Saturday, 21 November 2015

सुजाता की कहानी-11

विक्रम जब अपनी सुबह की मीटिंग खत्म करके तीन बजे ऑफिस पहुँचा तो सुजाता उसके सामने खड़ी शाम को होने वाली मीटिंग के बारे में बता रही थी| लेकिन विक्रम ने उसकी कही एक बात को भी नहीं सुना था| वह सिर्फ यही सोच रहा था की किस तरह सुजाता से बात की जाये| उसने रातभर उन बातों को मन में दोहराया था जिसे वह सुजाता को कहने वाला था| लेकिन ना जाने क्या बात थी की वह कुछ बोल नहीं पा रहा था| उसे शायद सुजाता को बाहर ले जाना पड़ेगा ताकि वह अकेले में उससे बात कर सके|

“आज शाम तुम क्या कर रही हो|” विक्रम ने सुजाता को बीच में ही टोकते हुए कहा|

“जी कुछ नहीं|” हालाँकि सुजाता को शाम को अभय से मिलना था लेकिन उसने विक्रम को नहीं बताया की उसे किसी से मिलने जाना था|

“शाम को छह बजे एक मीटिंग है क्या तुम मेरे साथ चल पाओगी?” विक्रम ने बिना उसकी तरफ देखे सुजाता से पूछा|

सुजाता को इससे कोई परेशानी नहीं थी| अभय से मिलना आज उसके लिए ज़रूरी नहीं था| वह सिर्फ एक कारण से उसे मिलती थी और वह था उसे दर्द में देखना| वह किसी को समझा नहीं सकती थी की अभय को इस तरह से तड़पते हुए देखकर उसे कितनी खुशी मिलती थी| और आज हालात ऐसे हो गये थे की अभय वक्त से पहले ही आकर उसका इंतज़ार करता था और उसे घर जाने की जल्दी भी नहीं रहती थी| आज वह जितना ज्यादा हो सके उतना वक्त सुजाता के साथ बिताना चाहता था|

“ठीक है|” सुजाता ने कहा| वह मन ही मन खुश हो रही थी यह सोचकर की अभय एक दिन उससे नहीं मिलेगा तो कितना परेशान होगा|

“ठीक है तुम तैयार रहना हम छह बजे यहाँ से निकलेंगे|”

सुजाता जब उसके कमरे से बाहर चली गयी तो विक्रम ने राहत की साँस ली जैसे उसने आधी लड़ाई जीत ली हो| अब बस सुजाता से बात करना बाकि बचा था और आज शाम को हर हालत में वह सुजाता से बात करके रहेगा उसने सोच लिया था|

विक्रम खुश भी था और थोड़ा बैचेन भी| उसने कभी किसी लड़की से इस तरह की बातें नहीं की थी| उसकी पहली और आखिरी गर्लफ्रेंड रुपाली जिसके साथ उसने आठ साल गुजारे थे उसे कॉलेज में मिली थी| वहाँ पर भी रुपाली ही थी जिसने विक्रम से अपने दिल की बात पहले कही थी| उसके चले जाने के बाद कभी भी किसी और लड़की से उसकी इतनी नजदीकी नहीं रही| और यहाँ पर एक बात और थी जो उसे डरा रही थी| सुजाता और लड़कियों की तरह नहीं थी जो हमेशा ही उसकी बाँहों में आने को तैयार रहती थी| वह उनसे एकदम अलग थी| विक्रम के स्टेटस और पर्सनालिटी का आज तक उस पर असर नहीं पड़ा था|

लेकिन यहाँ पर सुजाता और विक्रम दोनों ही गलत थे| विक्रम यह सोचता था की वह आज तक सुजाता पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाया था वही सुजाता को लगता था की विक्रम जैसा कामयाब और सुन्दर आदमी उसकी तरफ क्यों देखेगा जब उसके पीछे हजारों सुन्दर लडकियाँ पड़ी हुई थी| यहाँ तक की ऑफिस की लड़कियाँ भी विक्रम का ध्यान अपनी और आकर्षित करने की हमेशा ही कोशिश करती रहती थी| लेकिन सुजाता को विक्रम के साथ उस तरह का रिश्ता रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी जैसा की वो लडकियाँ चाहती थी| उसके लिये विक्रम चाँद की तरह था जिसे वह देख सकती थी, उसकी तारीफ कर सकती थी लेकिन उसके नज़दीक जाने या उसे पाने की कभी सोच भी नहीं सकती थी| इसलिए उसने हमेशा ही विक्रम से एक दूरी बनाये रखी थी| वे दोनों कई बार अकेले साथ बाहर मीटिंग के लिए जा चुके थे लेकिन न तो विक्रम ने ही उससे कभी ऑफिस के काम के अलावा किसी और बारे में बात की और ना ही कभी सुजाता ने उससे कोई बाहर की बात की| सुजता उससे तभी बात करती जब विक्रम उससे कुछ पूछता था और वह उसका जवाब देती थी|

सुजाता ने जब फोन पर अभय को बताया की आज वह उससे नहीं मिल पायेगी तो उसकी आवाज में मायूसी-सी आ गयी थी| उन्हें मिले अभी दो महीने ही हुए थे और अभय को लगने लगा था जैसे वह सुजाता के बगैर जी नहीं सकता था| वह जितनी जल्दी हो सके सलोनी से छुटकारा पाकर सुजाता से शादी कर लेना चाहता था| वह इस कदर सुजाता की बातों में आ गया था की उसे अब इस बात की परवाह भी नहीं थी की सलोनी उन दोनों की बेटी को हमेशा के लिए उससे दूर ले जाएगी| उसे लग रहा था की वह अब सुजाता के साथ नई शांति भरी जिंदगी गुजार सकेगा| उसे इस बात का अंदाज़ा तक नहीं था की सुजाता उसके साथ क्या करने वाली थी|

अभय से बात करके सुजाता और भी खुश थी| जैसा उसने सोचा था और जैसा वह चाह रही थी बिल्कुल वैसा ही हो रहा था| पिछले तीन साल से वह जिस आग में जल रही थी आज अभय की वैसी ही हालत देखकर उसके मन को शांति मिल रही थी|

विक्रम और सुजाता जब छह बजे ऑफिस से निकले तब भी सुजाता का चेहरा चमक रहा था| लेकिन जितना खुश सुजाता लग रही थी उतनी ही ज्यादा विक्रम की बैचेनी बढ़ती जा रही थी| विक्रम सुजाता को उसी फाइव स्टार होटल में ले गया था जहाँ वे अक्सर जाया करते थे| वे दोनों चुपचाप हमेशा की तरह उसी टेबल पर बैठे थे जिस पर वे अक्सर बैठा करते थे| सुजाता को लगा था की वे किसी का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन विक्रम को पता था की ऐसा कुछ नहीं था| उसका दिल जोरों से धड़क रहा था| उन्हें वहाँ बैठे-बैठे एक घंटा होने वाला था लेकिन विक्रम ने उससे कुछ नहीं कहा| दोनों चुपचाप अपनी कॉफ़ी पी रहे थे| सुजाता को इस तरह इंतज़ार करने की आदत पड़ गयी थी क्योंकि कई बार जिसके साथ मीटिंग होती थी वह आता ही नहीं था| और सुजाता को इस बात की भनक भी नहीं थी की विक्रम उसे बहाने से अपने साथ लेकर आता था ताकि वह कुछ अकेला वक्त उसके साथ गुजार सके| आज भी विक्रम वही कर रहा था|

“सुजाता तुम्हें पता है मैं तुम्हें अपने साथ आज यहाँ क्यों लेकर आया हूँ?”

“मीटिंग के लिए?”

“नहीं| मैं तुमसे कुछ और बात करना चाहता हूँ|”

सुजाता ने अपना कॉफ़ी का कप वापिस टेबल पर रख दिया| उसे लगा शायद विक्रम उससे ऑफिस के काम के बारे में कुछ बात करना चाहता है| आगे जो कुछ भी होने वाला था उसने सपने में भी नहीं सोचा था|

“देखो मुझे पता है.....” विक्रम बोलते-बोलते रुक गया| शायद वह सही शब्द खोजने की कोशिश कर रहा था| “आज कोई मीटिंग नहीं है| मैं तुम्हें अपने साथ लेकर आया हूँ क्योंकि मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी|”

सुजाता ने कोई जवाब नहीं दिया वह चुपचाप विक्रम की बातों को सुन रही थी|

“मैं जो कुछ भी कहने जा रहा हूँ उसका ऑफिस या ऑफिस के काम से कोई लेना देना नहीं है| मुझे पता है तुम सोच रही होगी ऐसी कौन सी बात है जो मैं तुमसे करने वाला हूँ| लेकिन मुझे गलत मत समझना क्योंकि मुझे नहीं पता की मैं किस तरह से तुम से यह बात करूँ|

अब सुजाता भी थोड़ा घबराने लगी थी| ना जाने विक्रम उससे क्या कहने वाला था|

“मैंने एक दिन तुम्हें किसी के साथ एक रेस्टोरेंट में देखा था........किसी लडके साथ...|” विक्रम बोलते-बोलते हिचकिचा रहा था|

विक्रम की बात सुनकर सुजाता के चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही थी| उसे समझ नहीं आ रहा था की विक्रम उससे यह सब क्यों पूछ रहा था|

“वैसे मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है की तुम किस से मिलती हो और किस से नहीं और ना मैं कोई हूँ तुम्हें रोकने वाला...मैं बस....मैं बस इतना जानना चाहता था की क्या....क्या तुम किस को पसंद करती हो...मेरा मतलब है क्या तुम किसी के साथ किसी रिलेशनशिप में हो|”

सुजाता को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था जो कुछ भी वह विक्रम के मुहँ से सुन रही थी| ऑफिस का अगर कोई और लड़का होता तो वह यकीन कर भी सकती थी लेकिन विक्रम....विक्रम उसकी पहुँच से बहुत दूर था|

“देखो तुम मुझे गलत मत समझना मैं सिर्फ बात करना चाहता हूँ| अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा है तो तुम मना कर सकती हो मैं तुमसे दुबारा इस बारे में बात नहीं करूँगा|”

सुजाता को मानो करंट लग गया हो| वह अपनी कुर्सी पर पत्थर की तरह बैठी हुई थी| उसे लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रही थी|

“सुजाता तुम सुन रही हो ना....सुजाता|”

सुजाता ने विक्रम की तरफ देखा| वह पहली बार उसके मुहँ से अपना नाम इतनी बार सुन रही थी|

“मैं....|” सुजाता ने धीरे से कहा| उसके मुहँ से आगे कोई शब्द नहीं निकला|

“देखो मैं जनता हूँ की मेरे इस तरह अचानक तुमसे ये सब बातें पुछने पर तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है| लेकिन यह सब जाने बगैर मैं तुमसे वो सब बातें नहीं कर सकता हूँ जो की मैं करना चाहता हूँ| मैं बस यह जानना चाहता हूँ क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई और है|”

“नहीं|” सुजाता ने धीरे से कहा| वह वहाँ से चले जाना चाहती थी| लेकिन फिर भी ना जाने क्यों वहाँ बैठे भी रहना चाहती थी| विक्रम जैसे व्यक्ति से इस तरह की बातों की उम्मीद उसे कभी नहीं थी| वह और सुनना चाहती थी की आखिर वह उससे कहना क्या चाहता था|

“देखो मुझे पता है तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है क्योंकि मुझे भी तुमसे यह सब बातें करते हुए अजीब लग रहा है| आज तक हमारे बीच का रिश्ता सिर्फ एक बॉस और सेक्रेटरी का था लेकिन मुझे पता ही नहीं चला की कब तुम मुझे अच्छी लगने लगी| मैंने कई बार तुमसे इस बारे में बात करनी चाही लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हुई| और मुझे आज भी नहीं पता था की मैं तुमसे कैसे अपने दिल की बात कहूँ|” विक्रम के हर शब्द के साथ सुजाता की हैरानी बढ़ती जा रही थी| प्यार करना तो बहुत दूर की बात थी आज तक किसी ने उससे यह तक नहीं कहा था की वह उसे पसंद करता है| और जहाँ तक अभय की बात थी वह उसके पास इसलिए आया था क्योंकि सलोनी ने उसे ठुकरा दिया था| अगर उसके और सलोनी के बीच में सब कुछ ठीक चल रहा होता तो क्या वह उसे याद करता, शायद कभी नहीं|

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