ठीक दस बजते ही विक्रम ऑफिस पहुँच चुका था| सुजाता भी उसके पीछे-पीछे चली गयी| यह पहला मौका होगा जब वह उसे सामने से देख रही होगी| अब तक उसने विक्रम की बस झलकियाँ ही देखी थी, लिफ्ट में जाते हुए या फिर ऑफिस में इधर-उधर घूमते हुए|
सुजाता जब वहाँ पहुँची तो बाहर वाले कमरे में एक टाइपिस्ट बैठी कुछ कागज़ात टाइप करने में लगी हुई थी| विक्रम के कमरे का दो पाटों वाला लकड़ी का दरवाज़ा खुला हुआ था| उसे आजकल के शीशे के दरवाज़े बिल्कुल पसंद नहीं थे| सुजाता ने खुले हुए दरवाज़े पर खटखटाया|
‘अन्दर आओ|’ विक्रम ने बिना सिर उठाये कहा|
सुजाता बड़ी-सी टेबल के पीछे बैठे विक्रम के सामने खड़ी थी| वह एक फ़ाइल में मशगुल था|
‘क्या बात है?’ विक्रम ने अपने सामने रखी फाइल के पन्ने पलटते हुए नीरसता से उससे पूछा|
‘सर् वो आज का शेड्यूल बताना था|’
विक्रम ने सुजाता की तरफ देखा| वह थोड़ा डरी हुई थी|
‘तुम कौन हो?’
‘जी, वो आपकी सेक्रेटरी...|’
इससे पहले की सुजाता आगे बोल पाती विक्रम ने उसे एक फाइल लाने के लिए भेज दिया| और इस तरह सुजाता का पूरा हफ्ता विक्रम को शेड्यूल बताने, मीटिंग तय करने, उसके लिए फाइलें लाने और उसके लिए कागज़ात तैयार करने में बीत गया| उससे जो समय बचता उसे वह अपने प्रोजेक्ट को तैयार करने में लगा देती| उसका पूरा दिन इसी भागदौड़ में निकल जाता था|
वही सबको हैरानी हो रही थी की सुजाता को अब तक विक्रम से एक बार भी डांट नहीं पड़ी थी जबकि पिछली तीन बार उन्होंने अपनी सेक्रेटरी को दूसरे ही दिन डांट दिया था| इसका कारण था सुजाता विक्रम से भी एक क़दम आगे थी| वह हर काम को वक्त से पहले ही पूरा करके रखती थी| जहाँ विक्रम के कहने पर कोई काम को पूरा करने चलता था वही सुजाता पहले से उस काम को करके रखती और विक्रम के मांगने पर उसे फाइल तुरंत पहुँचा देती थी|
पूरा हफ्ता बीत गया था लेकिन विना का कहीं अता पता नहीं था| अगले दिन सुजाता ने उसे ऑफिस में घुसते ही पकड़ लिया|
‘विना क्या हुआ तुम्हारी सेक्रेटरी का|’
‘यार तुम्हें पता है ना सर् के लिए सेक्रेटरी ढूँढना कितना मुश्किल है| तुम एक-दो दिन रुको ना मैं देख रही हूँ ना|’ कहकर विना तेज़ी से निकल गयी| सुजाता को पता था की विना उसे फंसा कर अब उससे बच रही थी|
कुछ दिनों की मदद सुजाता के लिए अब आफत बन गयी थी| प्रोजेक्ट का दिन नज़दीक आ रहा था और उसे पूरा करने के लिए उसे देर तक ऑफिस में रुकना पड़ता था| कई बार उसे काम को घर पर भी लेकर जाना पड़ा|
उस दिन प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन का दिन था| उनकी प्रेजेंटेशन से पहले एक प्रेजेंटेशन और होनी थी| विक्रम, उसके पिता और बाकी के डायरेक्टर और अपने अपने विभाग के हेड वहाँ बैठे हुए थे| पहली प्रेजेंटेशन ख़त्म होते ही कुछ देर तक उस पर सवाल-जवाब चलते रहे| विक्रम ने सवाल पूछ-पूछकर उस टीम का बुरा हाल कर दिया था| अब सुजाता की टीम की बारी थी| तीन लोगों को वह प्रोजेक्ट बनाना था लेकिन उसका ज्यादातर काम सुजाता ने ही किया था| लेकिन उसकी प्रेजेंटेशन कोई और दे रहा था| तभी विक्रम की निगाह सुजाता पर पड़ी|
‘तुम यहाँ क्या कर रही हो|’
सुजाता डर के मारे अपनी कुर्सी पर से उठ गयी|
‘जी, वो मैं प्रेजेंटेशन के लिए आई थी|’
‘लेकिन सेक्रेटरी का यहाँ क्या काम?’
‘नहीं, मैं काम तो रिसर्च और डेवलपमेंट डिपार्टमेंट में करती हूँ| वो मुझे कहा गया था कुछ दिनों के लिए आपकी सेक्रेटरी बनने के लिए|’
‘यहाँ हो क्या रहा है?’ विक्रम ने गुस्से में कहा| ‘क्या यहाँ कोई मज़ाक चल रहा है की थोड़े दिनों के लिए यहाँ और थोड़े दिनों के लिए वहाँ|’
‘विक्रम मैंने ही कहा था ऑफिस से किसी को तुम्हारे पास रखने के लिए|’ विक्रम के दोस्त अरुण ने जो उसी के साथ काम करता था विक्रम को शान्त करने की कोशिश की|
‘विक्रम इसके बारे में बाद में बात करना अभी प्रेजेंटेशन होने दो|’ विक्रम के पिता ने कहा|
विक्रम चुप हो गया| और जो लड़का प्रेजेंटेशन देने के लिए खड़ा हुआ था प्रेजेंटेशन देने लगा| वह रुक-रूककर बोल रहा था और बार-बार अपने हाथ में पकड़े कागज़ में झाँक रहा था|
‘ये प्रेजेंटेशन किसने बनाई है?’ विक्रम ने एक बार फिर अपनी गुस्से वाली आवाज़ में पूछा|
‘जी सुजाता ने|’ उसने डरते हुए कहा|
विक्रम ने अपने सामने बैठे उन लोगों पर निगाह मारी| वह पिछले दो हफ्तों से उसके साथ काम कर रहा था लेकिन उसे सुजाता का नाम भी नहीं पता था| और सुजाता एक बार फिर अपनी कुर्सी पर से उठ चुकी थी| उसे लगा की उसकी प्रेजेंटेशन में कुछ गड़बड़ है|
‘तुमने यह प्रेजेंटेशन बनाई है|’ विक्रम ने सुजाता से पूछा|
‘जी|’
‘तो फिर तुम वहाँ क्या कर रही हो| यहाँ आकर यह प्रेजेंटेशन दो|’
सुजाता को समझ नहीं आया की वह क्या करे| उसने आज तक इतने सरे लोगों के सामने खड़े होकर नहीं बोला था| वह धीरे-धीरे सामने की तरफ बढ़ रही थी| सबका ध्यान उसकी तरफ था| सबकी निगाहें उसे घूर रही थी| उसकी बस यही एक कमज़ोरी थी| अगर दो आँखे भी उसे घूर रही हो तो वह बोल नहीं पाती थी और यहाँ तो पूरे के पूरे कांफ्रेंस हॉल की नज़रें उस पर थी| उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था| उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके मुहँ से शब्द ही नहीं निकलेंगे| और सबसे ज्यादा डर उसे विक्रम की घूरती निगाहों से लग रहा था| लेकिन फिर भी जैसे तेसे उसने बोलना शुरू किया और धीरे-धीरे प्रेजेंटेशन पूरी की| लेकिन अब असली इम्तेहान था दूसरों के सवालों का| लेकिन उसकी प्रेजेंटेशन इतनी अच्छी थी की किसी ने ज्यादा सवाल नहीं किये| और अब बारी थी विक्रम की| उसने भी सुजाता से कई सवाल किये लेकिन सुजाता ने उन सब का जवाब दे दिया|
कांफ्रेंस हॉल से निकलने के बाद सुजाता के चेहरे पर एक चमक थी| उसने आज वो काम किया था जिसके बारे में सोचते हुए भी उसे डर लगता था| वापिस अपने डिपार्टमेंट में आने पर हर कोई उसकी तारीफ कर रहा था|
कुछ देर बाद विना उसके पास आई| उसका मूड कुछ ठीक नहीं लग रहा था| शायद उसे विक्रम से ज़ोरदार डांट पड़ी थी| उसने सुजाता से डायरी वापिस ली और उसे कह गयी की उसे अब यह काम करने की कोई जरुरत नहीं| सुजाता ने भी चैन की साँस ली| अब वह थोड़ा आराम कर पायेगी|
सुजाता बहुत खुश थी| पहला कारण था उसकी प्रेजेंटेशन इतनी अच्छी हुई थी और दूसरा कारण था विक्रम के साथ दो हफ्ते काम करने के बावजूद कोई डांट न खाने का| उसकी ऑफिस की साथी नेहा ने तो उसे यहाँ तक कह दिया था की वह खुशनसीब है की ऐसा करने पर सिर्फ विना को डांट पड़ी और उसे नहीं| नसीब की बात हो या नहीं लेकिन सुजाता खुश थी क्योंकि अब ऑफिस में उसकी कद्र कुछ ज्यादा ही होने लगी थी| जो लोग कल तक उसे नहीं जानते थे आज उसे मिलने पर उसे हाय बोलने लगे थे|
सुजाता जब वहाँ पहुँची तो बाहर वाले कमरे में एक टाइपिस्ट बैठी कुछ कागज़ात टाइप करने में लगी हुई थी| विक्रम के कमरे का दो पाटों वाला लकड़ी का दरवाज़ा खुला हुआ था| उसे आजकल के शीशे के दरवाज़े बिल्कुल पसंद नहीं थे| सुजाता ने खुले हुए दरवाज़े पर खटखटाया|
‘अन्दर आओ|’ विक्रम ने बिना सिर उठाये कहा|
सुजाता बड़ी-सी टेबल के पीछे बैठे विक्रम के सामने खड़ी थी| वह एक फ़ाइल में मशगुल था|
‘क्या बात है?’ विक्रम ने अपने सामने रखी फाइल के पन्ने पलटते हुए नीरसता से उससे पूछा|
‘सर् वो आज का शेड्यूल बताना था|’
विक्रम ने सुजाता की तरफ देखा| वह थोड़ा डरी हुई थी|
‘तुम कौन हो?’
‘जी, वो आपकी सेक्रेटरी...|’
इससे पहले की सुजाता आगे बोल पाती विक्रम ने उसे एक फाइल लाने के लिए भेज दिया| और इस तरह सुजाता का पूरा हफ्ता विक्रम को शेड्यूल बताने, मीटिंग तय करने, उसके लिए फाइलें लाने और उसके लिए कागज़ात तैयार करने में बीत गया| उससे जो समय बचता उसे वह अपने प्रोजेक्ट को तैयार करने में लगा देती| उसका पूरा दिन इसी भागदौड़ में निकल जाता था|
वही सबको हैरानी हो रही थी की सुजाता को अब तक विक्रम से एक बार भी डांट नहीं पड़ी थी जबकि पिछली तीन बार उन्होंने अपनी सेक्रेटरी को दूसरे ही दिन डांट दिया था| इसका कारण था सुजाता विक्रम से भी एक क़दम आगे थी| वह हर काम को वक्त से पहले ही पूरा करके रखती थी| जहाँ विक्रम के कहने पर कोई काम को पूरा करने चलता था वही सुजाता पहले से उस काम को करके रखती और विक्रम के मांगने पर उसे फाइल तुरंत पहुँचा देती थी|
पूरा हफ्ता बीत गया था लेकिन विना का कहीं अता पता नहीं था| अगले दिन सुजाता ने उसे ऑफिस में घुसते ही पकड़ लिया|
‘विना क्या हुआ तुम्हारी सेक्रेटरी का|’
‘यार तुम्हें पता है ना सर् के लिए सेक्रेटरी ढूँढना कितना मुश्किल है| तुम एक-दो दिन रुको ना मैं देख रही हूँ ना|’ कहकर विना तेज़ी से निकल गयी| सुजाता को पता था की विना उसे फंसा कर अब उससे बच रही थी|
कुछ दिनों की मदद सुजाता के लिए अब आफत बन गयी थी| प्रोजेक्ट का दिन नज़दीक आ रहा था और उसे पूरा करने के लिए उसे देर तक ऑफिस में रुकना पड़ता था| कई बार उसे काम को घर पर भी लेकर जाना पड़ा|
उस दिन प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन का दिन था| उनकी प्रेजेंटेशन से पहले एक प्रेजेंटेशन और होनी थी| विक्रम, उसके पिता और बाकी के डायरेक्टर और अपने अपने विभाग के हेड वहाँ बैठे हुए थे| पहली प्रेजेंटेशन ख़त्म होते ही कुछ देर तक उस पर सवाल-जवाब चलते रहे| विक्रम ने सवाल पूछ-पूछकर उस टीम का बुरा हाल कर दिया था| अब सुजाता की टीम की बारी थी| तीन लोगों को वह प्रोजेक्ट बनाना था लेकिन उसका ज्यादातर काम सुजाता ने ही किया था| लेकिन उसकी प्रेजेंटेशन कोई और दे रहा था| तभी विक्रम की निगाह सुजाता पर पड़ी|
‘तुम यहाँ क्या कर रही हो|’
सुजाता डर के मारे अपनी कुर्सी पर से उठ गयी|
‘जी, वो मैं प्रेजेंटेशन के लिए आई थी|’
‘लेकिन सेक्रेटरी का यहाँ क्या काम?’
‘नहीं, मैं काम तो रिसर्च और डेवलपमेंट डिपार्टमेंट में करती हूँ| वो मुझे कहा गया था कुछ दिनों के लिए आपकी सेक्रेटरी बनने के लिए|’
‘यहाँ हो क्या रहा है?’ विक्रम ने गुस्से में कहा| ‘क्या यहाँ कोई मज़ाक चल रहा है की थोड़े दिनों के लिए यहाँ और थोड़े दिनों के लिए वहाँ|’
‘विक्रम मैंने ही कहा था ऑफिस से किसी को तुम्हारे पास रखने के लिए|’ विक्रम के दोस्त अरुण ने जो उसी के साथ काम करता था विक्रम को शान्त करने की कोशिश की|
‘विक्रम इसके बारे में बाद में बात करना अभी प्रेजेंटेशन होने दो|’ विक्रम के पिता ने कहा|
विक्रम चुप हो गया| और जो लड़का प्रेजेंटेशन देने के लिए खड़ा हुआ था प्रेजेंटेशन देने लगा| वह रुक-रूककर बोल रहा था और बार-बार अपने हाथ में पकड़े कागज़ में झाँक रहा था|
‘ये प्रेजेंटेशन किसने बनाई है?’ विक्रम ने एक बार फिर अपनी गुस्से वाली आवाज़ में पूछा|
‘जी सुजाता ने|’ उसने डरते हुए कहा|
विक्रम ने अपने सामने बैठे उन लोगों पर निगाह मारी| वह पिछले दो हफ्तों से उसके साथ काम कर रहा था लेकिन उसे सुजाता का नाम भी नहीं पता था| और सुजाता एक बार फिर अपनी कुर्सी पर से उठ चुकी थी| उसे लगा की उसकी प्रेजेंटेशन में कुछ गड़बड़ है|
‘तुमने यह प्रेजेंटेशन बनाई है|’ विक्रम ने सुजाता से पूछा|
‘जी|’
‘तो फिर तुम वहाँ क्या कर रही हो| यहाँ आकर यह प्रेजेंटेशन दो|’
सुजाता को समझ नहीं आया की वह क्या करे| उसने आज तक इतने सरे लोगों के सामने खड़े होकर नहीं बोला था| वह धीरे-धीरे सामने की तरफ बढ़ रही थी| सबका ध्यान उसकी तरफ था| सबकी निगाहें उसे घूर रही थी| उसकी बस यही एक कमज़ोरी थी| अगर दो आँखे भी उसे घूर रही हो तो वह बोल नहीं पाती थी और यहाँ तो पूरे के पूरे कांफ्रेंस हॉल की नज़रें उस पर थी| उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था| उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके मुहँ से शब्द ही नहीं निकलेंगे| और सबसे ज्यादा डर उसे विक्रम की घूरती निगाहों से लग रहा था| लेकिन फिर भी जैसे तेसे उसने बोलना शुरू किया और धीरे-धीरे प्रेजेंटेशन पूरी की| लेकिन अब असली इम्तेहान था दूसरों के सवालों का| लेकिन उसकी प्रेजेंटेशन इतनी अच्छी थी की किसी ने ज्यादा सवाल नहीं किये| और अब बारी थी विक्रम की| उसने भी सुजाता से कई सवाल किये लेकिन सुजाता ने उन सब का जवाब दे दिया|
कांफ्रेंस हॉल से निकलने के बाद सुजाता के चेहरे पर एक चमक थी| उसने आज वो काम किया था जिसके बारे में सोचते हुए भी उसे डर लगता था| वापिस अपने डिपार्टमेंट में आने पर हर कोई उसकी तारीफ कर रहा था|
कुछ देर बाद विना उसके पास आई| उसका मूड कुछ ठीक नहीं लग रहा था| शायद उसे विक्रम से ज़ोरदार डांट पड़ी थी| उसने सुजाता से डायरी वापिस ली और उसे कह गयी की उसे अब यह काम करने की कोई जरुरत नहीं| सुजाता ने भी चैन की साँस ली| अब वह थोड़ा आराम कर पायेगी|
सुजाता बहुत खुश थी| पहला कारण था उसकी प्रेजेंटेशन इतनी अच्छी हुई थी और दूसरा कारण था विक्रम के साथ दो हफ्ते काम करने के बावजूद कोई डांट न खाने का| उसकी ऑफिस की साथी नेहा ने तो उसे यहाँ तक कह दिया था की वह खुशनसीब है की ऐसा करने पर सिर्फ विना को डांट पड़ी और उसे नहीं| नसीब की बात हो या नहीं लेकिन सुजाता खुश थी क्योंकि अब ऑफिस में उसकी कद्र कुछ ज्यादा ही होने लगी थी| जो लोग कल तक उसे नहीं जानते थे आज उसे मिलने पर उसे हाय बोलने लगे थे|
No comments:
Post a Comment