Sunday, 22 November 2015

सुजाता की कहानी- अंत

विक्रम अपने दिल की बातें उसे बताये जा रहा था और सुजाता चुपचाप उसे सुने जा रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था की वह विक्रम को रोके या पूरी बात कह लेने दे| उसने हमेशा से ही इस दिन का इंतज़ार किया था जब कोई उससे कहता की वह उससे प्यार करता है| लेकिन आज ना जाने सुजाता को क्या हो गया था| विक्रम जैसा इन्सान जिसके बारे में उसने सपने में भी नहीं सोचा था उससे कह रहा था की वह उससे प्यार करता है फिर भी वह खामोश बैठी थी, उसके चेहरे पर ख़ुशी का कोई नामोनिशान नहीं था|

विक्रम ने देखा की सुजाता की आँखे भर आई थी और उसकी आँखों से दो आंसू उसके गालों पर लुढ़कने को तैयार थे| विक्रम भी चुप हो गया| उसे लगा की उसकी बातों को सुनकर शायद सुजाता को अच्छा नहीं लगा|

“मुझे लगता है अब हमें चलना चाहिये|” विक्रम ने उठते हुए कहा|

लेकिन सुजाता खामोश अपनी कुर्सी पर बैठी रही| विक्रम भी वापिस बैठ गया|

“सुजाता मैं तुम्हें किसी तरह का दुःख नहीं पहुँचाना चाहता था| अगर तुम्हें मेरी किसी भी बात से चोट पहुँची है तो मैं तुमसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ|”

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है|” सुजाता ने अपनी आँखे पोंछते हुए कहा| “आप जानते हैं आज तक किसी ने मुझ से इस तरह की बातें नहीं कही| और आप....आप मुझ से प्यार करेंगे ऐसा मैंने सोचा भी नहीं था| आप जैसा इन्सान किसी किस्मत वाले को ही मिल सकता है|”

“लेकिन मुझे लगता है की अगर तुम मुझे मिल जाओ तो मैं इन दुनिया में सबसे ज्यादा किस्मत वाला इन्सान होऊंगा|”

सुजाता कुछ देर तक विक्रम का चेहरा निहारती रही| उसने आज तक इस तरह विक्रम की आँखों में नहीं देखा था| ‘क्या सच में ऐसा हो सकता है? क्या सच में विक्रम मुझ से इतना प्यार करता है?’ उसके दिलो-दिमाग में बस यही सवाल घूम रहे थे|

“आपको पता है प्यार की सबसे अजीब बात क्या है?” सुजाता ने विक्रम के चेहरे पर से नज़रे हटाते हुए कहा|

“क्या?”

“यही की जिसे हम चाहते है वह हमें नहीं चाहता और जो हमसे प्यार करता है हमें उसके प्यार की कोई परवाह नहीं होती है| प्यार की चाहत में हम ऐसे इन्सान के पीछे भागते रहते हैं जिसका हमें पता होता है की वह हमें नहीं मिलेगा लेकिन फिर भी हम उससे उसी प्यार की उम्मीद करते हैं जैसा हम उसे करते हैं यह सब जानते हुए भी ऐसा कभी नहीं होगा| और हम उस इन्सान का प्यार ठुकरा देते हैं जो सच में हमें प्यार करता है|

“तो क्या तुम किसी और से प्यार करती हो?”

“प्यार? मुझे शायद ऐसा लगा था की मैं उससे प्यार करती हूँ लेकिन वह जो कुछ भी था बस प्यार नहीं था| प्यार का मतलब होता है किसी भी चीज़ की उम्मीद ना करना लेकिन हम असल में उसे इतना स्वार्थी बना देते हैं की हमें पता ही नहीं चलता की कब हमरा प्यार प्यार न रह कर एक जरुरत बन जाता है| और हम प्यार करने की बजाय उम्मीदों में फंस कर रह जाते हैं| और जब हमारी उम्मीद पूरी नहीं होती तो हम बदला लेने पर उतर आते हैं|”

“क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ|”

“मैं इतना आगे निकल आई हूँ लगता है मैं खुद अपनी मदद नहीं कर सकती हूँ| अगर आप को पता चलेगा की मैं क्या कर रही हूँ तो शायद आप मुझ वैसे पसंद न करे जैसा आप अभी करते हैं|”

“लेकिन....|”

“मुझे लगता है मुझे अब चलना चाहिए|” सुजाता ने उठते हुए कहा|

“मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ|”

सुजाता विक्रम की तरफ देख कर मुस्कुराई| उसे इस दिन का न जाने कब से इंतज़ार था जब कोई उससे कहता की वह उससे प्यार करता है, उसकी जरूरतों का ख्याल रखता, उसे घर छोड़कर आता| लेकिन सुजाता ने एक गलती की, उसने एक गलत इन्सान से इन सब की उम्मीद की| और आज जो कुछ सुजाता कर रही थी इसी गलती का नतीजा था|

सुजाता जब होटल से बाहर निकली तो आठ बजने को थे| उसका फोन बजा| दूसरी तरफ अभय था| सुजाता ने फोन उठाया तो अभय ने उसे बताया की उसने सलोनी को तलाक़ के कागज दे दिए हैं और कुछ दिनों बाद वे दोनों साथ रह सकते हैं| अभय की बात सुनकर सुजाता ने फोन काट दिया| उसका मकसद पूरा हो रहा था|

वही विक्रम अभी भी अपनी जगह पर ही बैठा हुआ था| सुजाता ने उसे क्या कहा और क्या नहीं उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था| उसने उसे ना तो हाँ कहा था और ना ही ना| वह कुछ देर वहाँ पर रुका और फिर अपने घर की तरफ चल दिया|

जब सुजाता घर पहुँची तो वह पहले वाली सुजाता नहीं रह गयी थी| वह उस सुजाता जैसी तो बिल्कुल नहीं थी जो चार साल पहले थी, भोली, मासूम| आज उसकी सारी मासूमियत जा चुकी थी| आज वह बदला लेने वाली सुजाता बन चुकी थी जो बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी| आज सुजाता को समझ आ रहा था की उसने कभी भी अभय से प्यार किया ही नहीं था| वह तो अभय को पाने की एक चाहत भर थी| अगर वह सच में अभय से प्यार करती तो इस तरह उसका घर नहीं बर्बाद करती| लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था| उसे जो करना था वह कर चुकी थी| अब उसे बस उस दिन का इंतज़ार था जब अभय उसके पास आयेगा और वह उसे उसी तरह से अपनी जिंदगी से निकाल देगी जैसे अभय ने तीन साल पहले उसे अपनी जिंदगी से निकाला था|

सुजाता यह सब सोच ही रही थी की उसके घर की घंटी बजी| वह उठकर देखने नहीं गयी की दरवाजे पर कौन था| उसे लगा जो कोई भी होगा थोड़ी देर बाद चला जायेगा| लेकिन दस मिनट बाद घंटी फिर बजी| सुजाता ने घड़ी की तरफ देखा रात के दस बज रहे थे| इस वक्त शायद हो कोई उससे मिलने आता था| जब उसने दरवाज़ा खोला तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था विक्रम उसके सामने खड़ा था| वह थोड़ा परेशान लग रहा था|

“मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था| मैं बस तुमसे इतना कहना चाहता हूँ की मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और हमेशा ही तुमसे प्यार करता रहूँगा|”

विक्रम की बात सुनकर सुजाता की आँखों से आंसू बहने लगे| उसे लगा उसके शरीर में जान ही नहीं बची थी की वह अपने पैरों पर खड़ी रह पाये| वह गिरने ही वाली थी की विक्रम ने उसे अपनी बाँहों में थाम लिया| सुजाता कुछ देर उसके सीने से लगी यूँ ही सिसकती रही|

विक्रम की बाँहों में आकर आज उसे समझ आ रहा था की प्यार होता क्या है| आज इस पल वह अभय, सलोनी, अपना बदला सब को भूल चुकी थी| उसे याद था तो बस विक्रम जिसके सीने से वह लिपटी हुई थी, जिसके तेज़ धड़कते दिल की आवाज वह सुन सकती थी| उसे इसी मरहम की जरुरत थी जिसके लिए वह पिछले तीन साल से तड़प रही थी| उसे पता ही नहीं था की उसके बदले की आग अभय से बदला लेकर नहीं बल्कि विक्रम के प्यार से बुझेगी|

सुजाता रातभर विक्रम की बाँहों में ही बैठी रही| सुबह होने को थी लेकिन उन दोनों ने एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं कहा था| शायद उन्हें अपना प्यार जताने के लिए शब्दों की जरुरत ही नहीं थी|

सुजाता ने घड़ी की तरफ देखा सुबह के चार बजे थे| विक्रम की आँखे बंद थी और उसने सोफे पर अपना सिर टिकाया हुआ था| शायद वह हल्की नींद में था| सुजाता ने जब उसका हाथ हिलाया तो वह उठ गया|

“एक काम है जो मुझे पूरा करना है| क्या आप मेरे साथ चलेंगे?” सुजाता ने विक्रम से कहा|

“हाँ|”

और वे दोनों सलोनी के घर की तरफ बढ़ चले| सुजाता ने फोन करके अभय को भी वही पर आने के लिए कहा|

जब वे दोनों सलोनी के घर पहुँचे तो दो अनजान लोगों को इतनी सुबह अपने घर देखकर वह हैरान थी| सुजाता को वह पहली बार देख रही थी| अभय ने कभी भी सलोनी से सुजाता के बारे में बात नहीं की थी| जितनी हैरान सलोनी थी उतना ही हैरान अभय भी था| उसे समझ नहीं आ रहा था की सुजाता ने उसे इस तरह सलोनी के घर क्यों बुलाया था और वो भी तब जब वह उससे शादी करने को तैयार था|

“सलोनी मुझे पता है अभी जो कुछ भी मैं कहने जा रही हूँ उसे सुनकर शायद तुम्हें हैरानी हो क्योंकि जो कुछ भी हुआ उसमे तुम्हारी कोई गलती नहीं थी| बल्कि इसमे किसी की भी कोई गलती नहीं थी जो कुछ भी हुआ वो सब मेरी वजह से हुआ| मैं ही हूँ जिसकी वजह से अभय तुम्हें तलाक देने वाला है| मैंने ही उसे ऐसा करने के लिए भड़काया था|”

अभय और सलोनी दोनों अपना मुहँ खोले हैरानी से उसे देख रहे थे|

“सुजाता ये तुम क्या कह रही हो| तुमने मुझे किसी भी चीज के लिए नहीं भड़काया| मैं खुद सलोनी को तलाक दे रहा हूँ|”

“ऐसा तुम्हें लगता है अभय| मैं तुमसे कभी शादी नहीं करने वाली थी| मैं बस इतना चाहती थी की तुम्हारा और सलोनी का रिश्ता टूट जाये|”

“लेकिन तुम ऐसा क्यों चाहती थी? और हमारा रिश्ता तो पहले से ही टूट चुका था|”

“तुम चाहते तो अपने रिश्ते को बचा सकते थे और तुम ऐसा कर भी रहे थे लेकिन मैंने तुम्हारे दिमाग में सलोनी को तलाक देने की बात डाली| अगर मैं तुमसे ये न कहती की मैं तुमसे प्यार करती हूँ और तुमसे शादी करुँगी क्या तब भी तुम सलोनी को तलाक देते?”

अभय के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था| शायद सुजाता ठीक कह रही थी| अगर सुजाता ने उससे शादी करने के लिए हाँ नहीं कहा होता तो शायद वह सलोनी को तलाक देने की सोचता भी नहीं| सुजाता के आने से पहले वह अपना रिश्ता बचाये रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा था|

“लेकिन तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मैं तो तुम्हें अपना अच्छा दोस्त समझता था?”

“तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यही थी की तुम मुझे अपना दोस्त समझते थे जबकि मैंने तुम्हें अपना दोस्त माना ही नहीं था| तुम शायद भूल गये मैं हमेशा से तुमसे प्यार करती थी या शायद मैं ऐसा समझती थी की मैं तुमसे प्यार करती हूँ| और जब तुमने सलोनी से शादी की तो मुझे लगा की तुमने मुझे ठुकरा कर सलोनी से शादी की है|”

“लेकिन ऐसा कभी भी नहीं था| मैंने कभी भी तुमसे प्यार नहीं किया और मैंने कभी भी तुमसे ऐसा नहीं कहा| अगर तुम आज भी मुझसे पूछोगी तो मैं यही कहूँगा| मैं आज भी तुमसे प्यार नहीं करता| मेरी जिंदगी में सिर्फ सलोनी है जिससे मैंने प्यार किया था|

सलोनी अभय की तरफ देख रही थी| उसकी आँखे भर आई थी|

“मुझे पता है| मैं पिछले तीन सालों से इसी गलतफहमी में जी रही थी| लेकिन आज मुझे समझ आ चुका है| इसलिए मैंने तुम्हें यहाँ पर बुलाया है यह सब बताने के लिए की तुम सलोनी के साथ अपना रिश्ता मत तोड़ो| और सलोनी मैं तुमसे भी यही कहूँगी की चाहे जो भी नाराजगी हो अभय तुमसे से बहुत प्यार करता है|

सुजाता और विक्रम दोनों सलोनी के घर से बाहर निकले तो सूरज निकल आया था| सुजाता के लिए आज का दिन एक नई शुरुआत लेकर आया था| अब उसके सीने में कोई गम नहीं बचा था| जो कुछ भी था उसे विक्रम के प्यार ने साफ कर दिया था| विक्रम ने उसे ऐसा काम करने से बचा लिया था अगर वह हो जाता तो वह जिंदगी भर अपने आप से ही नज़रे नहीं मिला पाती| आज खुद को वह वही पुरानी वाली सुजाता महसूस कर रही थी|

बाहर ठंडी हवा चल रही थी| विक्रम प्यार से सुजाता की तरफ देख रहा था|

“आप मुझ से इस बात से नाराज तो नहीं|” सुजाता ने धीरे से उससे पूछा| लेकिन विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया| उसने सुजाता को अपनी तरफ खिंचा और प्यार से उसे चूम लिया| सुजाता के लिए यही काफी था|

Saturday, 21 November 2015

सुजाता की कहानी-11

विक्रम जब अपनी सुबह की मीटिंग खत्म करके तीन बजे ऑफिस पहुँचा तो सुजाता उसके सामने खड़ी शाम को होने वाली मीटिंग के बारे में बता रही थी| लेकिन विक्रम ने उसकी कही एक बात को भी नहीं सुना था| वह सिर्फ यही सोच रहा था की किस तरह सुजाता से बात की जाये| उसने रातभर उन बातों को मन में दोहराया था जिसे वह सुजाता को कहने वाला था| लेकिन ना जाने क्या बात थी की वह कुछ बोल नहीं पा रहा था| उसे शायद सुजाता को बाहर ले जाना पड़ेगा ताकि वह अकेले में उससे बात कर सके|

“आज शाम तुम क्या कर रही हो|” विक्रम ने सुजाता को बीच में ही टोकते हुए कहा|

“जी कुछ नहीं|” हालाँकि सुजाता को शाम को अभय से मिलना था लेकिन उसने विक्रम को नहीं बताया की उसे किसी से मिलने जाना था|

“शाम को छह बजे एक मीटिंग है क्या तुम मेरे साथ चल पाओगी?” विक्रम ने बिना उसकी तरफ देखे सुजाता से पूछा|

सुजाता को इससे कोई परेशानी नहीं थी| अभय से मिलना आज उसके लिए ज़रूरी नहीं था| वह सिर्फ एक कारण से उसे मिलती थी और वह था उसे दर्द में देखना| वह किसी को समझा नहीं सकती थी की अभय को इस तरह से तड़पते हुए देखकर उसे कितनी खुशी मिलती थी| और आज हालात ऐसे हो गये थे की अभय वक्त से पहले ही आकर उसका इंतज़ार करता था और उसे घर जाने की जल्दी भी नहीं रहती थी| आज वह जितना ज्यादा हो सके उतना वक्त सुजाता के साथ बिताना चाहता था|

“ठीक है|” सुजाता ने कहा| वह मन ही मन खुश हो रही थी यह सोचकर की अभय एक दिन उससे नहीं मिलेगा तो कितना परेशान होगा|

“ठीक है तुम तैयार रहना हम छह बजे यहाँ से निकलेंगे|”

सुजाता जब उसके कमरे से बाहर चली गयी तो विक्रम ने राहत की साँस ली जैसे उसने आधी लड़ाई जीत ली हो| अब बस सुजाता से बात करना बाकि बचा था और आज शाम को हर हालत में वह सुजाता से बात करके रहेगा उसने सोच लिया था|

विक्रम खुश भी था और थोड़ा बैचेन भी| उसने कभी किसी लड़की से इस तरह की बातें नहीं की थी| उसकी पहली और आखिरी गर्लफ्रेंड रुपाली जिसके साथ उसने आठ साल गुजारे थे उसे कॉलेज में मिली थी| वहाँ पर भी रुपाली ही थी जिसने विक्रम से अपने दिल की बात पहले कही थी| उसके चले जाने के बाद कभी भी किसी और लड़की से उसकी इतनी नजदीकी नहीं रही| और यहाँ पर एक बात और थी जो उसे डरा रही थी| सुजाता और लड़कियों की तरह नहीं थी जो हमेशा ही उसकी बाँहों में आने को तैयार रहती थी| वह उनसे एकदम अलग थी| विक्रम के स्टेटस और पर्सनालिटी का आज तक उस पर असर नहीं पड़ा था|

लेकिन यहाँ पर सुजाता और विक्रम दोनों ही गलत थे| विक्रम यह सोचता था की वह आज तक सुजाता पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाया था वही सुजाता को लगता था की विक्रम जैसा कामयाब और सुन्दर आदमी उसकी तरफ क्यों देखेगा जब उसके पीछे हजारों सुन्दर लडकियाँ पड़ी हुई थी| यहाँ तक की ऑफिस की लड़कियाँ भी विक्रम का ध्यान अपनी और आकर्षित करने की हमेशा ही कोशिश करती रहती थी| लेकिन सुजाता को विक्रम के साथ उस तरह का रिश्ता रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी जैसा की वो लडकियाँ चाहती थी| उसके लिये विक्रम चाँद की तरह था जिसे वह देख सकती थी, उसकी तारीफ कर सकती थी लेकिन उसके नज़दीक जाने या उसे पाने की कभी सोच भी नहीं सकती थी| इसलिए उसने हमेशा ही विक्रम से एक दूरी बनाये रखी थी| वे दोनों कई बार अकेले साथ बाहर मीटिंग के लिए जा चुके थे लेकिन न तो विक्रम ने ही उससे कभी ऑफिस के काम के अलावा किसी और बारे में बात की और ना ही कभी सुजाता ने उससे कोई बाहर की बात की| सुजता उससे तभी बात करती जब विक्रम उससे कुछ पूछता था और वह उसका जवाब देती थी|

सुजाता ने जब फोन पर अभय को बताया की आज वह उससे नहीं मिल पायेगी तो उसकी आवाज में मायूसी-सी आ गयी थी| उन्हें मिले अभी दो महीने ही हुए थे और अभय को लगने लगा था जैसे वह सुजाता के बगैर जी नहीं सकता था| वह जितनी जल्दी हो सके सलोनी से छुटकारा पाकर सुजाता से शादी कर लेना चाहता था| वह इस कदर सुजाता की बातों में आ गया था की उसे अब इस बात की परवाह भी नहीं थी की सलोनी उन दोनों की बेटी को हमेशा के लिए उससे दूर ले जाएगी| उसे लग रहा था की वह अब सुजाता के साथ नई शांति भरी जिंदगी गुजार सकेगा| उसे इस बात का अंदाज़ा तक नहीं था की सुजाता उसके साथ क्या करने वाली थी|

अभय से बात करके सुजाता और भी खुश थी| जैसा उसने सोचा था और जैसा वह चाह रही थी बिल्कुल वैसा ही हो रहा था| पिछले तीन साल से वह जिस आग में जल रही थी आज अभय की वैसी ही हालत देखकर उसके मन को शांति मिल रही थी|

विक्रम और सुजाता जब छह बजे ऑफिस से निकले तब भी सुजाता का चेहरा चमक रहा था| लेकिन जितना खुश सुजाता लग रही थी उतनी ही ज्यादा विक्रम की बैचेनी बढ़ती जा रही थी| विक्रम सुजाता को उसी फाइव स्टार होटल में ले गया था जहाँ वे अक्सर जाया करते थे| वे दोनों चुपचाप हमेशा की तरह उसी टेबल पर बैठे थे जिस पर वे अक्सर बैठा करते थे| सुजाता को लगा था की वे किसी का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन विक्रम को पता था की ऐसा कुछ नहीं था| उसका दिल जोरों से धड़क रहा था| उन्हें वहाँ बैठे-बैठे एक घंटा होने वाला था लेकिन विक्रम ने उससे कुछ नहीं कहा| दोनों चुपचाप अपनी कॉफ़ी पी रहे थे| सुजाता को इस तरह इंतज़ार करने की आदत पड़ गयी थी क्योंकि कई बार जिसके साथ मीटिंग होती थी वह आता ही नहीं था| और सुजाता को इस बात की भनक भी नहीं थी की विक्रम उसे बहाने से अपने साथ लेकर आता था ताकि वह कुछ अकेला वक्त उसके साथ गुजार सके| आज भी विक्रम वही कर रहा था|

“सुजाता तुम्हें पता है मैं तुम्हें अपने साथ आज यहाँ क्यों लेकर आया हूँ?”

“मीटिंग के लिए?”

“नहीं| मैं तुमसे कुछ और बात करना चाहता हूँ|”

सुजाता ने अपना कॉफ़ी का कप वापिस टेबल पर रख दिया| उसे लगा शायद विक्रम उससे ऑफिस के काम के बारे में कुछ बात करना चाहता है| आगे जो कुछ भी होने वाला था उसने सपने में भी नहीं सोचा था|

“देखो मुझे पता है.....” विक्रम बोलते-बोलते रुक गया| शायद वह सही शब्द खोजने की कोशिश कर रहा था| “आज कोई मीटिंग नहीं है| मैं तुम्हें अपने साथ लेकर आया हूँ क्योंकि मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी|”

सुजाता ने कोई जवाब नहीं दिया वह चुपचाप विक्रम की बातों को सुन रही थी|

“मैं जो कुछ भी कहने जा रहा हूँ उसका ऑफिस या ऑफिस के काम से कोई लेना देना नहीं है| मुझे पता है तुम सोच रही होगी ऐसी कौन सी बात है जो मैं तुमसे करने वाला हूँ| लेकिन मुझे गलत मत समझना क्योंकि मुझे नहीं पता की मैं किस तरह से तुम से यह बात करूँ|

अब सुजाता भी थोड़ा घबराने लगी थी| ना जाने विक्रम उससे क्या कहने वाला था|

“मैंने एक दिन तुम्हें किसी के साथ एक रेस्टोरेंट में देखा था........किसी लडके साथ...|” विक्रम बोलते-बोलते हिचकिचा रहा था|

विक्रम की बात सुनकर सुजाता के चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था की विक्रम उससे यह सब क्यों पूछ रहा था|

“वैसे मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है की तुम किस से मिलती हो और किस से नहीं और ना मैं कोई हूँ तुम्हें रोकने वाला...मैं बस....मैं बस इतना जानना चाहता था की क्या....क्या तुम किस को पसंद करती हो...मेरा मतलब है क्या तुम किसी के साथ किसी रिलेशनशिप में हो|”

सुजाता को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था जो कुछ भी वह विक्रम के मुहँ से सुन रही थी| ऑफिस का अगर कोई और लड़का होता तो वह यकीन कर भी सकती थी लेकिन विक्रम....विक्रम उसकी पहुँच से बहुत दूर था|

“देखो तुम मुझे गलत मत समझना मैं सिर्फ बात करना चाहता हूँ| अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा है तो तुम मना कर सकती हो मैं तुमसे दुबारा इस बारे में बात नहीं करूँगा|”

सुजाता को मानो करंट लग गया हो| वह अपनी कुर्सी पर पत्थर की तरह बैठी हुई थी| उसे लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रही थी|

“सुजाता तुम सुन रही हो ना....सुजाता|”

सुजाता ने विक्रम की तरफ देखा| वह पहली बार उसके मुहँ से अपना नाम इतनी बार सुन रही थी|

“मैं....|” सुजाता ने धीरे से कहा| उसके मुहँ से आगे कोई शब्द नहीं निकला|

“देखो मैं जनता हूँ की मेरे इस तरह अचानक तुमसे ये सब बातें पुछने पर तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है| लेकिन यह सब जाने बगैर मैं तुमसे वो सब बातें नहीं कर सकता हूँ जो की मैं करना चाहता हूँ| मैं बस यह जानना चाहता हूँ क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई और है|”

“नहीं|” सुजाता ने धीरे से कहा| वह वहाँ से चले जाना चाहती थी| लेकिन फिर भी ना जाने क्यों वहाँ बैठे भी रहना चाहती थी| विक्रम जैसे व्यक्ति से इस तरह की बातों की उम्मीद उसे कभी नहीं थी| वह और सुनना चाहती थी की आखिर वह उससे कहना क्या चाहता था|

“देखो मुझे पता है तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है क्योंकि मुझे भी तुमसे यह सब बातें करते हुए अजीब लग रहा है| आज तक हमारे बीच का रिश्ता सिर्फ एक बॉस और सेक्रेटरी का था लेकिन मुझे पता ही नहीं चला की कब तुम मुझे अच्छी लगने लगी| मैंने कई बार तुमसे इस बारे में बात करनी चाही लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हुई| और मुझे आज भी नहीं पता था की मैं तुमसे कैसे अपने दिल की बात कहूँ|” विक्रम के हर शब्द के साथ सुजाता की हैरानी बढ़ती जा रही थी| प्यार करना तो बहुत दूर की बात थी आज तक किसी ने उससे यह तक नहीं कहा था की वह उसे पसंद करता है| और जहाँ तक अभय की बात थी वह उसके पास इसलिए आया था क्योंकि सलोनी ने उसे ठुकरा दिया था| अगर उसके और सलोनी के बीच में सब कुछ ठीक चल रहा होता तो क्या वह उसे याद करता, शायद कभी नहीं|