हो गया| पिछले तीन सालों में सुजाता एकदम बदल गयी थी| वह वैसी ही थी दुबली-पतली लेकिन उसके कपड़े पहनने का तरीका एकदम बदल गया था| मोटे चश्मे की जगह लेंस ने ले ली थी|

अभय भी पहले से काफ़ी बदल गया था| उसका पतला शरीर अब भर गया था, बालों का स्टाइल भी बदल गया था| अब वह पहले से कही ज़्यादा आकर्षक लग रहा था लेकिन उसके चेहरे की मुस्कराहट कहीं गायब थी| सुजाता उसकी आँखों के नीचे काले गड्डे भी देख सकती थी|

“क्या हुआ|”

“नहीं कुछ नहीं”, अभय ने सुजाता के चेहरे से अपनी नज़रें हटाते हुए कहा|

और दोनों अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ गये|

कुछ देर के लिये दोनों चुपचाप ही बैठे रहें| सुजाता ख़ामोशी से अभय के बोलने का इंतज़ार कर रही थी| वही था जो हमेशा बातचीत की शुरुआत करता था|

“क्या हुआ”, अभय को हल्का-हल्का मुस्कुराता देख सुजाता ने उससे पूछा, “कुछ हुआ है क्या?”

“नहीं, कुछ नहीं|”

“तो फिर तुम मुस्कुरा क्यों रहे हो?”

“तुम्हें देखकर|”

“मुझे देखकर? क्या मेरे चेहरे पर कुछ लगा है|”

“नहीं, कुछ नहीं| मैं बस यही सोच रहा था की इतने सालों में तुम कितना बदल गयी हो|”

सुजाता ने महसूस किया की अभय उससे बात करते हुए थोड़ा हिचकिचा रहा था| उसकी मुस्कुराहट उसके चेहरे की परेशानी छुपाने की कोशिश कर रही थी| वह शायद कुछ कहना चाहता था लेकिन कह नहीं पा रहा था|

“तुम कुछ परेशान लग रहे हो|”

“नहीं, नहीं तो|”

“क्या बात है? तुम्हारी आँखे देखकर लगता है तुम सही से सो नहीं रहे हो|”

अभय ने सुजाता को कुछ देर के लिए देखा फिर उसने अपना सिर झुका लिया|

“क्या बात है बताओ मुझे|”

“बस कुछ फॅमिली प्रॉब्लम है|”

“कैसी प्रॉब्लम?”

“ज्यादा कुछ नहीं बस वही मियां-बीवी के झगड़े|”

सुजाता को पता था की अभय बात को टालने की कोशिश कर रहा था| लेकिन उसे समझ आ गया था की उसके और सलोनी के बीच सबकुछ ठीक नहीं है| वह सब कुछ जानना चाहती थी लेकिन उसने अभय पर ज्यादा ज़ोर नहीं डाला|

“तुम अगर नहीं बताना चाहते तो ठीक है|”

अभय ने सुजाता की तरफ देखा| वह किसी दुविधा में लग रहा था| वह बोलना तो चाहता था लेकिन बोल नहीं पा रहा था| लेकिन सुजाता को पता था की अभय ने उसे बुलाया ही इस बारे में बात करने के लिए है|

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है| मैं बस अपनी परेशानियों से तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था|”

“अगर तुम सच में मुझे अपना दोस्त मानते हो तो ऐसा क्यों सोचते हो की मैं तुम्हारे दुःख में तुम्हारा साथ नहीं दूँगी|”

“ना जाने सलोनी को क्या हो गया है| हम जब भी साथ होते हैं सिवाये लड़ने के और कुछ नहीं करते|”

“लेकिन तुम तो एक-दूसरे से प्यार करते थे?”

“हाँ| लेकिन अब लगता है प्यार सिर्फ मैं उससे करता था| और उसने मुझ से शादी क्यों की मुझे नहीं पता| शादी के एक साल बाद ही उसने मुझ से डिवोर्स मांगना शुरू कर दिया था| मैंने उसे बहुत समझाया लेकिन उसे पता नहीं क्या हो गया था| और जब मैंने उसे मना किया तो वह घर छोड़कर चली गयी| लेकिन जब उसे पता चला की वह माँ बनने वाली है तो वह वापिस लौट आई| मुझे भी लगा की वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा लेकिन हमारी बेटी के पैदा होने के बाद भी हमारे बीच की दुरी कम नहीं हुई| उसने डिवोर्स मांगना तो बंद कर दिया लेकिन हमारे बीच सब कुछ वैसा नहीं रहा जैसा पहले था|”

अभय की बात सुनकर सुजाता की आँखों में चमक आने लगी थी| अभय को शायद पता भी नहीं था की सुजाता का मन ख़ुशी से फुला नहीं समां रहा था|

“सुजता तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो| मुझे पता था की एक तुम ही मेरी परेशानी को समझ सकती हो| मैं सलोनी से बहुत प्यार करता हूँ| लेकिन अब कुछ नहीं बचा| जिंदगी मानो ख़त्म हो गयी है जैसे कुछ बचा ही नहीं करने को| जब सलोनी मुझे छोड़कर चली गयी थी तो मुझे समझ आया की तुम किस प्यार के बारे में बोल रही थी और तुम्हारे ऊपर क्या बीती होगी|”

सुजाता ने उसे थोड़ा हौसला दिया, “जो होना था हो चुका| तुम्हें अब यह सब भूलकर आगे बढ़ जाना चाहिए|”

“लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है| मैंने सलोनी को मनाने की हर तरह से कोशिश की लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है|”

“तो तुम उसे डिवोर्स क्यों नहीं दे देते जैसा की वह चाहती है|”

सुजाता की बात सुनकर अभय कुछ देर तक कुछ नहीं बोला| उसे पता था की सलोनी के बिना जिंदगी के बारे में सोचना कितना मुश्किल है| और अगर सलोनी जाएगी तो वह उनकी बेटी को भी अपने साथ ले जायेगी|

“देखी तुम्हारी जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है| मैं मानती हूँ की तुम सलोनी से प्यार करते हो लेकिन ऐसे इन्सान के साथ रहना जो तुम्हारे साथ ना रहना चाहता हो ठीक नहीं है| क्या पता तुम्हें कोई और प्यार करने वाला मिल जाये|”

अभय ने सुजाता की आँखों में देखा| उसे पता था की सुजाता उसे प्यार करती थी| लेकिन क्या वह अब भी उससे प्यार करती है? क्या वो सलोनी का साथ छोड़कर किसी और के साथ अपनी नई जिंदगी बसा सकता है? सलोनी शायद अब उससे प्यार नहीं करती थी लेकिन उसे एक बात की तस्सली थी की वे दोनों साथ थे| सलोनी का साथ ही अभय के लिए काफी था|

“लेकिन मैं......|”

“देखो मुझे पता है की तुम्हारे लिए यह सब आसान नहीं होगा लेकिन कभी-कभी हमें ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनके बारे में हमने कभी सोचा भी ना हो|”

“क्या मैं तुमसे एक बात पूछूँ अगर तुम बुरा ना मानो तो?”

“हाँ|”

“क्या तुम आज भी मुझसे प्यार करती हो?”

सुजाता को इसी सवाल का इंतज़ार था और उसे पता था की उसे क्या करना था|

“हाँ| तुम पहले इन्सान थे जिसे मैंने प्यार किया और शायद में आज तक तुमसे प्यार करती हूँ| तुम्हारे अलावा मैंने आज तक किसी और के बारे में सोचा ही नहीं|”

“अगर मैं सलोनी को डिवोर्स दे दूँ तो क्या तुम मुझसे.......?”

“हाँ|” सुजाता ने अभय का सवाल खत्म होने से पहले ही उसे जवाब दे दिया|

अभय कुछ देर तक आश्चर्यचकित-सा उसे देखता रहा| उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं था की सुजाता उससे इतना प्यार करती थी की तुरंत ही उससे शादी करने के लिए तैयार हो जाएगी|

“मुझे नहीं पता था की तुम मुझसे इतना प्यार करती हो|”

“मुझे भी आज ही इस बात का एहसास हुआ|”

“मुझे आज लग रहा है की मुझे सलोनी की बजाय तुमसे शादी करनी चाहिए थी| मैंने गलती की| मैं सलोनी की सुन्दरता में इतना खो गया था की मैं तुम्हारे प्यार को समझ ही नहीं सका|”

“लेकिन अब तुम्हारे पास अपनी गलती को सुधारने कम मौका है|” सुजाता ने अभय के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा|

अभय को अपना दर्द थोड़ा कम होता महसूस हुआ| जिस प्यार को वह सलोनी से पाना चाह रहा था क्या पता वह उसे सुजाता से मिल जाये| सलोनी से लड़-लड़कर वह इतना तंग आ चुका था अब वह अपनी जिंदगी आराम से जीना चाहता था| शायद सुजाता उसे वह सुकून दे सके| लेकिन वह अपनी बेटी के बारे में भी सोच रहा था जिसे वह बहुत प्यार करता था| उसे पता था की अगर उसने सलोनी को डिवोर्स दे दिया तो अपनी बेटी से मिलना उसके लिए कितना मुश्किल हो जायेगा| सलोनी उनकी बेटी को लेकर अपने पिता के पास अमेरिका चले जाना चाहती थी|

लेकिन सुजाता ने उसे एक उम्मीद बंधाई थी| अपनी परेशानियों से निकालने का रस्ता अब उसे दिखने लगा था|

Tuesday, 22 September 2015

सुजाता की कहानी-8

सुजाता विक्रम के साथ काम कर तो रही थी और कई बार उसे कई बड़े-बड़े लोगों से मिलने का मौका भी मिलता था जिन्हें वह सिर्फ तस्वीरों में ही देखती थी लेकिन इन सब में उसका मन नहीं लग रहा था| उसे पसंद था काम करना लेकिन विक्रम के साथ रहने पर उसे काम करने से ज्यादा घूमना पड़ता था, लोगों से मिलना पड़ता था| वह यह सब कर तो लेती थी लेकिन उसे इसमे ज्यादा मज़ा नहीं आता था| वह अपने डिपार्टमेंट की टेबल पर बैठकर आराम से काम करना पसंद करती थी| इतनी भागदौड़ उसे पसंद नहीं थी| उसे वापिस अपने पुराने काम पर जाना था| लेकिन उसे समझ नहीं आता था की वह विक्रम से यह सब कुछ कैसे कहे| नौकरी जाने का उसे डर नहीं था लेकिन वह विक्रम से डांट नहीं खाना चाहती थी|

सुजाता ने एक फ़ाइल उठाई जिसे विक्रम कुछ देर पहले मांग रहा था और उसके कमरे में गई| विक्रम हमेशा की तरह ही किसी से फोन पर बात कर रहा था| सुजाता को समझ नहीं आ रहा था की वह कैसे विक्रम से बात करे| वह इससे पहले भी कई बार कोशिश करके देख चुकी थी लेकिन हर बार वह बिना कुछ कहे ही वापिस लौट आती थी| उसके मुहँ से शब्द ही नहीं निकलते थे|

जब सुजाता अपने ख्यालों में ही खोयी हुई थी तो उसने देखा की विक्रम उसकी तरफ देख रहा था| उसने तुरंत ही फ़ाइल को उसकी तरफ बढ़ा दिया| विक्रम ने उसे दो-तीन बातें और कही जिसे उसने अपनी डायरी में नोट किया और बिना अपनी बात किये वापिस अपनी टेबल पर आकर बैठ गयी| उसने सामने बैठी टाइपिस्ट पर एक निगाह मारी जो हल्के-हल्के मुस्कुरा रही थी| सुजाता को लगा जैसे वह उसके ऊपर ही हँस रही थी| फिर कुछ पलों बाद सुजाता ने उसे अपने मन से निकाला और विक्रम के बताये हुए कामों में लग गयी|

आज सुजाता को विक्रम के साथ काम करते हुए आठ महीने हो गये थे और उसकी सैलरी भी दुगुनी हो गयी थी| विक्रम उसके काम से खुश भी लग रहा था क्योंकि उससे पहले कोई भी विक्रम के साथ इतने वक्त तक नहीं टिक पाया था| लेकिन फिर भी यहाँ सुजाता का मन नहीं लग रहा था| उसे इस बिज़नेस और लोगों को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी| उसके सपने बहुत ही छोटे थे- एक अच्छी-सी नौकरी और एक प्यार करने वाला पति| उसको इतनी भागदौड़ वाली जिंदगी पसंद नहीं थी|

‘राकेश को मैं एकाउंट्स का हेड बनाने वाला हूँ तो मैं सोच रहा था की तुम उसकी जगह ठीक रहोगी|’

सुजात की जगह कोई और होता तो विक्रम की बात सुनकर वह ख़ुशी के मारे उछल पड़ता| इतने कम वक्त में इतनी तरक्की और विक्रम जैसे मंझे हुए बिज़नेसमेन के साथ काम करने का मौका सिर्फ किस्मत वालों को ही मिलता है| लेकिन सुजाता अभी भी खोई हुई थी| उसका मन पता नहीं कहाँ उलझा हुआ था| विक्रम ने उसकी तरफ देखा|

‘तुम सोचकर मुझे बता देना|’

‘जी|’

सुजाता वापिस अपनी जगह पर आ गयी| वह पिछले दो दिनों से उदास थी| और उसकी उदासी का कारण वही इन्सान था जिसने वह जीतना प्यार करती थी शायद उतनी ही नफ़रत भी| या फिर अब सिर्फ नफरत ही थी जो बाकि रह गयी थी|

उस दिन वह अपने ऑफिस की एक दोस्त के साथ पास के एक माल में कुछ खरीददारी करने गयी थी जब उसकी नज़र उस चेहरे पर पड़ी जिसे उसने सोचा था वह भूल चुकी थी लेकिन असल में वह भूली नहीं थी| अभय और सलोनी वही एक दुकान में कुछ खरीद रहे थे| अभय की गोद में एक छोटी बच्ची भी थी जो करीब दो साल को होगी| वे लोग खुश लग रहे थे| हालाँकि उस बात को काफी वक्त गुजर चुका था लेकिन सुजाता के जख्म फिर से उभर आये थे| या फिर वो जख्म कभी भरे ही नहीं थे| औ शायद वह खुद भी नहीं चाहती थी की वो जख्म भरे|

रात को सुजाता को अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे काफी देर हो चुकी थी लेकिन नींद का कहीं नामोनिशान नहीं था| उसकी आँखे भरी हुई थी| उसकी आँखों के सामने अभय और सलोनी के मुस्कुराते चेहरे घूम रहे थे| ‘वे इतने खुश कैसे हो सकते हैं|’ वह यही सोच रही थी| उनकी ख़ुशी ही उसके दर्द का कारण थी| वह उन्हें दुःख में देखना चाहती, उसी दुःख में जिसे इतने वक्त तक उसने सहा था|

अगले दिन ऑफिस पहुँचने पर काम में भी उसका दिल नहीं लग रहा था| जब से उसने अभय और सलोनी को देखा था तब से ही उसका दिल जल रहा था| कहते हैं की वक्त के साथ हर जख्म भर जाता है लेकिन सुजाता ने अपने जख्म को भरने देने की बजाय उसे नासूर बना दिया था| उसे खुद भी पता ही नहीं चला की कब वह अभय से इतनी नफरत करने लगी थी की उसका प्यार अब उसकी नफरत के सामने छोटा पढ़ गया था|

“सब कुछ ठीक है ना?” विक्रम ने सुजाता से पूछा| उसने शायद उसके चेहरे की परेशानी को पढ़ लिया था|

“नहीं कुछ नहीं| तबियत कुछ ठीक नहीं थी|”

“तुम चाहो तो एक-दो दिन की छुट्टी ले सकती हो| वैसे भी तुम कभी छुट्टी नहीं लेती हो|”

“नहीं मुझे बस थोड़ा सिर में दर्द है और कुछ नहीं|”

“ठीक तो तुम आज आराम करो मैं राकेश को अपने साथ ले जाऊँगा|”

विक्रम की सुजाता के साथ ज्यादातर बातचीत काम को लेकर ही होती थी| और ऑफिस में किसी को क्या समस्या है उसे इससे ज्यादा मतलब नहीं होता था| लेकिन सुजाता की प्रति उसका बर्ताव दूसरों से अच्छा ही रहता था| हालाँकि उसने सुजाता से भी कभी उसके परिवार या निजी मामलों के बारे में कभी बात नहीं की थी| और आज यह पहली बार था जब उसने सुजाता से उसकी तबियत के बारे में पूछा था और बिना मांगे ही उसे छुट्टी दे दी थी|

लेकिन सुजाता अभय में इतना खोई हुई थी की उसने अपने प्रति विक्रम के बदले इस नजरिये पर कभी ध्यान ही नहीं दिया| उसे नज़र ही नहीं आ रहा था की विक्रम बिना किसी कारण के ही उसकी कुछ ज्यादा ही परवाह करने लगा था| विक्रम से बात करते हुए भी या तो वह अपनी डायरी में देख रही होती या फिर कहीं और लेकिन विक्रम की नजरें हमेशा उसके चेहरे पर होती थी| इसलिए उसने शायद उसके चेहरे के बदलते भावों को पढ़ लिया था|

एक दिन सुजाता के फोन की घंटी बजी| नंबर एकदम अनजान था| जबसे उसने विक्रम के साथ काम करना शुरू किया था यह उसके लिए नई बात नहीं थी| रोज ही उसकी बात कई अनजान लोगों से होती थी| उसने फोन उठाया और दूसरी तरफ से आवाज़ सुनकर उसे यकीन ही नहीं हुआ| वो आवाज़ अभय की थी| उसने सुजाता से बस उसका हालचाल पूछा और अपने बारे में बताया| लेकिन उसकी आवाज़ में पहले के जैसी वैसी बेफिक्री नहीं थी| सुजाता उसे सुन तो रही थी लेकिन उसके मन में सवाल भी था की आखिर तीन साल बाद अभय को अचानक उसकी याद कैसे आयी?

“तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा अगर मैं तुम्हें फोन करूँ तो?” अभय की आवाज में थोड़ी हिचकिचाहट थी| शायद उसे भी मालूम था की सुजाता शायद इतने वक्त बाद उससे बात करना पसंद न करे|

सुजाता भी सोच रही थी| वह अभय को अपनी जिंदगी से निकाल चुकी थी| वह उसके लिए अब उतना मायने नहीं रखता था जीतना वह तीन साल पहले था| लेकिन एक बात थी जो उसे समझ नहीं आ रही थी की अभय को इस तरह तीन साल बाद उसकी याद कैसी आयी|

“हाँ, ठीक है|” सुजाता ने कुछ सोच कर कहा|

“मुझे पता था तुम मुझे मना नहीं करोगी| आखिर तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी|”

‘दोस्त|’ सुजाता को इस शब्द से अब चिढ़-सी हो गयी थी| उसे अभय का दोस्त बनने में अब कोई दिलचस्पी नहीं थी| अगर उसे आज मौका मिलता तो वह अभय को बर्बाद कर देती|

बात करने का जो सिलसिला हफ्ते में एक बार से शुरू हुआ था वह अब रोज होने लगा| अभय सुजाता को रोज़ फोन करता और काफ़ी देर तक उससे बात करता| सुजाता भी उसकी बातें सुनती| वह इसे एक मौके की तरह ले रही थी एक ऐसा मौका जिससे वह अभय से बदला ले सके| और एक दिन अभय ने सुजाता को मिलने के लिये बुलाया| सुजाता को भी इसी दिन का इंतजार था| उसने इस दिन के लिए काफी इंतजार किया था| अभय से बात करते हुए वह जान चुकी थी की अभय किसी परेशानी में था लेकिन वह क्या था उसने सुजाता को इसके बारे में नहीं बताया था|

Wednesday, 9 September 2015

सुजाता की कहानी-7

सुजाता इस नई-नई मिली ख्याति का अभी मज़ा ही ले रही थी की विना दो दिन बाद वही डायरी लिए उसके सामने खड़ी थी|

‘चलो तुम्हें विक्रम सर् ने बुलाया है|’

सुजाता चुपचाप चल दी| वह यही सोच रही थी कहीं उस दिन के लिए डांट मारने के लिए तो उसे नहीं बुलाया है?

जब वे दोनों विक्रम के ऑफिस में पहुँचे तो वह फोन पर किसी से बात कर रहा था| उसने बात करते-करते एक नज़र सुजाता पर मारी और फिर बात में मशगुल हो गया| विना ने डायरी को टेबल पर रखा और सुजाता को वहीँ छोड़कर चली गयी| सुजाता चुपचाप वहाँ पर खड़ी विक्रम के बात ख़त्म कर लेने का इंतज़ार कर रह रही थी|

‘तुम अभी किस चीज़ पर काम कर रही हो|’ फोन रखकर उसने सुजाता से पूछा|

‘जी, अभी ज्यादा काम नहीं है बस सेल्स के बारे में थोड़ा डाटा इकट्ठा करना है|’

‘उसे रहने दो| वो काम किसी और को दे दिया गया है| तुम अभी कुछ दिनों तक यहीं काम करोगी....जब तक कोई नई सेक्रेटरी नहीं आ जाती|’

सुजाता ने आगे कुछ नहीं कहा| उसने चुपचाप डायरी उठाई और वापिस जाने लगी| वह मना कर देना चाहती थी लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई| उसे यहाँ इस ऑफिस में काम करते हुए अभी एक साल ही हुआ था| उसने इतने सारे इंटरव्यू देकर यहाँ नौकरी पाई थी| अगर विक्रम ने नाराज होकर उसे नौकरी से निकाल दिया तो पता नहीं उसे कब इतने बड़े ऑफिस में इतनी अच्छी नौकरी मिल पाये| और विक्रम को उसे सिर्फ कुछ वक्त के लिए झेलना है यही सोचकर उसने किसी से कुछ नहीं कहा|

‘और हाँ तुम अभी बाहर ही बैठोगी जो सेक्रेटरी के लिए जगह है| तुम्हें वापिस जाने की जरुरत नहीं|’

‘जी|’

और सुजाता अपना सामान वही ले आयी| वैसे उसके पास ज्यादा कुछ था नहीं| ना तो वह दूसरों की तरह अपने डेस्क को फोटो या दूसरी चीजों से सजाती थी और ना ही फालतू की चीज़े इकठ्ठा करती थी| उसका डेस्क हमेशा ही खाली रहता था उसके ऑफिस से चले जाने के बाद जैसे वहाँ कोई बैठता ही न हो|

अब सुजाता रोज विक्रम के आने का इंतज़ार करती ताकि वह अपना काम शुरू कर सके| वहाँ बैठी टाइपिस्ट से उसकी ज्यादा कुछ पटती नहीं थी| उनके बीच ना के बराबर ही बात होती थी| वह भी सुजाता को कुछ खास पसंद नहीं करती थी| शायद वह खुद सेक्रेटरी की वह नौकरी चाहती थी|

विक्रम के आ जाने के बाद भी सुजाता ज्यादातर खाली ही बैठी रहती थी| विक्रम या तो काम के सिलसिले में किसी से फोन पर बात करता रहता या फिर फाईलों में खोया रहता| सुजाता ने कभी भी उसे खाली बैठे नहीं देखा था| और कई बार विक्रम मीटिंग के चक्कर में पूरे दिन ही बाहर रहता| उस दौरान सुजाता के पास करने को कोई काम नहीं होता था और उसे समझ नहीं आता था की वह अपना दिन कैसे गुजारे बिना कोई काम किये| उसने कई बार विना से भी पूछ लिया था की कब वे विक्रम के लिए नई सेक्रेटरी का इंतज़ाम करेंगे ताकि वह यहाँ से छुट सके|

विक्रम ने सुजाता को कमरे में बुलाया| सुजाता दो ही कारणों से विक्रम के कमरे में जाती थी या तो उसे कोई फ़ाइल चाहिए होती थी या फिर किसी मीटिंग के बारे में पूछना होता था| लेकिन आज उन्होंने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा| वैसे विक्रम हमेशा अपने साथ अपने नीचे काम करने वाले राकेश को ही बाहर मीटिंग के लिए ले जाया करता था लेकिन विक्रम ने उसे कहीं और भेज दिया था और शायद उसे सुजाता ही ठीक लगी अपने साथ ले जाने के लिए|

‘तुम्हें मेहता एंड संस के बारे में क्या पता है|’

‘वहीँ जिनके साथ हमारा मटेरियल सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट है और जिनके साथ अभी एक मुद्दे को लेकर मध्यस्ता चल रही है|’

‘हाँ वही| आज उनके साथ मीटिंग है और राजेश नहीं है इसलिए तुम मेरे साथ चल रही हो|’ विक्रम ने आगे और कुछ नहीं कहा| उसने अपना कोट लिया और अपने कमरे से बाहर निकल आया|

सुजात ने भी अपना बैग उठाया और विक्रम के साथ चल दी|

सुजाता साँस रोके विक्रम के साथ आगे की सीट पर बैठी थी| वह खुद ही गाड़ी चला रहा था और फोन पर कई लोगों से बात भी कर रहा था| एक बार तो वह फोन पर किसी को डांट भी रहा था| कुछ देर बाद वे एक बड़े फाइव स्टार होटल में पहुँचे| वे एक प्राइवेट मीटिंग रूम पहुँचे जहाँ पहले से ही दो आदमी उनका इंतज़ार कर रहे थे| विक्रम ने उन दोनों से हाथ मिलाया और उनके सामने बैठ गया| सुजाता भी उसके एक तरफ बैठ गयी| शायद ही उन दोनों आदमियों ने ध्यान दिया की सुजाता विक्रम के साथ थी|

सुजाता चुपचाप उनके बीच होने वाली बातें या फिर कहा जाय बहस को सुन रही थी| उसको इस सब की आदत नहीं थी| उसने अपनी जिंदगी में शायद ही कभी किसी से बहस की थी| और यहाँ पर तीन आदमी बैठे हुए एक ज़ोरदार बहस में उलझे हुए थे| तीनों ही अपनी जिद पर अड़े हुए थे| कोई नतीजा न निकलता देख विक्रम ने आखिरकार वहाँ से जाने का फैसला किया| और वे दोनों होटल से निकल कर वापिस ऑफिस की तरफ चल दिए| इस बार विक्रम चुप था| सुजाता ने ध्यान दिया की वह तभी बोलता था जब वह किसी से बात करता था यार फिर किसी को डांट रहा होता था| उसके अलावा वह ज्यादातर खामोश ही रहता था|

ऑफिस में सुजाता के दिन वैसे ही बीत रहे थे बिना किसी काम के| इस दौरान विक्रम उसे दो-तीन बार अपने साथ बाहर लेकर गया जब भी राकेश वहाँ पर नहीं होता था| सुजाता वहाँ ज्यादातर चुप ही रहती थी| अगर विक्रम उसे मीटिंग की डिटेल्स नोट करने को कहता तो वह कर लेती लेकिन वह कभी भी बातचीत या बहस के बीच में नहीं बोलती थी और ना ही विक्रम ने उसे ऐसा करने को कभी कहा|

उस दिन भी वे लोग एक मीटिंग के लिए ही गये हुए थे| क्लाइंट के आने का वक्त एक बजे का था ताकि उसके साथ लंच किया जा सके लेकिन ढाई बज रहे थे और उनका कहीं पर अता-पता ही नहीं था| तभी विक्रम को फोन आया की उनकी फ्लाइट लेट है और वे अभी नहीं आ पायेंगे| सुजाता ने राहत की साँस ली अब उसे इन लोगों के साथ बैठकर खाना नहीं खाना पड़ेगा| अनजान लोगों के साथ बैठकर खाना खाना उसे अजीब लगता था| दूसरों से घुलमिल ना पाना ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी|

सुजाता ने अपना बैग उठाया और जाने के लिए तैयार हो गयी|

‘तुम कहीं जा रही हो|’ विक्रम ने उससे पूछा जो अभी भी अपनी कुर्सी पर बैठ हुआ था|

‘ऑफिस|’

‘पहले लंच कर ले|’

‘लेकिन मेरा लंच तो ऑफिस में है|

‘ठीक है तो फिर मैं लंच कर लेता हूँ| ऑफिस पहुँच कर तुम अपना लंच कर लेना|’

सुजाता को विक्रम की बात सुनकर बड़ी हैरानी हुई| उसे भूख लग आयी थी और क्या वह विक्रम के लंच करने तक ऐसे ही भूखी बैठी रहेगी| विक्रम ने वेटर को बुलाया और लंच का आर्डर दे दिया| सुजाता बेचैन-सी अपनी कुर्सी पर बैठी थी| इस दौरान विक्रम किसी से फोन पर बात करता रहा| कुछ देर बाद एक वेटर हाथ में एक ट्रे लेकर आया| सूप का एक बाउल उसने विक्रम के सामने रखा और दूसरा सुजाता के| सुजाता हैरानी से फोन पर बात कर रहे विक्रम की तरफ देख रही थी| उसने उसकी उस बात पर यकीन कर लिया था जब उसने उससे कहा की जब तक वह लंच कर ले तब तक उसे इंतज़ार करना पड़ेगा| क्या विक्रम उसके साथ मज़ाक कर रहा था? लेकिन इतनी गंभीरता के साथ कौन मज़ाक कर सकता है? सुजाता को लगता था की उसके जैसा बोर पूरी दुनिया में नहीं हो सकता लेकिन जब से वह विक्रम के साथ काम करने लगी थी विक्रम उसे अपने से भी ज्यादा नीरस और बोर लगता था| कम से कम लोग उसके साथ बात करने में डरते तो नहीं थे|

‘क्या हुआ तुम्हें पसंद नहीं?’ विक्रम ने सूप की तरफ अजीब तरीके से देख रही सुजाता से पूछा|

‘नहीं ऐसी बात नहीं|’ सुजाता ने चम्मच उठाई और सूप पीने लगी| उसे तेज़ भूख लगी थी फिर भी वह आराम से खा रही थी|

वे लोग पूरे एक घंटे तक आराम से लंच करते रहे| विक्रम कभी फोन पर बात कर रहा होता और कभी चुपचाप खाना खा रहा होता| सुजाता जब ऑफिस पहुँची तो उसका लंच का डिब्बा उसका इंतज़ार कर रहा था| लेकिन इतना सब कुछ खा लेने के बाद उसकी हिम्मत नहीं थी की वह और खा सके| ऐसा पहली बार हुआ था की वह लंच को बिना खाये उसे वापिस ले जा रही थी|

Friday, 4 September 2015

सुजाता की कहानी-6

ठीक दस बजते ही विक्रम ऑफिस पहुँच चुका था| सुजाता भी उसके पीछे-पीछे चली गयी| यह पहला मौका होगा जब वह उसे सामने से देख रही होगी| अब तक उसने विक्रम की बस झलकियाँ ही देखी थी, लिफ्ट में जाते हुए या फिर ऑफिस में इधर-उधर घूमते हुए|

सुजाता जब वहाँ पहुँची तो बाहर वाले कमरे में एक टाइपिस्ट बैठी कुछ कागज़ात टाइप करने में लगी हुई थी| विक्रम के कमरे का दो पाटों वाला लकड़ी का दरवाज़ा खुला हुआ था| उसे आजकल के शीशे के दरवाज़े बिल्कुल पसंद नहीं थे| सुजाता ने खुले हुए दरवाज़े पर खटखटाया|

‘अन्दर आओ|’ विक्रम ने बिना सिर उठाये कहा|

सुजाता बड़ी-सी टेबल के पीछे बैठे विक्रम के सामने खड़ी थी| वह एक फ़ाइल में मशगुल था|

‘क्या बात है?’ विक्रम ने अपने सामने रखी फाइल के पन्ने पलटते हुए नीरसता से उससे पूछा|

‘सर् वो आज का शेड्यूल बताना था|’

विक्रम ने सुजाता की तरफ देखा| वह थोड़ा डरी हुई थी|

‘तुम कौन हो?’

‘जी, वो आपकी सेक्रेटरी...|’

इससे पहले की सुजाता आगे बोल पाती विक्रम ने उसे एक फाइल लाने के लिए भेज दिया| और इस तरह सुजाता का पूरा हफ्ता विक्रम को शेड्यूल बताने, मीटिंग तय करने, उसके लिए फाइलें लाने और उसके लिए कागज़ात तैयार करने में बीत गया| उससे जो समय बचता उसे वह अपने प्रोजेक्ट को तैयार करने में लगा देती| उसका पूरा दिन इसी भागदौड़ में निकल जाता था|

वही सबको हैरानी हो रही थी की सुजाता को अब तक विक्रम से एक बार भी डांट नहीं पड़ी थी जबकि पिछली तीन बार उन्होंने अपनी सेक्रेटरी को दूसरे ही दिन डांट दिया था| इसका कारण था सुजाता विक्रम से भी एक क़दम आगे थी| वह हर काम को वक्त से पहले ही पूरा करके रखती थी| जहाँ विक्रम के कहने पर कोई काम को पूरा करने चलता था वही सुजाता पहले से उस काम को करके रखती और विक्रम के मांगने पर उसे फाइल तुरंत पहुँचा देती थी|

पूरा हफ्ता बीत गया था लेकिन विना का कहीं अता पता नहीं था| अगले दिन सुजाता ने उसे ऑफिस में घुसते ही पकड़ लिया|

‘विना क्या हुआ तुम्हारी सेक्रेटरी का|’

‘यार तुम्हें पता है ना सर् के लिए सेक्रेटरी ढूँढना कितना मुश्किल है| तुम एक-दो दिन रुको ना मैं देख रही हूँ ना|’ कहकर विना तेज़ी से निकल गयी| सुजाता को पता था की विना उसे फंसा कर अब उससे बच रही थी|

कुछ दिनों की मदद सुजाता के लिए अब आफत बन गयी थी| प्रोजेक्ट का दिन नज़दीक आ रहा था और उसे पूरा करने के लिए उसे देर तक ऑफिस में रुकना पड़ता था| कई बार उसे काम को घर पर भी लेकर जाना पड़ा|

उस दिन प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन का दिन था| उनकी प्रेजेंटेशन से पहले एक प्रेजेंटेशन और होनी थी| विक्रम, उसके पिता और बाकी के डायरेक्टर और अपने अपने विभाग के हेड वहाँ बैठे हुए थे| पहली प्रेजेंटेशन ख़त्म होते ही कुछ देर तक उस पर सवाल-जवाब चलते रहे| विक्रम ने सवाल पूछ-पूछकर उस टीम का बुरा हाल कर दिया था| अब सुजाता की टीम की बारी थी| तीन लोगों को वह प्रोजेक्ट बनाना था लेकिन उसका ज्यादातर काम सुजाता ने ही किया था| लेकिन उसकी प्रेजेंटेशन कोई और दे रहा था| तभी विक्रम की निगाह सुजाता पर पड़ी|

‘तुम यहाँ क्या कर रही हो|’

सुजाता डर के मारे अपनी कुर्सी पर से उठ गयी|

‘जी, वो मैं प्रेजेंटेशन के लिए आई थी|’

‘लेकिन सेक्रेटरी का यहाँ क्या काम?’

‘नहीं, मैं काम तो रिसर्च और डेवलपमेंट डिपार्टमेंट में करती हूँ| वो मुझे कहा गया था कुछ दिनों के लिए आपकी सेक्रेटरी बनने के लिए|’

‘यहाँ हो क्या रहा है?’ विक्रम ने गुस्से में कहा| ‘क्या यहाँ कोई मज़ाक चल रहा है की थोड़े दिनों के लिए यहाँ और थोड़े दिनों के लिए वहाँ|’

‘विक्रम मैंने ही कहा था ऑफिस से किसी को तुम्हारे पास रखने के लिए|’ विक्रम के दोस्त अरुण ने जो उसी के साथ काम करता था विक्रम को शान्त करने की कोशिश की|

‘विक्रम इसके बारे में बाद में बात करना अभी प्रेजेंटेशन होने दो|’ विक्रम के पिता ने कहा|

विक्रम चुप हो गया| और जो लड़का प्रेजेंटेशन देने के लिए खड़ा हुआ था प्रेजेंटेशन देने लगा| वह रुक-रूककर बोल रहा था और बार-बार अपने हाथ में पकड़े कागज़ में झाँक रहा था|

‘ये प्रेजेंटेशन किसने बनाई है?’ विक्रम ने एक बार फिर अपनी गुस्से वाली आवाज़ में पूछा|

‘जी सुजाता ने|’ उसने डरते हुए कहा|

विक्रम ने अपने सामने बैठे उन लोगों पर निगाह मारी| वह पिछले दो हफ्तों से उसके साथ काम कर रहा था लेकिन उसे सुजाता का नाम भी नहीं पता था| और सुजाता एक बार फिर अपनी कुर्सी पर से उठ चुकी थी| उसे लगा की उसकी प्रेजेंटेशन में कुछ गड़बड़ है|

‘तुमने यह प्रेजेंटेशन बनाई है|’ विक्रम ने सुजाता से पूछा|

‘जी|’

‘तो फिर तुम वहाँ क्या कर रही हो| यहाँ आकर यह प्रेजेंटेशन दो|’

सुजाता को समझ नहीं आया की वह क्या करे| उसने आज तक इतने सरे लोगों के सामने खड़े होकर नहीं बोला था| वह धीरे-धीरे सामने की तरफ बढ़ रही थी| सबका ध्यान उसकी तरफ था| सबकी निगाहें उसे घूर रही थी| उसकी बस यही एक कमज़ोरी थी| अगर दो आँखे भी उसे घूर रही हो तो वह बोल नहीं पाती थी और यहाँ तो पूरे के पूरे कांफ्रेंस हॉल की नज़रें उस पर थी| उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था| उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके मुहँ से शब्द ही नहीं निकलेंगे| और सबसे ज्यादा डर उसे विक्रम की घूरती निगाहों से लग रहा था| लेकिन फिर भी जैसे तेसे उसने बोलना शुरू किया और धीरे-धीरे प्रेजेंटेशन पूरी की| लेकिन अब असली इम्तेहान था दूसरों के सवालों का| लेकिन उसकी प्रेजेंटेशन इतनी अच्छी थी की किसी ने ज्यादा सवाल नहीं किये| और अब बारी थी विक्रम की| उसने भी सुजाता से कई सवाल किये लेकिन सुजाता ने उन सब का जवाब दे दिया|

कांफ्रेंस हॉल से निकलने के बाद सुजाता के चेहरे पर एक चमक थी| उसने आज वो काम किया था जिसके बारे में सोचते हुए भी उसे डर लगता था| वापिस अपने डिपार्टमेंट में आने पर हर कोई उसकी तारीफ कर रहा था|

कुछ देर बाद विना उसके पास आई| उसका मूड कुछ ठीक नहीं लग रहा था| शायद उसे विक्रम से ज़ोरदार डांट पड़ी थी| उसने सुजाता से डायरी वापिस ली और उसे कह गयी की उसे अब यह काम करने की कोई जरुरत नहीं| सुजाता ने भी चैन की साँस ली| अब वह थोड़ा आराम कर पायेगी|

सुजाता बहुत खुश थी| पहला कारण था उसकी प्रेजेंटेशन इतनी अच्छी हुई थी और दूसरा कारण था विक्रम के साथ दो हफ्ते काम करने के बावजूद कोई डांट न खाने का| उसकी ऑफिस की साथी नेहा ने तो उसे यहाँ तक कह दिया था की वह खुशनसीब है की ऐसा करने पर सिर्फ विना को डांट पड़ी और उसे नहीं| नसीब की बात हो या नहीं लेकिन सुजाता खुश थी क्योंकि अब ऑफिस में उसकी कद्र कुछ ज्यादा ही होने लगी थी| जो लोग कल तक उसे नहीं जानते थे आज उसे मिलने पर उसे हाय बोलने लगे थे|

Monday, 31 August 2015

सुजाता की कहानी-5

अभय जिस लड़की से शादी कर रहा था सुजाता उसे अच्छी तरह से जानती थी| सलोनी थी ही इतनी सुन्दर की ऑफिस का हर लड़का उस पर मरता था| उसका दूध जैसा सफ़ेद रंग हर लड़की की जलन का कारण था| वह जितनी सुन्दर थी उतनी ही स्टाइलिश भी थी| अभय क्यों उसे छोड़कर सुजाता के पास आयेगा जिसके पास ना रूप है ना रंग| उसके पास सिर्फ अच्छा दिमाग था जिससे ज्यादातर लड़कों को कुछ लेना-देना नहीं होता|

जब अभय ने अपनी सगाई की खबर देने के लिये सुजाता को फोन किया तो वह ख़ामोशी से अभय की बात सुनती रही, उसके गालों पर आंसुओं की दो लकीरें बन गयी थी| उसे पहले से ही पता था की एक दिन ऐसा होने वाला था| लेकिन फिर भी वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पा रही थी| ना जाने अभय की आवाज़ सुनते ही उसे क्या हो जाता था| उसने सगाई में जाने के लिये अभय को कोई ज़वाब नहीं दिया|

और फिर उनकी बातचीत एकदम बंद हो गयी| ना तो सुजाता ने ही कभी अभय को संपर्क करने की कोशिश की और ना ही अभय ने दुबारा उसे फोन किया| वो शायद अपनी दुनिया में मग्न हो चुका था सुजाता की फ़िक्र छोड़कर| सुजाता ने भी कुछ ऐसा ही किया, उसने तो अपने फोन से अभय का नंबर भी निकाल दिया था ताकि वह भूले से भी उसको फोन ना कर पाये|

सुजाता ने अपने आप को धीरे-धीरे संभाला| उसके लिये ये सब एकदम नयी बात थी क्योंकि इससे पहले उसे कुछ खबर ही नहीं थी की प्यार होता क्या है, उसका एहसास क्या होता है और जब किसी से प्यार हो जाता है तो उसे जाहिर करने में कितनी तकलीफ़ होती है| उसे पता था की इसमें अभय की कोई गलती नहीं थी क्योंकि खुद उसे ही काफ़ी देर बाद पता चला की वह अभय से प्यार करने लगी थी| उसे बुरा सिर्फ अभय की उन बातों का लगा था जिसने उसे उन लड़कियों के साथ खड़ा कर दिया था जो अभय के करीब सिर्फ उसकी सुन्दरता को देखकर आती थी| उनका प्यार से कोई लेना देना नहीं था| अभय ने उसके प्यार को इतना नीचे गिरा दिया था|

लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| जो होना था हो चुका था| अभय उसकी ज़िन्दगी से जा चुका था हमेशा के लिये| और वह खुद भी नहीं चाहती थी की वह वापिस लौटकर आये क्योंकि अगर वह वापिस आ भी गया तो भी वह कभी भी उसकी भावनाओं को नहीं समझ पायेगा| लेकिन उसने कभी भी अभय से नफरत नहीं की उसे छोड़ देने के लिए क्योंकि वे कभी साथ थे ही नहीं| उनका रिश्ता कभी बना ही नहीं था| और सुजाता ने फैसला किया की अभय के साथ बिताए पलों को किसी कड़वी याद की तरह रखने की बज़ाय वह उन्हें एक मीठी याद की तरह सजोकर रखेगी क्योंकि यही वो पल थे जब उसने प्यार का मतलब जाना था, उसे महसूस किया था|

लेकिन सिर्फ सोच लेने से अगर ऐसा हो जाता तो हर वो इन्सान जिसका दिल टूटता है बड़ी ही आसानी से सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाता| यह उतना आसान नहीं होता जीतना की लगता है| सुजाता को हमेशा ही यही लगता था की एक दिन अभय को समझ आ ही जायेगा की वह उससे कितना प्यार करती है और उस दिन वह सुन्दरता की मोह माया से निकलकर उसके पास चला आयेगा| सुजाता के लिए हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता था की शायद आज अभय का फोन आ जाये लेकिन उसकी हर रात आंसुओं के साथ गुजरती थी| उसका ध्यान हर चीज़ से हटने लगा था| उसे बस अभय चाहिए था| वह रोती, मिन्नतें करती की क्यों नहीं अभय उसे मिल सकता है| कई बार उसके लिए यह सब बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता था|

सुजाता ने अपने आप को अभय के मोह में इस कदर बांध लिया था की वह वहाँ से बाहर ही नहीं निकलना चाहती थी| अभय के जाने के बाद बिखरी अपनी दुनिया को उसने वापिस समेटना तो शुरू कर दिया था लेकिन फिर भी वह उसे भूलना नहीं चाहती थी| वह चाहे कितना भी दिखावा करे उसे भूल जाने का लेकिन सच्चाई यही थी की वह उसे भूल नहीं पा रही थी| लेकन धीरे-धीरे उसने अभय को अपने दिल के एक कोने में समेट दिया था| ऐसा कोना जिस पर वह कभी निगाह नहीं डालन चाहती थी|

और इसी बीच तीन साल बीत गये| लेकिन सुजाता अभय को भूली नहीं थी| पता नहीं क्यों वह उसके वापिस आ जाने की उम्मीद पर जी रही थी जबकि उसे पता था की ऐसा कभी नहीं होगा| वह इतनी बेवकूफ़ कैसे हो सकती थी|

लेकिन जो कुछ भी हो सुजाता का दिल अब धड़कने लगा था| वह अब उस इन्सान के सपने देखने लगी थी जो सच में उसे प्यार करेगा| उसे नहीं पता था की उसे किस की चाहत है, वह कौन है, लेकिन उसे उस एक के मिल जाने का बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार था|

इस दौरान सुजाता ने दूसरी जगह नौकरी कर ली|

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‘क्या तुम मेरे लिए एक काम करोगी?’ सुजाता ने देखा की कंपनी में नए लोगों की भर्ती करने का जिम्मा रखने वाली विना उसके ऑफिस में खड़ी थी|

‘क्या हुआ?’

‘वो मुझे विक्रम सर् के लिए सेक्रेटरी को रखना था लेकिन अभी तक कोई नहीं मिला है| और आज वो वापिस लौट रहे हैं| क्या तुम कुछ दिनों के लिये यह काम संभाल लोगी?’

‘लेकिन मैं ही क्यों? ऑफिस में और भी बहुत लोग हैं?’

‘हाँ, है तो लेकिन कोई भी विक्रम सर् के डर की वजह से वहाँ जाना नहीं चाहता है| तुम्हें तो पता ही है वे कितना डांटते है| और तुम उनसे इतना नहीं डरती हो| और तुम्हें शोर्ट हैण्ड भी आती है|’ विना जल्दी-जल्दी इतना सब बोल गयी| और रुकने के बाद उसने एक गहरी साँस ली| ‘देखो प्लीज मेरा ये काम कर दो वर्ना मेरी नौकरी तो गयी|’

‘लेकिन तुम्हें पता है मेरे पास कितना काम है| और ये डेडलाइन भी तो है|’

‘देखो तुम्हें जो मदद चाहिए में करुँगी लेकिन मेरा ये काम कर दो| तुम कहोगी तो तुम्हारा प्रोजेक्ट मैं बना दूँगी लेकिन प्लीज यह कर दो| सिर्फ कुछ दिनों की बात है, एक-दो दिन में इंटरव्यू हैं| सर् के लिये कोई ना कोई ज़रूर मिल जायेगा||’

‘नहीं उसकी कोई जरुरत नहीं है| मैं खुद अपना काम कर लूँगी|’

‘ठीक है तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना है सिर्फ सर् जो कुछ भी कहते हैं उसे नोट करना है| और अगर उनके लिए कोई फोन आयेगा तो तुम्हें उन्हें भी संभालना पड़ेगा ताकि मुलाकात का वक्त दिया जा सके| मैं तुम्हें उनकी डायरी दे देती हूँ|’

सुजाता मना नहीं कर पायी| उसे नहीं पता था की कोई भी विक्रम सर् के साथ काम करने से इतना डरता क्यों था| हाँ वे थोड़ा सख्त थे लेकिन काम में मामले में तो इतनी सख्ती चलती है| वे हमेशा काम वक्त पर चाहते थे, और वे खुद भी समय के बहुत पाबंद थे| हाँ वे अपनी उम्र के लिहाज़ से थोड़ा ज्यादा ही गंभीर लगते थे| वे पैंतीस के आस-पास के होंगे लेकिन किसी साठ साल के आदमी की तरह व्यवहार करते थे| वे ज्यादा सुन्दर तो नहीं थे लेकिन देखने में आकर्षक थे| और उनका छह फुट का कद उन्हें और ज्यादा आकर्षक बना देता था|

विना ने सुजाता को एक डायरी दी जिसमें हर रोज़ होने वाली मीटिंग और मुलाकातों का ब्यौरा दर्ज़ था और मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गयी| सुजाता को पता था की उसने कितनी बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली थी| वह पिछले एक साल से इस ऑफिस में थी और इस एक साल के दौरान ही उन्होंने पांच सेक्रेटरी बदल दी थी| उन्हें किसी का काम करने का तरीका ही पसंद नहीं आता था| उसने सुना था जब से उनके पुराने सेक्रेटरी जो उनके साथ पिछले दस सालों से काम कर रहे थे नौकरी छोड़कर गये हैं तब से उन्होंने कई सेक्रेटरी बदल ली थी| इसलिए उनके ऑफिस में कोई नहीं जाना चाहता था क्योंकि अगर वे उस पर नाराज़ हो गये तो समझ लो की उनकी नौकरी गयी| लेकिन सुजाता को कभी उनसे डर नहीं लगा| वे अगर भूत भी होते तो भी वह उनसे नहीं डरती|

अगले दिन सुजाता वक्त से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी| वैसे वह हमेशा ही वक्त से पहले ही ऑफिस पहुँच जाया करती थी| लेकिन आज वह और पंद्रह मिनट पहले पहुँच गयी थी| उसने फटाफट डायरी खोली और उस पर निगाह मारी| दिन भर का कार्यक्रम उसमें था| सुजाता ने पूरे हफ्ते का कार्यक्रम पड़ डाला| दस बजते ही वह विक्रम के आने का इंतज़ार करने लगी| यह कंपनी विक्रम के पिता की थी और वह कॉलेज की पढाई पूरी करते ही इससे जुड़ गया था| बीच में वह आगे की पढाई करने के लिए अमेरिका चला गया| वहाँ से लौटने के बाद ज्यादातर काम का जिम्मा उसके सिर आ गया| इसलिए कुछ और करने के लिए उसके पास वक्त ही नहीं रहा| कभी विक्रम की एक गर्लफ्रेंड हुआ करती थी जिसे वह बहुत चाहता था और शायद उससे शादी भी कर लेता लेकिन उसकी व्यस्तता के चलते वह विक्रम को छोड़कर चली गयी| उसके बाद विक्रम ने अपने आप को काम में एकदम डुबो लिया| उसकी हर बात में सिर्फ काम होता था| इधर-उधर की बातें करना या दोस्तों के साथ टाइम-पास करना जैसे वह भूल ही गया था| वह कभी कभार ही अपने दोस्तों से मिलता था| अपने पैसे और शोहरत की वजह से उसके आस-पास लड़कियों की भी कमी नहीं थी लेकिन उनमें भी वह धीरे-धीरे दिलचस्पी खोता जा रहा था|

Monday, 24 August 2015

सुजाता की कहानी-4

अभय के चले जाने के बाद कई रातें सुजाता ने जागते हुए बिताईं| आफिस में भी उसका मन नहीं लगता था| वह बस एक बार अभय को देख लेना चाहती थी| वह फोन अपने हाथ में लेती, उसका नंबर भी निकाल लेती लेकिन उसे फोन करने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाती थी| उसे पता था की अभय से बात करके वह और ज़्यादा कमज़ोर पड़ जायेगी| उसे पता था की उसे अकेले ही इस तकलीफ़ को सहन करना पड़ेगा|

इसलिए अभय के चले जाने के बाद उसने कभी खुद से अभय को फोन नहीं किया| उसे ऐसा करना ही ठीक लगा क्योंकि अभय से जितना दूर वह रहेगी उतना ही उसके लिये अच्छा होगा| शुरू-शुरू में तो अभय रोज़ सुजाता से फोन पर बात कर लिया करता था लेकिन वक्त के साथ धीरे-धीरे उनकी बातचीत कम होने लगी थी| इसी बीच एक दिन अभय ने उसे मिलने के लिये बुलाया लेकिन सुजाता ने बहाना बनाकर अभय से मिलने से ही मनाकर दिया| उसे पता था की अभय वो मंजिल थी जिसे वह कभी भी नहीं पा सकती थी|

और आज भी उसने यही किया| आज अभय का जन्मदिन था और वह बार-बार उसे फोन कर रहा था लेकिन बहुत चाहने पर भी सुजाता ने उससे बात नहीं की| वह बस एक बार उसकी आवाज़ सुन लेना चाहती थी लेकिन इससे उसका दर्द और बढ़ जायेगा उसे ये भी पता था|

अभय को भी शायद यह महसूस होने लगा था की सुजाता उससे बात नहीं करना चाहती थी लेकिन उसने उससे इस बारे में कभी कुछ नहीं पूछा| और फिर धीरे-धीरे उन लोगों की बातचीत होनी कम होने लगी| और एक वक्त ऐसा आया जब उन लोगों ने कई महीनों तक बात नहीं की|

इस तरह एक साल और बीत गया| तभी एक दिन अचानक अभय उसे एक स्टोर में खरीददारी करते हुए मिल गया| अगर उसने उसे देखा नहीं होता तो वह चुपचाप वहाँ से निकल गयी होती| लेकिन उसे देखते ही अभय फ़ौरन उसके पास आया और उसके मना करने के बावजूद उसे एक कॉफ़ी शॉप में ले गया| वह जानना चाहता था की आखिर उसे हुआ क्या था और उसने उससे बातचीत करना बंद क्यों कर दिया था|

सुजाता काफी देर तक खामोश बैठी रही लेकिन वह अपने आंसुओं को रोक नहीं सकी जो उड़े धोखा देते हुए उसकी आँखों से बह निकले थे| वह नहीं चाहती थी की ऐसा कुछ भी अभय के सामने हो| लेकिन वह अपने आप को रोक नहीं पायी| काफी देर रोने के बाद उसके आंसू थमे| अभय शांत बैठा उसे देख रहा था| वह चाहता था की जो कुछ भी उसके दिल में था वह बाहर निकल आये|

सुजाता सोच रही थी उसे कहना चाहिए या नहीं| उसके साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था| उसे नहीं पता था की उसकी बात सुनकर अभय की क्या प्रतिक्रिया होगी| क्या वह उसे खो तो नहीं देगी|

‘तो अब बताओ क्या हुआ|’

‘नहीं कुछ नहीं|’

‘नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता| बहुत कुछ हुआ है और मैं बिना सुने आज यहाँ से नहीं जाने वाला हूँ|

सुजाता चाहती थी की अपना दिल खोलकर अभय के सामने रख दे, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था| उसने कभी किसी से इस तरह की बात नहीं की थी|

‘वो तुम मुझे अच्छे लगते हो,’ उसने धीरे से कहा|

अभय कुछ पलों के लिए तो खामोश रहा और फिर ज़ोर से हँस पड़ा|

‘बस इतनी सी बात| मुझे लगा ही था| तुम भी ना एकदम बेवकूफ़ हो| पहले क्यों नहीं बताया| और मुझे लगा पता नहीं क्या हुआ|’

अभय को इस तरह हँसता हुआ देखकर सुजाता को हैरानी हो रही थी| तो क्या वह भी उसे पसंद करता है?

‘मुझे लगा कहीं तुम मुझ से गुस्सा न हो जाओ|’

‘तुम्हें लगता है की मैं इस बात पर तुमसे गुस्सा हो जाऊँगा|’

‘पता नहीं?’ सुजाता ने अपना सिर झुका लिया|

‘तुम अगर पहले बता देती तो हम इस बात का कोई ना कोई हल ख़ोज लेते| तुम्हें बेकार ही इतनी तकलीफ़ से नहीं गुजरना पड़ता|’

अभय की बात सुनकर सुजाता को थोड़ी राहत महसूस हुई| उसका दिल भी अब शांत हो गया था|

‘देखो तुम्हारे साथ शायद ऐसा पहली बार हुआ है इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है लेकिन जब कुछ वक्त बीत जायेगा तो तुम्हें इस बात पर हंसी आयेगी की तुमने कितनी बेवकूफी की| हमें कई बार ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें हम बहुत पसंद करने लगते हैं| हमें लगता है हम उनके बिना जी नहीं सकते हैं लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है| तुम देखना कुछ समय बाद तुम यह सब भूल जाओगी|’

‘लेकिन....|’

‘मुझे लगा था तुम बहुत अक्लमंद हो| लेकिन तुम भी उन बेवकूफ़ लड़कियों की तरह निकली|’

‘मतलब?’

‘अरे भई, यह प्यार-व्यार के चक्कर में पड़ना हम जैसे लोगों का काम होता है जिन्हें कुछ और नहीं आता है| और तुम्हें सच कहूँ यह प्यार –व्यार कुछ नहीं होता है बस कुछ देर का आकर्षण होता है| कभी यह जल्दी ख़त्म हो जाता है और कभी देर तक चलता है| लेकिन एक दिन ख़त्म ज़रूर होता है| अब मुझे ही देख लो मुझे पता नहीं आज तक कितनी लड़कियों से प्यार हुआ| लेकिन सब का एक ही अंजाम हुआ, ब्रेक-अप|’

‘लेकिन मैं सच में तुमसे तुमसे प्यार करती हूँ|’

‘हाँ, हाँ मुझे पता है| लेकिन तुम्हारे साथ ऐसा पहली बार हुआ हैं ना इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है| पता है तुम मुझे क्यों अच्छी लगती थी और मैं क्यों तुम्हारे साथ इतना वक्त बिताता था?’

‘क्यों?”

‘क्योंकि मुझे पता था की तुम उन बाकि सब लड़कियों की तरह मुझ से प्यार नहीं कर बैठोगी और मेरे पीछे नहीं पड़ी रहोगी की मैं तुम्हें अपनी गर्लफ्रेंड बना लूँ| मैं उन सब से इतना परेशान हो चुका था| मैं तुम्हें समझदार समझता था लेकिन तुम भी बाकियों की तरह ही निकली| देखो तुम्हें अपना अपना भविष्य के बारे में सोचना चाहिए ना की मेरे बारे में| तुम्हें और भी कई अच्छे लड़के मिल जायेंगे|’

सुजाता एकटक अभय की बातों को सुन रही थी| उसके आंसू अब रुक चुके थे और चेहरा कठोर होने लगा था| अभय को ऐसा क्यों लगा की वह उसके प्यार में नहीं पड़ेगी? क्योंकि वह उससे कम सुन्दर है इसलिए? या फिर जिन लड़कियों के पास दिमाग होता है उनके पास दिल नहीं होता? क्यों वह एक सुन्दर लड़के के प्यार में नहीं पड़ सकती? क्या वह प्यार करना नहीं जानती? क्या प्यार करने का हक़ सिर्फ अभय जैसे लड़कों और उन सुन्दर लड़कियों को होता है जिनके साथ वह घूमता है? क्या उसके पास दिल नहीं है? क्या उसकी कोई भावनाएँ नहीं? और क्या उसका दिल टूटना नहीं जानता? उसका दिल भी चाहता है की कोई उसे भी प्यार करने वाला हो, उसे बाँहों में भरने वाला हो, उसका ख्याल रखने वाला हो, उसे हंसाने वाला हो? क्या वह अभय को उन लड़कियों से कम प्यार करती क्योंकि वह खुबसूरत नहीं है और उनकी तरह बनठन कर नहीं रहती है? क्या प्यार करने के लिए सिर्फ सुन्दर चेहरे और शरीर की ही जरुरत होती है? क्या मन की भावनाओं का इससे कोई लेना देना नहीं है?

उसे समझ आ रहा था की अभय जैसा लड़का उसे कभी पसंद कर ही नहीं सकता है| शायद उसके साथ होने और उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाने में उसे शर्मिंदगी महसूस होगी| उसे कोई अपने जैसी ही पसंद आयेगी जो उसके जितनी ही गोरी हो, और उस जितनी ही सुन्दर हो| और सिर्फ अभय ही नहीं बल्कि और लोग भी उसके जैसी लड़की को अभय के साथ देखकर पहला सवाल यही करेंगे - क्या इसे कोई और नहीं मिली? हमारे समाज में शादी के वक्त लड़की का सिर्फ एक गुण होता है और वह है उसकी सुन्दरता| अगर लड़की सुन्दर नहीं है तो उसके दुसरें गुणों का कोई मोल नहीं है|

और आज अभय को शायद और ज्यादा घमंड हो गया होगा की देखो सुजाता जैसी अक्लमंद लडकियाँ भी उसके पीछे दीवानी हुई फिरती है| अभय की बातों में उसका यह घमंड साफ झलक रहा था|

सुजाता चुपचाप उसे सुनती रही| और एक घंटे बाद वह वापिस घर लौट आयी| शायद अभय को वह जैसा समझ रही थी वह वैसा नहीं था| अगर वह साफ मना कर देता यह कहकर की उसे उससे प्यार नहीं है तो भी सुजाता को इतना बुरा नहीं लगता जितना उसे उसकी ऐसी बातें सुनकर लग रहा था| वह अभय को जितना संवेदनशील और अक्लमंद समझती थी आज उसे उसकी सोच उतनी ही असंवेदनशील और घटिया लग रही थी| उसे अपने दिल के टूट जाने का इतना दुःख नहीं था जितना दुःख उसे इस बात का हो रहा था की अभय के लिए उसकी भावनाओं का कोई मतलब नहीं है| एक दोस्त की खातिर ही सही वह वह उसका दर्द थोड़ा कम कर सकता था लेकिन उसे तो इस बात में आनंद आ रहा था की उसके पीछे भागने वाली लडकियों में सुजाता का भी नाम जुड़ गया था| और उसे इस बात का एहसास तब हुआ जब उसे पता चला वह किस से शादी कर रहा था| उसने अभय के बारे में जैसा सोचा था वह वैसा ही निकला| यही उनकी आखिरी बातचीत भी थी|


continue.....................

Saturday, 8 August 2015

सुजाता की कहानी-3



उस पूरे हफ्ते बरसात युहिं चलती रही और अभय सुजाता को ऐसे ही मेट्रो स्टेशन पर छोड़ता रहा| एक शाम को जब वे आफिस से निकले तो अभय ने सुजाता से पास के कॉफ़ी शाप में कॉफ़ी पीने के लिये चलने के लिये पूछा| सुजाता सिर्फ इसलिए उसके साथ चली गयी क्योंकि अभय ने उसकी इतनी मदद की थी| वे लोग वहाँ पर सिर्फ बीस मिनट ही बैठे होंगे लेकिन वो पहली बार था जब उन लोगों ने खुलकर थोड़ी बात की थी|

सुजाता ने पहले कभी भी किसी से खुलकर इस तरह बात नहीं की थी| उसके पास किसी से बात करने का वक्त ही नहीं था| स्कुल और कालेज में वह हमेशा ही किताबों के ढेर के पीछे छुपी रहती थी| कालेज में उसके साथ पड़ने वाले इसलिए उसका नाम मालूम था क्योंकि वह हमेशा अव्वल आती थी| लेकिन उसके दोस्त बहुत ही कम थे| वही जो पड़ना ज्यादा और मस्ती करना कम पसंद करते थे| ना तो वह किसी के साथ बाहर जाती थी और ना ही कोई उसे ले जाना पसंद करता था| लड़कियाँ ही उससे दोस्ती रखना पसंद नहीं करती थी तो लड़कों की तो बात ही छोड़ दो| उसकी ज़िन्दगी में कोई ऐसा नहीं था जिसे वह दोस्त कह सके, अपना सबसे अच्छा दोस्त|

इसलिए आज जब वह अभय के साथ इस तरह काफ़ी शॉप में अकेले आयी थी तो उसे बड़ा ही अज़ीब लग रहा था| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह उससे क्या बात करे| उसे पता ही नहीं था की बात कैसे की जाती है| वह बातचीत करने में उतनी ही बुरी थी जितना वह पढाई में अच्छी थी|

अभय ने ही उनके लिये कॉफ़ी का ऑडर दिया| कुछ देर तक दोनों ख़ामोशी से कॉफ़ी पीते रहें| दोनों में कुछ खास बातचीत नहीं हुई| कॉफ़ी खत्म होने पर अभय ने सुजाता को मेट्रो स्टेशन छोड़ा और अपने घर के लिये निकल पड़ा|
घर लौटते हुए सुजाता को यह यकीन हो चुका था की शायद अभय उससे दुबारा बात करना पसंद ना करे| अगर वह ऐसा करता है भी तो भी सुजाता को उसका बुरा नहीं लगेगा क्योंकि उसे लोगों के ऐसे व्यवहार की आदत हो चुकी थी जो उसे बोर कहते थे|

अगले दिन जब सुजाता ऑफिस पहुँची तो अभय उसे लिफ्ट में ही मिल गया| उसने मुस्कुराकर उसे हाय कहा| सुजाता ने भी उसे मुस्कुराकर ज़वाब दिया| उस समय सुजाता को लगा की शायद उसे उसका पहला दोस्त मिल गया था| क्योंकि पहली बार कोई उसके रूप को नहीं बल्कि उसकी काबिलियत को पसंद कर रहा था| लेकिन एक बात थी जो सुजाता को समझ नहीं आ रही थी की अभय जैसा सुन्दर लड़का, ऑफिस में कई दूसरी खुबसूरत लड़कियों के होने के बावज़ूद उसी से दोस्ती क्यों कर रहा था?

इसलिए तीन महीनें गुज़र जाने के बावजूद भी सुजाता अभय के साथ बहुत ही कम बात करती थी जबकि अभय ने उसे अपने बारे में उसे सब कुछ बता दिया था, यहाँ तक की अपनी पुरानी तीन गर्लफ्रेंड के बारे में भी जिनके बारे में उसकी पिछली गर्लफ्रेंड को भी नहीं पता था| लेकिन सुजाता ऐसी ही थी उसे काफ़ी वक्त लगता था लोगों के साथ घुलने मिलने में, उनके बातचीत करने में, एक तरह से उन पर विश्वास करने में|

कई महीनों तक उनकी बातचीत सिर्फ हॉय-हैलो तक ही सीमित रही| सुजाता ऑफिस आती, अपना काम करती और शाम को अकेले घर के लिये निकल पड़ती| वो अकेले ही खुश थी| उसे जैसे किसी की जरुरत ही नहीं थी|

लेकिन अभय उसे अकेला रहने ही नहीं देता था| जब भी उसके पास वक्त होता वह सुजाता के पास आकार बैठ जाता और उससे खूब हंसी मज़ाक करता| सुजाता को भी यह सब बहुत अच्छा लगने लगा था| जब भी वह अभय के साथ होती हमेशा ही खूब हंसती, दिल खोलकर|

और कुछ महीनों बाद ही अलग-अलग डिपार्टमेंट में होने के बावजूद वे लोग दिन का काफ़ी वक्त साथ बिताने लगे थे| साथ आना, साथ लंच करना और साथ ही ऑफिस से निकलना| और रोज़ ही अभय सुजाता को मेट्रो स्टेशन छोड़ता था| यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था| एक साल तक उन दोनों ही ज़िन्दगी यूँ ही चलती रही| वे आफिस में ही एक दूसरे से मिलते, हँसी मजाक करते, एक दूसरे की मदद करते, और फिर शाम होते ही अपने-अपने घर के लिये निकल पड़ते|

अचानक एक दिन अभय ने सुजाता को अपने नौकरी छोडने की बात बताई| जब अभय ने सुजाता को इस बारे में बताया तो सुजाता को कुछ अच्छा नहीं लगा| उसे पहले यही लगा की क्योंकि अभय उसका अच्छा दोस्त है इसलिए उसे बुरा महसूस हो रहा है| उसे लग रहा था की अभय के बिना वह ऑफिस में वक्त कैसे गुज़ार पायेगी क्योंकि वही था जो उसकी दिन भर की बोरियत को दूर किया करता था और अपनी बातों से उसे हंसाता था| सुजाता को लगा की शायद उसे उसकी आदत पड़ गयी थी| उसने तो यही सोचा था| लेकिन इसका कारण कुछ और ही था जिसका पता सुजाता को अभय के चले जाने के बाद लगा|

जैसे-जैसे अभय के जाने का दिन नज़दीक आ रहा था वैसे-वैसे सुजाता की बैचेनी भी बढ़ती जा रही थी| उसे नहीं पता था की उसे क्या हो रहा था| उसे यह एहसास तो था की एक ना एक दिन वे दोनों अलग-अलग जगह पर काम कर रहे होंगे लेकिन उसे खुद भी नहीं पता था की वह अभय की कमी को इतना महसूस करेगी| दोनों हमेशा की तरह ही लंच के लिये मिलते, लेकिन सुजाता तो जैसे एकदम खामोश सी हो गयी थी| अभय का ध्यान भी इस तरफ गया था लेकिन उसने सोचा की शायद वह किसी और बात की वजह से उदास थी| उसे लगा की सबकुछ ठीक हो जाने पर सुजाता खुद ही उसे इस बात के बारे में बता देगी| उसे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था की उसकी उदासी का कारण वह खुद था|

जितना भी वक्त सुजाता ने अभय के साथ बिताया उसे यही लगता था की अभय उसका सिर्फ एक अच्छा दोस्त है| इससे ज़्यादा ना तो उसने कभी कुछ सोचा और ना ही कभी महसूस किया| लेकिन फिर भी अभय के चले जाने की बात सुनकर उसके दिल में एक अजीब बैचेनी थी|

इसका कारण था शायद उसे अभय दोस्त से ज़्यादा अच्छा लगने लगा था| लेकिन उसने कभी भी इस बारे में नहीं सोचा ही था| बल्कि उसने कभी किसी से प्यार करने के बारे में ही नहीं सोचा था| जिंदगी की जद्दोजहद में उसका ध्यान कभी भी इस तरफ गया ही नहीं था| स्कूल में, कॉलेज में हर जगह वह लड़कियों को अपने बॉयफ्रेंड के साथ घुमते देखती थी लेकिन उसके दिमाग में कभी भी यह ख्याल नहीं आया था की उसे भी कुछ ऐसा करना चाहिए|

और उसे यह भी पता था की अभय और उसके बीच दोस्ती के रिश्ते से ज्यादा और कुछ नहीं हो सकता था| लेकिन अगर ऐसा था तो फिर वह अभय के चले जाने की बात सुनकर इतनी बैचेन क्यों हो गयी थी| क्या उसे अभय एक दोस्त से ज़्यादा पसंद आने लगा था? शायद हाँ|

लेकिन सुजाता को पता था की अभय ऐसा नहीं सोचता था| इसलिए उसने कभी भी अभय पर इस बात को ज़ाहिर नहीं होने दिया| अभय के जाने से पहले वह जितना शांत रह सकती थी रही| उसने एक तरह से इस बात को स्वीकार कर लिया था की उसके और अभय के बीच में कभी कुछ नहीं हो सकता था| इसलिए यही अच्छा होगा की अभय के लिये अपनी मन की भावनाओं को वह यहीं पर ही खत्म कर दे क्योंकि जितना ज़्यादा वह इसके बारे में सोचेगी उतनी ज़्यादा उसे तकलीफ़ होगी|